उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में भगवान भरोसे है आम जन की ज़िंदगी

सभी नागरिकों को बेहतर चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना जनपक्षधरता का बुनियादी सरोकार है। एक लोक कल्याणकारी सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी। अच्छा स्वास्थ्य हासिल करना हरेक नागरिक का बुनियादी हक है। शिक्षा, चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं समाज की उन्नति और विकास का पैमाना होती है। पर नवोदित राज्य उत्तराखण्ड के संदर्भ में ये बातें अर्थहीन है। उत्तरप्रदेश से अलग होते ही हिमालय की इस तलहटी को स्वर्ग बना देने के सपनों और दावों की कोख से जन्मा उत्तराखण्ड राज्य अपने नागरिकों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सहूलियते मुहैय्या कराने में भी बुरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। प्रदेश की सार्वजनिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था दिन-ब-दिन पंगु होती जा रही है। विकास के तमाम खोखले दावों के बीच उत्तराखण्ड सरकार चुपके से अपने बुनियादी दायित्वों से मुंह मोड़कर जाने-अनजाने चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार के हवाले करने पर आमदा है।

अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड ने किसी भी क्षेत्र में काबिल-ए-जिक्र तरक्की नहीं की है। कई क्षेत्रों में इस इलाके की हालत आज के मुकाबले उत्तर प्रदेश में रहते कहीं बेहतर थी। उत्तराखण्ड की चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं इसकी जिन्दा मिशाल है। यहॉ की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल उत्तर प्रदेश के जमाने से भी बदतर हो गया है। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं तात्कालिक सेवाओं के बूते चल रही है।

आज उत्तराखण्ड डॉक्टर और खास तौर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की जबरदस्त कमी से जूझ रहा है। हालॅाकि उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए भी डॉक्टरों की तैनातगी के मामले में उत्तराखण्ड की स्थिति बेहतर नहीं थी। पर राज्य बनने के बाद स्थिति सुधरने के बजाय और बदतर हो गयी है। राज्य निर्माण के दौरान यानी वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के करीब सत्रह सौ पद स्वीकृत थे। इनमें करीब पचास फीसदी डॉक्टर तैनात थे। राज्य बनने के बाद अब राज्य में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के पद करीब चौबीस सौ तीस के आस-पास हो गये है। इसके सापेक्ष मौजूदा वक्त में यहॉ महज करीब चौतीस फीसदी डॉक्टर तैनात है। जबकि डॉक्टरों के छियासठ प्रतिशत पद खाली है। राज्य में मरीजों का ईलाज करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर भले ही नहीं हो। स्वास्थ्य महकमें में अफसरों के पदों में जबरदस्त ईजाफा अवश्य हुआ है। राज्य बनते वक्त यहॉ एक महानिदेशक, दो निदेशक और नौ अपर निदेशक थे। अब एक महानिदेशक, छः निदेशक, छत्तीस अपर निदेशक और एक सौ अट्ठावन संयुक्त निदेशक हो गये है।

उत्तराखण्ड में विशेषज्ञ डाक्टरों का जबरदस्त अकाल हो गया है। यहॉ विशेषज्ञ संवर्ग के वरिष्ठ श्रेणी चिकित्सा अधिकारियों के 189 पद मंजूर है, जिसमें में 131 खाली है। विशेषज्ञ सवंर्ग के ग्रेड-ए के 320 पदों में से 253 पद खाली है। जबकि विशेषज्ञ संवर्ग के चिकित्सा अधिकारियों के मंजूर 700 पदों में से 656 पद रिक्त है। सामान्य संवर्ग के वरिष्ठ श्रेणी चिकित्सा अधिकारियों के 207 में से 149 पद खाली है। चिकित्सा अधिकारी ग्रेड-ए के 346 में से 149 और चिकित्सा अधिकारी के 467 में से 37 पद खाली है। प्रदेश में 121 आर्युवेदिक डाक्टर संविदा में राजकीय एलौपैथिक अस्पतालों में काम कर रहे है। 142 डाक्टर संविदा पर रखे गये है।

राज्य के नगरीय और देहाती इलाकों में चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का ढॉचा पूरी तरह चरमरा गया है। उत्तराखण्ड में राजकीय एलौपैथिक डिस्पेंसरी, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, जिला पुरूष और महिला चिकित्सालय, बेस अस्पताल, संयुक्त चिकित्सालय, ग्रामीण महिला चिकित्सालय, क्षय रोग आश्रम, टी.बी. अस्पताल और टी.बी. क्लीनकों समेत कुल 758 अस्पताल हैं। इनमें विभिन्न संवर्ग के 2196 डाक्टरों के पद मंजूर है। जिनमें करीब बत्तीस फीसदी यानी 719 डाक्टर तैनात है। बाकी अड़सठ प्रतिशत यानी 1477 पद खाली है।

नैनीताल जिले में सभी किस्म के अस्पतालों की संख्या 66 है। इनके लिए 252 डाक्टरों के पद मंजूर है, तैनात है सिर्फ 85 डाक्टर। बाकी 167 पद खाली है। अल्मोडा़ जिले में सभी प्रकार के 77 अस्पताल हैं, जिनके लिए डाक्टरों के 219 पद स्वीकृत है। तैनात है सिर्फ 60 डाक्टर। बाकी 159 पद खाली है। पिथौरागढ़ में विभिन्न श्रेणी के 66 अस्पताल है, इन अस्पतालों में होने चाहिए 158 डाक्टर पर है सिर्फ छियालिस। बाकी 112 पद खाली है। हरिद्वार जिले के 48 अस्पतालों में 161 डाक्टर तैनात होने चाहिए थे, पर यहॉ नियुक्त है सिर्फ 59 डाक्टर। 102 पद खाली है। टिहरी में विभिन्न श्रेणी के 72 चिकित्सालयों में 171 डाक्टर होने चाहिए थे, है सिर्फ 34 डाक्टर। 137 पद खाली है। पौडी़ गढ़वाल जिले के 119 अस्पतालों के लिए 254 डाक्टरों के पद मंजूर है। कार्यरत है सिर्फ 63 डाक्टर। 191 पद रिक्त है। रूद्रप्रयाग जिले में विभिन्न श्रेणी के 41 चिकिसालयों के डाक्टरों के 92 पद स्वीकृत है। तैनात है सिर्फ 16 डाक्टर। बाकी 76 पद खाली है।

उत्तरकाशी जिले के 40 स्वास्थ्य केन्द्र और अस्पतालों के लिए डाक्टरों के 113 पद मंजूर है। यहॉ 38 डाक्टर तैनात है। बाकी 75 पद खाली है। यही हाल चमोली जिले का है। यहॉ विभिन्न श्रेणी के 47 सरकारी अस्पताल है, जिनमें डाक्टरों के 147 पद स्वीकृत है। पर तैनात है सिर्फ 28 डाक्टर। 119 पद खाली है। देहरादून जिले में विभिन्न श्रेणी के सरकारी चिकित्सालयों के तादाद 78 है। जिनके वास्ते 311 डाक्टरों के पद स्वीकृत है। लेकिन काम कर रहे है 163 डाक्टर। 148 पद खाली है। उद्यमसिंहनगर जिले में विभिन्न श्रेणी के अस्पतालों की संख्या 50 है। यहॉ 148 डाक्टरों के पद मंजूर है। 75 डाक्टर कार्यरत है। 73 पद खाली है। चंपावत जिले में विभिन्न श्रेणी के 23 अस्पताल है। इनके लिए डाक्टरों के 92 पद स्वीकृत है। काम कर रहे हे महज 25 डाक्टर। 67 पद खाली है। जबकि बागेश्वर जिले के विभिन्न श्रेणी के 31 अस्पतालों के लिए स्वीकृत डाक्टरों के 78 पदों में 51 पद खाली है। जिले में सिर्फ 27 डाक्टर तैनात है।

राज्य में दॉतों के डाक्टरों का भी कमोवेश यही हाल है वरिष्ठ दंत शल्यक के छः पद मंजूर है। ये सभी खाली है। सामान्य ग्रेड के दंत शल्यकों के मंजूर 70 पदों में से एक दर्जन पद खाली है। इन खाली पदों के सापेक्ष सात दंत शल्यक संविदा में रखे गये है। उत्तराखण्ड में डाक्टरों के दो कैडर बनाये गये है। सामान्य कैडर और विशेषज्ञ कैडर। यहॉ सामान्य कैडर के डाक्टरों के 1139 पद मंजूर है। जिनमें से 66.5 फीसदी यानी 758 डाक्टर तैनात है। 380 पद रिक्त है। जबकि विशेषज्ञ संवर्ग के मंजूर 1291 पदों में से सिर्फ 23 फीसदी यानी 309 डाक्टर कार्यरत है। 982 पद रिक्त है। यहॉ सर्जन, फिजीशियन, नाक-कान, स्त्री एवं बाल रोग विशेषज्ञ डाक्टरों की बेहद कमी है।

यहां तैनात विशेषज्ञ डाक्टरों में से ज्यादातर डाक्टर अलग राज्य बनते वक्त उत्तराखण्ड के हिस्से आये थे। इनमें से करीब ढाई-तीन दर्जन डाक्टर हर साल रिटायर हो जा रहे है। उसी क्रम में साल दर साल विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या भी घटती चली जा रही है। आने वाले सात-आठ सालों में मौजूदा वक्त में यहॉ तैनात तकरीबन सभी विशेषज्ञ डाक्टर रिटायर हो जायेगें। हालत यह हो गई है कि राज्य के जिलों और यहॉ तैनात सर्जनों की संख्या तकरीबन बराबर है। अगर तत्काल नये सर्जन नियुक्त नहीं हुए, आने वाले एक-दो साल में कई जिला अस्पतालों के आपरेशन थियेटरों में ताले लगने की भी नौबत आ सकती है।

राज्य बनने के इन बारह सालों में स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढॉचे में भी बडा़ बदलाव नहीं आया है। राज्य बनते समय सन् 2000 में यहॉ 33 बडे़ अस्पताल, 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 63 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 172 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, ग्रामीण क्षेत्रो में 322 राजकीय एैलोपैथिक चिकित्सालय और 37 ग्रामीण महिला चिकित्सालय थे। दस सालों के बाद आज राज्य में 37 बडे़ चिकित्सालय है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बढ़कर 55 हो गये है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र घटकर 42 रह गये है। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 208 हो गयी है। जबकि ग्रामीण महिला चिकित्सालयों की संख्या घटकर 23 रह गयी है। ग्रामीण क्षेत्रों के एैलोपैथिक चिकित्सालयों की संख्या उतनी ही है।

राज्य के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे ज्यादा दरकार है। क्योंकि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का सारा दारोमदार सरकारी अस्पतालों पर ही टिका है। अफसोस पहाड़ी इलाकों मंे ही डॉक्टरों की सबसे ज्यादा कमी है। दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखण्ड के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए भले ही डॉक्टर नहीं हो, लेकिन इन दस सालों में दवाओं का बजट करीब तीन सौ गुना जरूर बढ़ गया है।

उत्तराखण्ड के सियासी नेतृत्व की अदूरदर्शिता और पहाड़ की बुनियादी जन समस्याओं के प्रति घोर लापरवाही के चलते अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड के लोगों को हरेक क्षेत्र में नुकसान उठाना पडा़ है। संयुक्त उत्तर प्रदेश में रहते मेडिकल में सीमान्त क्षेत्र के लिए तीन प्रतिशत और उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों के मूल निवासियों के लिए तीन फीसदी सीटों का कोटा तय था। इस कोटे के तहत राज्य के पहाड़ी इलाकों के मूल निवासियों को मेडिकल में हर साल छियालीस सीटें हासिल हो जाती थी। इनमें से कम से कम आधे से ज्यादा लोगों को मेडिकल के स्नातकोत्तर कोर्सों में दाखिला मिल जाता था।

नतीजन पहाड़ के दूरस्थ इलाकों को हर साल करीब दो दर्जन से ज्यादा विशेषज्ञ डाक्टर मिल जाया करते थे। तब जिला अस्पताल तो दूर अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में भी विशेषज्ञ डाक्टर तैनात रहा करते थे। अलग राज्य बनने के बाद यह कोटा खत्म हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पॉच साल तक उत्तराखण्ड को हर साल तेरह डिप्लोमाधारी विशेषज्ञ डाक्टर देने का वादा किया है। 2014 के बाद उत्तर प्रदेश से भी डिप्लोमाधारी विशेषज्ञ डाक्टर मिलने बंद हो जाएंगें। राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेजों से निकले डाक्टर भी पहाड़ में नौकरी करने को राजी नहीं है। सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी के 2006-07 बैच के सिर्फ एक दर्जन डॉक्टर उत्तराखण्ड के स्वास्थ्य महकमे में संविदा के आधार पर काम कर रहे है।

प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारी दावें जो भी हो, पर जमीनी हकीकत यह है कि पहाड़ के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र आज भी चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे है। पहाड़ी क्षेत्रों की लचर स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा ग्रामीण इलाकों के बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को उठाना पड़ रहा है। डॉक्टरों के अभाव में उत्तराखण्ड के ज्यादातर बडे़ सरकारी अस्पताल महज रेफरल अस्पताल बनकर रह गये है। ईलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में आने वाले ज्यादातर रोगियों को बाहर के अस्पतालों को रेफर कर दिया जा रहा है। नतीजन प्राईवेट अस्पताल और नर्सिंग होम जमकर चॉदी काट रहे है। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती लाचार रोगियों की भीड़ सरकारी दॉवों की हकीकत बयान कर रही है। अफसोस की बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं समेत राज्य के विकास से जुडे़ दूसरे बुनियादी मुद्दे किसी भी सियासी पार्टी के एजेन्ड़े में शामिल नहीं है।

नैनीताल से प्रयाग पांडे की रिपोर्ट.

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