उत्‍तराखंड में तबाही, लेकिन अखबार और चैनलों को मलाई की उम्‍मीद

उत्तराखंड में आयी तबाही में मरनेवालों की संख्या हजारों में है लेकिन टेलीविजन स्क्रीन पर और अखबारों में यह संख्या सैकड़े के आसपास ही सिमटी हुई है. उत्‍तरकाशी में जितनी बड़ी तबाही हुई है उस सच्‍चाई को तमाम अखबार एवं चैनल नहीं दिखा रहे हैं. उत्‍तराखंड के कई बड़े अखबार जहां नाकाम सरकार और संवेदनहीन मुख्‍यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलने से घबरा रहे हैं वहीं आई नेक्‍स्‍ट अकेले ही सरकार के काले चेहरे को दिखा रहा है.

खबर यह भी आ रही है कि उत्‍तराखंड के तमाम चैनलों को विज्ञापन बांटकर उनका मुंह बंद रखने की कवायद की जा रही है. हिंदुस्‍तान, अमर उजाला और जागरण जैसे अखबार भी चुप्‍पी साधे हुए हैं. लगभग 16 चैनलों को सरकार की तरफ से विज्ञापन जारी किए गए, लेकिन जब मामला खुल गया तो तत्‍काल सभी विज्ञापनों पर रोक लगा दी गई. हालांकि आश्‍वासन दिया गया है कि बाढ़ का मामला ठंडा पड़ जाने के बाद इन चैनलों को विज्ञापन जारी कर दिया जाएगा.

इस मलाई को खाने के चक्‍कर में चैनल तथा अखबार तबाही की सही तस्‍वीर प्रस्‍तुत नहीं कर रहे हैं. सरकार को बचाकर खबरें चलाई जा रही हैं. आपदा प्रबंधन में सरकार की अक्षमता को दिखाने की बजाय इसे बड़ी विभीषिका बताकर सरकार का बचाव किया जा रहा है. जिस तरह एक पीडि़त के अपने पास से बीस लाख रुपये खर्च कर हेलीकॉप्‍टर से अपनी जान बचाने की बात सामने आई, उस पर थू थू करने की बजाय अखबारों ने इस खबर को ही दबा दिया.

दैनिक जागरण ने लखनऊ में यह खबर प्रकाशित की पर देहरादून में नहीं

आई नेक्‍स्‍ट ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया तो दैनिक जागरण ने देहरादून के एडिशन में इस खबर को अलग से देने की बजाय एक लाइन में सिमटा दिया, जबकि जागरण ने यही खबर लखनऊ एडिशन में अलग ढंग से प्रकाशित की. इस खबर के ट्रीटमेंट को देखकर ही समझा जा सकता है कि किस तरीके का काम अखबार उत्‍तराखंड में कर रहे हैं. अमर उजाला जैसा अखबार भी लोगों की उम्‍मीदों पर इस बार खरा नहीं उतर सका. आई नेक्‍स्‍ट जैसा बाइलिंगुअल अखबार जरूर अकेले सरकार के खिलाफ आग उगल रहा है.

जिस समय मीडिया को निष्‍पक्षता से सही खबर दिखानी चाहिए. असफल शासन-प्रशासन की पोल खोलनी चाहिए ताकि हजारों की संख्‍या में फंसे लोगों को बचाने के लिए दबाव बनाया जा सके वहीं मीडिया विज्ञापन की चाह में सरकार की रखैल बनी नजर आ रही है. शर्म आ रही है वॉच डॉग से सरकारी दरवाजे के कुक्‍कुर बच चुके अखबार तथा चैनलों पर. पैसे वाले लोग तो बीस लाख रुपये खर्च कर बच रहे हैं लेकिन जिनके पास पैसे नहीं हैं, उन्‍हें बचाने की जिम्‍मेदारी किसकी है? पर विज्ञापनों की लालच में सरकार की अक्षमता पर सवाल उठाने की बजाय उसे बचाने की कोशिशें हो रही हैं. 

आई नेक्‍स्‍ट देहरादून में प्रकाशित खबर

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