उच्च न्यायालय की टिप्पणी न्यायिक गरिमा के खिलाफ

लखनऊ : रिहाई मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब और इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिवक्ता और मानवाधिकार संगठन पीयूएचआर के प्रवक्ता सतेन्द्र सिंह ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आतंकवाद से संबंधित कुछ मामलों में सम्बन्धित जिले के प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों से अभियुक्तों को रिहा किए जाने के सम्बन्ध में मांगी गई आख्या के विरुद्ध किसी गैर जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद को भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से उत्तर मांगने तथा नियत तिथि पर उत्तर न देने तथा अवसर प्राप्त करने की याचना पर संबंधित शासकीय अधिवक्ता पर डांट लगाते हुए माननीय न्यायाधीश श्री आरके अग्रवाल तथा श्री आरएस आर मौर्या द्वारा की गई टिप्पणी को अवांछनीय बताया। उन्होंने आगे कहा कि यह टिप्पणी कि ''आज आप इन्हें छोड़ रहे हैं और कल उन्हें पद्म भूषण की उपाधि दे सकते हैं'' न्यायालय की गरिमा के विरुद्ध है तथा माननीय न्यायालय की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है। माननीय न्यायाधीश द्वय की टिप्पणी कि ''कोई व्यक्ति अभियुक्त है,  यह निर्णय करना न्यायालय का कार्य है, राजनीतिज्ञों का नहीं'', माननीय उच्च न्यायालय की अवमानना है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम धारा 321 दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान के अन्तर्गत आता है जिसमें कहा गया है कि किसी मामले का भार साधक राज्य सरकार की इस प्रभाव की लिखित अनुमति पर (जो न्यायालय में दाखिल की जाएगी) निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी व्यक्ति के अभियोजन को या तो साधारणतः या उन अपराधों में से किसी एक या अधिक के बारे में, जिनके लिए उस व्यक्ति का विचारण किया जा रहा है, न्यायालय की सम्मति से वापस ले सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार सम्बन्धित मुकदमों को वापस लेने से पहले सम्बन्धित प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों से यदि रिपोर्ट तलब कर रही है तो इसमें विधि विरुद्ध कुछ भी नहीं दिखता। यदि सरकार उक्त मुकदमों को वापस लेना चाहती है तो वापस लेने की लिखित अनुमति देने से पूर्व की जाने वाली जांच को अवैधानिक कैसे माना जाएगा।

कई मुस्लिम युवा जो आतंकवाद से सम्बन्धित आरोपों में बंद थे, अनेक न्यायालयों द्वारा साक्ष्य के आभाव में पांच से लेकर पन्द्रह साल तक ट्रायल फेस करने के बाद छोड़े गए हैं। इनकी इस लंबी अवधि तक जेल में रहने को अवैध करार देने के बाद उनके ये दिन उन्हें वापस कैसे दिए जा सकते हैं, इस पर भी विचार करना आवश्यक है। भारतीय दंड संहिता में निर्दोषों को फंसाने वालों के विरुद्ध भी दंड का प्रावधान है, लेकिन गुजरात के कुछ मामलों को छोड़कर अब तक किसी भी अधिकारी या पुलिस कर्मचारी के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाई नहीं की गई है। इन परिस्तियों पर विचार करने के उपरान्त ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि पुलिस ऐसा कुछ न करे कि किसी निर्दोष मुसलमान को यह कहना पड़े कि माई नेम इज खान, बट आईएम नाट टेररिस्ट।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव
प्रवक्ता रिहाई मंच
मोबाइल- 09415254919, 09452800752
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रिहाई मंच
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सम्पर्क- 09415012666, 09415254919, 09452800752, 09415164845

प्रेस विज्ञप्ति.

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