ईमानदारी और सच्‍चाई के साथ अपनी भूमिका निभाई : राणा यशवंत

 

महुआ न्‍यूजलाइन को बंद करने की घोषणा के बाद उठा विवाद प्रबंधन के लचीले रुख के बाद लगभग समाप्‍त हो गया है. संस्‍थान ने कर्मचारियों को दो माह की बकाया सैलरी और एक महीने का कंपनसेशन चेक सौंप दिया है. शायद यह टीवी इंडस्ट्री का पहला चैनल है, जहां पर बकाया वेतन और कंपनशेसन दोनों दिया गया और पूरा मामला स्‍मूथली निपटा लिया गया. इस मसले पर महुआ के समूह संपादक राणा यशवंत की भूमिका भी काफी सराहनीय रही है. भड़ास4मीडिया ने राणा यशवंत से बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश :
 
– एक दुखद अध्‍याय, सैकड़ों मीडियाकर्मी बेरोजगार, आप इसे कैसे देखते हैं और फिलहाल क्‍या स्थिति है? 
 
 — दुखद है, लेकिन कई बार परिस्थितियां हाथ में नहीं होती हैं. जितना ज्यादा संभव हो सकता था संस्‍थान ने मीडियाकर्मियों के साथ इंसाफ करने की कोशिश की . प्रबंधन ने न्‍यूजलाइन के 110 कर्मचारियों को दो महीने की सैलरी और एक महीने का कंपेनसेशन का चेक दे दिया है. मुझे याद नहीं कि टीवी न्यूज इंडस्ट्री में किसी संस्थान ने मीडियाकर्मियों के साथ ऐसा सराहनीय न्याय किया हो. मौजूदा हालात के चलते यह एक चैनल के लिये ठहराव की स्थिति है और सही वक्त पर यही चैनल फिर आपको चलता हुआ दिखेगा. 
  
 – विवाद के क्‍या कारण रहे? प्रबंधन ने पहले ही यह कदम क्‍यों नहीं उठाया?
 
 — कोई विवाद नहीं था. संस्थान की सेहत औऱ बेहतरी के लिये यूपी उत्तराखंड न्यूज चैनल को रोकना मैनेजमेंट को जरुरी लग रहा था. दूसरी तरफ कर्मचारियों को अपना वाजिब हक चाहिए था. ऐसे नाजुक मसले चुटकियों में हल नहीं होते. इसमें कई जरुरी बातों पर विचार करना पड़ता है. इसके लिये वक्त की जरूरत होती है औऱ वही लगा. मेरे लिये सुकून की बात ये है कि सभी साथियों ने संयम औऱ मर्यादा का परिचय दिया औऱ प्रबंधन ने अपने फैसले से टीवी न्यूज इंडस्ट्री में इंसाफ की नई मिसाल गढ़ी. ऐसे हालात में संपादक की भूमिका कई तरह की कसौटी के सामने होती है. मैंने फर्ज औऱ उसूल दोनों लिहाज से खुद को खरा साबित करने की हर मुमकिन कोशिश की. 
 
– चैनल ठीक ठाक चल रहा था फिर उसे बंद करने का कठोर फैसला क्‍यों करना पड़ा?
 
— मैं फिर से साफ करना चाहूंगा कि चैनल को बंद नहीं किया गया है, बल्कि ये अस्‍थाई फैसला है औऱ हालात जैसे ही दुरुस्त होंगे चैनल फिर अपनी रफ्तार पकड़ लेगा. चैनल चलाने के लिये कुछ बुनियादी चीजों को समझना जरुरी है. पीसीआर, एडिट, असाइनमेंट, आउटपुट औऱ ग्राफिक्स जैसे विभागों में तमाम काट छांट के बाद भी एक खास तादाद में लोगों को रखना ही पड़ता है. ड्रिस्ट्रीब्यूशन औऱ न्यूज गैदरिंग कॉस्ट की भारी भरकम रकम इससे इतर है- अगर मैं दूसरे खर्चों को परे रख दूं तब भी. चैनल चलाने का मतलब अगर किसी तरह औऱ कुछ भी चलाना है – भले लोग उसे देखें या नहीं, तो बात दीगर है. वैसे इसमें जर्नलिस्ट का प्रोफेशनल नुकसान होता है औऱ इसकी तकलीफ मैंने अपनी उस टीम में महसूस की है. प्रबंधन ने सबकुछ सोच विचारकर ही ये फैसला लिया – ऐसा नहीं है कि इसकी तकलीफ मैनेजमेंट को नहीं है.
 
– कई मीडियाकर्मी आपके महुआ से जुड़ने के बाद संस्‍थाने से जुड़े थे. आपको नहीं लगता कि वे मुश्किल में आ गए हैं?
 
— देखिए मेरा अपनी टीम के साथ बहुत ही भरोसा और समझ का रिश्‍ता था. यह रिश्‍ता अब भी बना हुआ है. सभी साथी बेहतर थे, बेहतर करने आए थे औऱ उनका कल भी बेहतर रहेगा, यह यकीन है. मैंने एक परिवार बनाया था. एक नया संसार रचने की ताकत बटोरी थी. मुझमें सबका यकीन था और आज भी है. लेकिन अचानक आए संकट पर किसी का वश नहीं होता. यह भी सही है कि हर दीवार में एक दरवाजा होता है, बंद गली से भी राह निकलती है. मेरी टीम के लोग प्रतिभाशाली हैं और निकट भविष्‍य में सभी मीडिया इंडस्‍ट्री में नई ऊंचाइयों पर होंगे. 
 
– किस तरह से बड़ा ही स्‍मूथली इस मामले का हल संभव हुआ?
 
 — ऐसे मसलों में नीति औऱ नीयत दोनों की दरकार होती है. कर्माचारी नीतिगत तरीके से दो महीने का वेतन औऱ एक महीने की क्षतिपूर्ति मांग रहे थे औऱ मैनेजमेंट की नीयत उनके साथ इंसाफ करने की थी. मैंने टीम लीडर होने के नाते अपनी जरुरी भूमिका निभाई. बात बन गयी और इतिहास रच गया.
 
– फिर महुआ न्यूज (बिहार-झारखंड) चैनल को घाटा सहकर भी क्‍यों चलाया जा रहा है? 
 
— महुआ न्यूज बिहार-झारखंड दोनों प्रदेशों का नम्‍बर वन न्यूज चैनल है. उसके कांटेंट औऱ क्रेडिबिलिटी को चुनौती देना किसी के लिये आसान नहीं है. इसीलिये वो पिछले 30 से ज्यादा हफ्तों से नंबर वन न्यूज चैनल बना हुआ है. उस चैनल की खबरें समाज औऱ सियासत दोनों में हलचल पैदा करती हैं. महुआ न्यूज एक ब्रैंड है औऱ कमोबेश वो अपने पैरों पर खड़ा है. महुआ न्यूजलाइन का भी अगर पूरा ड्रिस्ट्रीब्यूशन हुआ होता तो मेरा दावा है कि वो दो महीने के भीतर अपनी टेरिटरी का नंबर वन न्यूज चैनल होता. लेकिन एक नये चैनल को खड़ा करने औऱ बड़ा करने के लिये जो जरुरी संसाधन चाहिए उन्हें पूरा करने की इजाजत मौजूदा हालात नहीं दे रहे थे. लिहाजा प्रबंधन ने वो फैसला लिया जो उसे संस्थान के हित में मुनासिब लगा. यहां ये बात मैं जरुर कहूंगा कि कोई भी प्रबंधन न्यूज चैनल पर करोड़ों रुपये बंद करने के लिये नहीं लगाता. लिहाजा जो लोग ऐसा सवाल करते हैं उन्हें इसपर भी जरा गौर करना चाहिए. 

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