उत्‍तराखंड में फिर बंद हुआ अमर उजाला का सरकारी विज्ञापन

ये वो दौर है जब सरकारें अपनी सकारात्मक आलोचनाएं पसंद नहीं करती. सरकार किसी की भी हो, किसी भी प्रदेश की हो, लेकिन उनका चाल और चरित्र बिल्‍कुल एक जैसा होता है. यह एक बार फिर साबित हुआ है उत्‍तराखंड में. खबर है कि यहां पर बहुगुणा सरकार ने अमर उजाला का सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया है. सरकार बहादुर को अपनी आलोचना पसंद नहीं आई. एक साल पहले किए गए वादों पर खरी नहीं उतरी बहुगुणा सरकार अमर उजाला की खबरों से बौखला गई है. उत्‍तराखंड में अमर उजाला के साथ ऐसा कारनामा दूसरी बार हुआ है.

कांग्रेस की बहुगुणा सरकार से पहले भाजपा की खंडूरी सरकार ने भी अपनी आलोचनात्‍क खबरों से खिन्‍न होकर अमर उजाला के विज्ञापन रोक लगा दी थी तथा अखबार पर दबाव बनाने की कोशिश की. हालांकि चौतरफा विरोध और अमर उजाला की निष्‍पक्ष पहचान के चलते विज्ञापन दुबारा शुरू हो गए. परन्‍तु सरकार बदलने के बाद भी सरकार का चरित्र और नीयत नहीं बदली है. उत्‍तराखंड में जहां तमाम चैनल-अखबार सरकार की वीरदावली गा रहे हैं, वहीं अमर उजाला निष्‍पक्ष रूप से खबरों को परोस रहा है.

राहुल गांधी को चाटुकारिता के चक्‍कर में पीएम बनाने की बात कहने वाले और इसके बाद झिड़की खाने वाले बहुगुणा अपने बारे में भी सब कुछ अच्‍छा ही सुनना चाहते हैं. कोई उनकी सरकार की कमी दिखाए यह उनको बर्दाश्‍त नहीं हो पा रहा है. एक तरफ सरकार वहां दिखाई नहीं पड़ने वाले चैनलों तथा अखबारों को भरपूर विज्ञापन देकर उपकृत कर रही है, वहीं दूसरी ओर अमर उजाला जैसे जनपक्षधर अखबार के विज्ञापन बंद कर उस पर भी वीरदावली गाने का दबाव बनाया जा रहा है.

तारीफ करनी होगी संपादक विजय त्रिपाठी तथा अमर उजाला प्रबंधन की जिसने प्रदेश सरकार के इस बेजा दबाव के सामने लगातार दूसरी बार झुकने से इनकार करने की हिम्‍मत दिखाई है. इस मामले पर पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस काटजू को भी संज्ञान लेना चाहिए. अगर वे इस मामले में खुद संज्ञान लेकर बहुगुणा सरकार की इस हरकत की निंदा करते हैं तो अखबारों-चैनलों का विज्ञापन रोककर दबाव बनाने वाले सरकारों पर प्रभाव पड़ेगा. अब देखने वाली बात होगी कि विजय बहुगणा के नेतृत्‍व वाली कांग्रेसी सरकार के खिलाफ जस्टिस काटजू कोई बयान जारी करते हैं अथवा नहीं.

यह तब हो रहा है जब अमर उजाला, उत्तराखंड का सबसे बड़ा अखबार है. सर्कुलेशन ही नहीं, न्यूज कंटेट के मामले में भी अमर उजाला की अपनी साख है. पिछले कुछ सालों में वैसे ही शशि शेखर और उनके चेले-चपेटों ने अपनी टुच्चईपन से इस अखबार की जमकर वॉट लगाई है. जब से शशि शेखर एंड कंपनी का अमर उजाला से नाता टूटा, तब से यह अखबार अपनी पुरानी रंगत में आने की कोशिश में सरकारों को आईना दिखाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि आज के निर्मम बाजारू दौर में जब संपादकों को खबरों से ज्यादा विज्ञापनी धंधे से नत्थी कर लिया गया है, तब सत्ताशीनों के काले कारनामों की परतें उधेड़ने की सीमा हर अखबार के मालिक और नेताओं की दूरभि संधि ने तय कर रखी है. इस दौर में अमर उजाला का कदम सराहनीय है.

कुछ महीने पहले निशीथ जोशी की विदाई के बाद उत्तराखंड में अमर उजाला की बागडोर विजय त्रिपाठी के हाथों में आने के बाद से ही सरकारों का इस अखबार से तनातनी शुरू हुई है. मैनेजमेंट के नजरिए से भले ही अमर उजाला विज्ञापनों की कमी से परेशान हो रहा हो, पर यह अखबार अब अपने तेवर से उत्‍तराखंड में सबके दिलों में तेजी से जगह बनाता जा रहा है. अपने धारदार खबरों से अमर उजाला उस तेवर के आसपास पहुंचने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए कभी अखबार जाने जाते थे. जिनके स्‍याही की फिसलन से सत्‍ता हिल जाया करती थी. पर अब जनप्रतिनिधि की बजाय तानाशाह बन चुके नेताओं को अपनी या अपने सरकार की सकारात्‍मक आलोचना भी पसंद नहीं आ रही है.

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