उभरता समाजवादी नायक योगेंद्र यादव

: शिक्षाविद ले लेकर चुनाव विश्लेषक और अब तो बतौर राजनीतिज्ञ योगेन्द्र यादव ने समाज के हर वर्ग का दिल जीता है। उनकी छवि कट्टर भाजपा विरोधी की रही है, लेकिन उनके द्वारा की गई चुनावी भविष्यवाणी को झुठलाने का साहस भाजपा भी नहीं कर पाती है। राजनीति में इस शक्ति को स्वीकार्यता कहते हैं, जिसके धनी हैं योगेंद्र यादव। नरेंद्र मोदी इस मामले में बहुत ही कमजोर हैं। शहरी मतदाता राहुल गांधी को पचाने को तैयार नहीं है। मध्यम वर्ग अरविंद केजरीवाल को नौटंकीबाज समझने लगा है। आम चुनाव के बाद अगर स्थिति 1996 की तरह हुई और सरकार बनाने का मौका आम आदमी पार्टी को मिला, तो बहुत संभव है कि योगेंद्र यादव समाज के सभी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता के सहारे केजरीवाल को मात दे सकते हैं। तो क्या योगेंद्र यादव होंगे देश के अगले प्रधानमंत्री?  पत्रकार अखिलेश अखिल की एक रिपोर्ट :

क्या योग्रेंद्र यादव भी प्रधानमंत्री पद की रेस में खड़े हैं? यह लाइन अभी भले ही अतिश्योक्ति लगती हो, लेकिन जिस तरह से आप पार्टी की राजनीति देश को प्रभावित कर रही है और बहुत ही कम समय में इस पार्टी की शाखाएं देश भर में खुलती जा रही हैं, उससे लगता है कि सड़ांध राजनीति से आहत लोग विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। अगर राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है, तो तय मानिए कि अगर आगामी लोकसभा चुनाव में आप की राजनीति लोगों को पसंद आ गई और केजरीवाल के जद्दोजहद को लोगों ने स्वीकार कर लिया, तो इस पार्टी के बैकग्राउंड को मजबूत करने में लगे योगेंद्र यादव एक ऐसे चेहरे के रूप में सामने आ सकते हैं, जिस पर दांव लगाने के लिए फिर कई और तिकड़म शुरू होंगे। यह बात इसलिए कही जा सकती है कि जातीय खेल पर टिकी देश की राजनीति को सबसे ज्यादा कोई समझ रहा है, तो वह हैं योगेंद्र यादव। हर प्रदेश का मिजाज और हर प्रदेश की जातीय समीकरण को यादवजी अगर साध गए, तो आप जैसी पार्टी के वे तारनहार साबित होंगे ही। देश की बागडोर भी उनके हाथ जा सकती है। लेकिन शर्त यह है कि योगेंद्र यादव, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और शरद यादव जैसी राजनीति न करेंगे। ये तीनों भी समाजवादी ही हैं और अपने-अपने इलाके के शेर भी। साथ ही जिद्दी और तिकड़मबाज भी। इन तीनों की राजनीति जातीय खेल पर ही टिकी रही है, लेकिन कहलाते रहे हैं समाजवादी। इन तीनों यादवों की राजनीति पर हम फिर चर्चा करेंगे, लेकिन सबसे पहले योगेंद्र यादव की राजनीति और उनमें आए बदलाव पर एक नजर।

प्रख्यात समाजिक वैज्ञानिक और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव अब ‘आप’ के नेता बन गए हैं। बदलती राजनीति और जनता के मिजाज को जानते हुए योगेंद्र यादव की राजनीति अब परवान चढ़ने लगी है। भले ही वे अब तक आमलोगों के मिजाज को खास अंदाज में राजनीतिक दलों के बीच पहुंचाते रहे हों और देश के जनमानस को राजनीतिक दलों के खेल से परिचय कराते रहे हों, लेकिन अब वही योगेंद्र यादव बदल गए हैं। उनकी समाजवादी सोच बदल गई है और उनका अंदाज भी बदल गया है। ये बड़े लोगों में शुमार होते जा रहे हैं। काम आम आदमी का और कद खास। इसी खास के विरोध में देश की राजनीति चल रही है। पहले योगेंद्र का मोबाइल धकाधक लगता था और एक ‘सामान्य’ आम आदमी की तरह वे खुद फोन अटेंड करते थे, बात करते थे। तब वे बहुत व्यस्त नहीं थे, खुसट राजनीति को बदलने वाला दिल्ली चुनाव तब सर पर नहीं चढ़ा था, सर चढ़ने का मामला भी तब तक न था। बहुत पहले तो नहीं, इधर की ही बात है। तब दिल्ली विधानसभा चुनाव होने में सप्ताह भर देर थी। उनका वही नंबर डायल करने पर कोई सारांश नामक सहायक पीए फोन उठाने लगे थे। इधर, चुनाव बाद से तो व्यापक बदलाव आया है। आम से खास में परिणत होने को साफ-साफ लक्षित करने वाला बदलाव। अब उसी फोन पर लगाइए, तो कोई नहीं उठाएगा, बल्कि आॅटोमेटेड मोड में व्यवसायिक प्रीरिकॉर्डेड वाणी अगले को सुनाई पड़ती है। 1, 2, 3 और 4 क्या नंबर दबाने को आपको कहा जाता है। मसलन, हरियाणा के साथी और मीडिया के साथियों के लिए अलग-अलग नंबर दबाने का प्रावधान कर दिया गया है और शुद्ध आम आदमी के लिए अन्य के नाम का कोई बटन रखा गया है। गरज यह कि अब इस सौम्य-मृदुभाषी लगते यादव जी से बात करने के लिए पहले तो आपको आधा-एक मिनट तक की रिकॉर्डेड वाणी को अपनी हैसियत की खास कोटि तलाश कर खास बटन दबाना होगा, तब कोई दूत उनका फोन रिसीव करेगा। वह दूत कब कैसे क्या इत्मीनान कर साहेब योगेन्द्र को फोन ट्रांसफर करता है, चाहें तो आप यह काम करके देखिए, तब माजरा समझ में आ जाएगा।

मंडल कमीशन के बाद उत्तर भारत में उभरी जातीय राजनीति ने कांग्रेस और भाजपा की राजनीति को कितना तबाह किया है, यह सबको पता है। लेकिन इसी राजनीति ने मुलायम सिंह, लालू प्रसाद और शरद यादव जैसे समाजवादी नेताओं को भी देश की राजनीतिक फलक पर भी लाकर खड़ा किया। कहा जा सकता है कि मंडल कमीशन के बाद तीन यादवों की राजनीति खूब फली फुली। पिछले 20 साल की राजनीति को गौर से देखें, तो हिंदी पट्टी के इन तीन नेताओं ने जातीय राजनीति को हवा देकर समाज में जो विष फैलाया है, इससे पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया। समाजवाद की पहली सोच जातिविहिन राजनीति से लेकर सबको बराबर का हक पर टिकी होती है, लेकिन यहां तो सारी कहानी ठीक इसके उलट है। इन तीनों समाजवादी नेताओं की चर्चा करेंगे, लेकिन इससे पहले देश की राजनीतिक क्षितिज पर उभरते प्रख्यात समाजवादी चिंतक किशन पटनायक और लोहिया के विचारों से ओत-प्रोत आप के नेता और प्रख्यात सामाजिक वैज्ञानिक व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव की राजनीति पर एक नजर।

याद रहे योगेंद्र यादव भी उसी समाज से आते हैं, जिस समाज से मुलायम, लालू और शरद आए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या योगेंद्र यादव उसी यादव और पिछड़ी राजनीति को आगे बढ़ाने वाले एक और नेता के रूप में सामने आएंगे या फिर इन यादव नेताओं की राजनीति को धता बताते हुए देश की राजनीति में एक बड़ा लकीर खीचेंगे? वाकई में किशन पटनायक और लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण की सोच वाली राजनीति करेंगे या फिर देश की जातीय राजनीति में अपने को साकार कर लेंगे? सवाल कई और भी होंगे, लेकिन इतना साफ है कि हालिया राजनीतिक परिवेश में जिस तरह योंगेद्र यादव की हैसियत बढ़ती दिख रही है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक मनोविज्ञान और लोगों के मिजाज को बेहतर समझने वाले योंगेद्र यादव भविष्य की राजनीति के एक पुरोधा के रूप में उभर रहे हैं। जातीय राजनीति के लिए चर्चित हरियाणा से आने वाले योगेंद्र यादव अब 50 साल के हो गए हैं। चंडीगढ़ और जेएनयू से पढ़ाई करने वाले यादव समाज को बदलने के लिए 1995 से 2002 तक लोकनीति नेटवर्क चलाते रहे और समाजवाद का अलख जगाते रहे। वे सीएसडीएस के फाउंडर निदेशक भी रहे और यूजीसी और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली नेशनल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य भी रहे और सबसे बड़ी बात की योगेंद्र यादव राहुल गांधी के राजनीतिक सलाहकार भी रहे। लेकिन योगेंद्र यादव की पहचान सबसे ज्यादा 1996 के बाद चुनाव विश्लेषक के रूप में हुई। अब यही चुनाव विश्लेषक और राहुल के गुरु योगेंद्र यादव देश के राजनीतिक मिजाज के तहत देश की राजनीति को बदलने के साथ ही राहुल को भी सिख देने के लिए आप की राजनीति को आगे बढ़ाने में लगे हंै। वे चुनाव भी लड़ेंगे। वे इसी साल हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी आप को उतारेंगे और हरियाणा की राजनीति को बदलने की कोशिश भी करेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वे अन्य नेताओं की तरह जातीय राजनीति करेंगे या फिर जात को तोड़कर जमात की राजनीति को आगे बढ़ाएंगे? कांग्रेस और भाजपा की नजरें इसी पर टिकी हैं। कुछ साल पहले मीडिया में द्विज वर्चस्व के आंकड़े देते हुए योगेन्द्र ने निष्कर्ष निकाला था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण के विरुद्घ काम वर्तमान मीडिया का द्विजवादी वर्चस्व का परिणाम है। योगेन्द्र की अब तक लोहिया परंपरा के एक समाजवादी विचारक की रही है। वे लोहिया के एक बौद्घिक उत्तराधिकारी स्वर्गीय किशन पटनायक के घनिष्ठ रहे हैं, उनके द्वारा संपादित मासिक पत्र सामयिक वार्ता के संपादक मंडल के सदस्य भी हैं। उनकी समाजवादी पृष्ठभूमि एवं बौद्धिक क्षमता-योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें इसी द्विजवादी मीडिया ने काफी ऊंचा उठाया है। बहुत स्थान दिया है। हिन्दू जैसा प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक उनके चुनाव सर्वेक्षणों को पूरा पन्ना देता है।

राष्ट्रीय मीडिया में ऊंची जातियों का वर्चस्व है? इस पर योगेंद्र यादव कहते हैं कि  देश की जनसंख्या में ये जातियां आठ फीसदी हैं, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुख फैसले करने का अधिकार रखने वाले वर्ग में 71 फीसदी लोग इन्हीं जातियों के हैं। द्विज हिन्दू (जिनमें ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, वैश्य और खत्री शामिल हैं) देश की जनसंख्या के 16 फीसदी हैं, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया के नीति निर्माता वर्ग में 86 फीसदी लोग इन्हीं जातियों से हैं। अकेले ब्राह्मणों (जिनमें भूमिहार और त्यागी शामिल हैं) की संख्या राष्ट्रीय मीडिया के प्रभुत्वशाली वर्ग में 49 फीसदी है।

योगेन्द्र यादव का राष्ट्रीय मीडिया पर मुस्लिमविरोधी, नारी विरोधी, दलित और पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाते रहे हैं। पता नहीं मीडिया पर द्विजवादी वर्चस्व का आरोप लगाते समय योगेन्द्र यादव के मन में यह प्रश्न उठा नहीं कि उनके नाम में यादव लगा होने पर भी मीडिया ने उनकी उपेक्षा क्यों नहीं की? उन्हें पीछे क्यों नहीं धकेला? अब योगेन्द्र यादव को अपने से ही पूछना चाहिए कि वे पहले जातिवादी यादव हैं या लोहिया भक्त समाजवादी? भारत के बौद्घिक जगत एवं द्विजवादी राष्ट्रीय मीडिया में उन्होंने अपना स्थान यादव के कारण बनाया है या अपनी बौद्घिक क्षमता-प्रतिभा के कारण? क्या इससे हम यह निष्कर्ष निकालें कि समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों का जो द्विज नेतृत्व था, वह अपने घोषित आदर्शों के प्रति झूठा, बेईमान और ढोंगी था। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के अधिकांश नेता, डांगे, रणदिवे, जोशी, हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्त, इन्द्रजीत गुप्त, ज्योति बसु, चतुरानन मिश्र, भोगेश्वर झा, सोमनाथ चटर्जी, बुद्घदेव भट्टाचार्य सभी द्विज समाज से आते हैं। समाजवादी नेतृत्व आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ़  राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये, एसएम जोशी, एनजी गोरे, जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, नाथ पै, मामा बालेश्वर, किशन पटनायक आदि सभी तो द्विज वर्ग से आए। आज भी लालू यादव शिवानंद तिवारी को, मुलायम सिंह यादव लोहिया के लोग का बोर्ड लटकाने वाले जनेश्वर मिश्र को यहां तक कि मायावती भी एक ब्राह्मण को अपना मुख्य सलाहकार बनाकर चल रही हैं।

बावजूद इसके वर्तमान राजनीति में योगेंद्र यादव एक नायक के रूप में उभरते दिख रहे हैं। उनकी राजनीति शरद यादव, मुलायम सिंह यादव और लालू यादव से कैसे अलग होगी और किस तरह से वे पूरे समाज को एक सूत्र में बांधने का काम करेंगे और सबको एक साथ किशन पटनायक के समाजवाद से जोड़ेंगे? यह देखना होगा। आइए, एक नजर देश के उन तीन यादव राजनेताओं पर भी डाल लें, जो जातीय राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी बनकर देश की राजनीति को दिशा देते रहे हैं। सबसे पहले मुलायम सिंह यादव। शिक्षक से नेता बने मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार देश के रक्षा मंत्री बन चुके हैं। इस दफा चौथी बार वे सूबे के मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन अपने बेटे अखिलेश यादव को सूबे की कुर्सी देकर वे केंद्रीय राजनीति में अंतिम पारी खेलने की जुगत में लग गए हैं। एक बात और साफ कर दें कि अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला मुलायम सिंह यादव का था न कि प्रदेश की जनता और पार्टी कार्यकर्ता का। हां, तो खांटी लोहियावादी और गैरकांग्रेसवादी राजनीति पर चलने वाले मुलायम सिंह यादव बाबरी विवाद के बाद मौलवी के खिताव से भी नवाजे गए और मुल्ला मुलायम हो गए। इटावा के सैफई गांव में जन्मे मुलायम वसूलों पर चलने वाले और जिद्दी हैं। लोहियावादी राजनीति को मानने वाले मुलायम 1967 से विधानसभा जीतते आए और 1989 में पहली बार सीएम बने। मंडल आंदोलन के दौरान वीपी सिंह का विरोध किया और चंद्रशेखर के साथ मिलकर 1992 में सपा का गठन किया। 1993 में बसपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई, लेकिन बहुत दिनों तक सरकार नहीं चल सकी। 1996 में मुलायम सिंह लोकसभा पहुंचे और रक्षा मंत्री बने। देवगौड़ा के हटने के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इनकी नजरें गई, लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हुआ। 2002 में फिर मुख्यमंत्री बने और उसके बाद 14वीं और 15वीं लोकसभा के सदस्य बने, लेकिन इधर मुलायम सिंह में भी बदलाव आया है। जिंदगीभर गैरकांग्रेस की राजनीति करने वाले मुलायम पिछले कुछ सालों से कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। भले ही मुलायम केंद्र की यूपीए  सरकार में शामिल न हों, लेकिन बार-बार और हर बार यूपीए सरकार को संकट से उबारने में लगे रहे। राजनीतिक जानकर मान रहे हैं कि मुलायम की कांग्रेस के प्रति यह मुलायमियत दूर की राजनीति को लेकर है। अगर आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा सरकार बनाने में फेल हो गए, तो मुलायम तमाम समाजवादी पार्टियों को एकजुट कर कांग्रेस का समर्थन अपने नाम पर ले सकते हैं। हालांकि अभी यह दूर की बात है, लेकिन जिस तरह से देश में कांग्रेस और भाजपा की राजनीति चल रही है, उससे क्षेत्रीय पार्टी की मजबूती को बल मिलता है।

जदयू के अध्यक्ष और मधेपुरा से सांसद शरद यादव का भले ही कोई बड़ा जनाधार नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में दखल की वजह से इन्हें जादूगर कहा जाता है। जबलपुर के पास बाबई गांव में जन्मे शरद जेपी आंदोलन के दौरान जबलपुर विश्वविद्यालय के छात्र नेता थे। इमरजेंसी के ठीक पहले बतौर जनता पार्टी उम्मीदवार जबलपुर से उपचुनाव जीतकर वे लोकसभा पहुंचे और चरण सिंह की लोकदल युवा शाखा के अध्यक्ष बने। 1977 में शरद यादव लोकसभा पहुंचे, लेकिन 1980 में साफ हो गए। बहुत दिनों तक शरद भटकते रहे। फिर उनका बनवास टूटा मुलायम सिंह यादव के साथ बदायूं में और लालू के साथ मधेपुरा में। शरद राजनीति को जानते हैं, इसलिए राजनीति को भांपते हुए उन्होंने पहले मुलायम का साथ छोड़ा फिर लालू से अलग हो गए। अभी शरद यादव मधेपुरा से सांसद हैं, लेकिन शरद का न बिहार में जनाधार है, न यादव वोट बैंक पर पकड़। यह नीतीश की कृपा है कि बिहार में यादवों को कथित लुभाने के नाम पर शरद को झेल रहे हैं। अभी हाल ही में शरद को अपना असली औकात का पता भी उत्तर प्रदेश चुनाव में चल गया। चले थे मुलायम के यादव वोट पर डाका डालने बुरी तरह से चोट खाकर लौटे। लेकिन राजनीति के इस कुशल खिलाड़ी के अगले दांव पर सबकी नजरें लगी हैं।

उधर, लालू प्रसाद यादव के बारे में ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। जेपी आंदोलन की कोख से निकले लालू प्रसाद जेपी आंदोलन के समय पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेता थे। जनता पार्टी की आंधी में पहले लोकसभा और फिर 1981 में से लगातार विधानसभा पहुंचते रहे। फिर 1990 में बिहार में सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरे और लगातार खुद और पत्नी मिलकर बिहार में 15 सालों तक राज किया।  इस दौरान लालू सामाजिक न्याय के पुरोधा भी कहलाए। गरीबों के राजा कहलाए, लेकिन गरीबों का यह राजा चारा घोटाला उजागर होते ही भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए। हवाला कांड के बाद दिल्ली की राजनीति में आए और केंद्रीय मंत्री भी बने। लेकिन 2009 के चुनाव के बाद इनकी राजनीति पर ग्रहण लग गया। लाख चाहने के बाद भी यूपीए 2 में मंत्री नहीं बन पाए और अंत में चारा घोटाला में सजा हो गई और छह साल के लिए राजनीतिक बनवास भी। लेकिन अपने धुन के पक्के लालू प्रसाद आज भी राजद की बागडोर पकड़े आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार में अपने खोए जनाधार को पाने के लिए बेकरार है। राजद नेता राजनीति प्रसाद कहते हैं कि लालू को आप कम नहीं आंक सकते। भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार में हमारी हार हुई है, लेकिन अभी भी हमारे पास वोट है। समय का इंतजार करिये बहुत कुछ बदलेगा। हम आगामी राजनीति पर नजर रखे हुए हैं।

भारतीय राजनीति में ये तीन ऐसे चरित्र हैं, जो अहंकारी तो हैं ही जिद्दी भी हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादवी महाभारत की शुरुआत करने वाले ये तीनों नेता ही हैं। 120 लोकसभा वाला यह दोनों प्रदेश देश की राजनीति को एक नई दिशा देता रहा है। ये तीनों नेता पिछले कुछ सालों से एक-दूसरे को नेस्तनाबूत करने में लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में तीनों एक-दूसरे को आगे बढ़ाने का काम किया। जब तीनों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ी और यादवी अहंकार पैदा होने लगे, तो तीनों ने एक-दूसरे की जड़ों में तेजाब भी डालने से परहेज नहीं किया, लेकिन अब समय भी बदला है और इनकी राजनीति भी। लालू कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी थे, बाद में कांग्रेस के सबसे बड़े समर्थक बने। उधर, मुलायम भी गैरकांग्रेस की राजनीति को अपने दम पर तो आगे बढ़ाते रहे, लेकिन पिछले 10 सालों से वे परोक्ष रूप से कांग्रेस को बचाते भी रहे हैं। आप कह सकते हैं कि ये दोनों नेता कांग्रेस को अभी जिंदा रखने में परोक्ष रूप से लगे हुए हैं। इसके पीछे राजनीति भी है और उनकी अपनी रणनीति भी। यह रणनीति आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर है। समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं कि कांग्रेस विरोध के नाम पर राजनीति शुरू करने वाले बाद में उसी के आगे पीछे करते हैं। यह आज की बात नहीं है। कुछ सालों से तो लालू और मुलायम कांग्रेस को और आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। उनकी अपनी नीति है इसके लिए। उन्हें मालूम है कि भाजपा उनको साथ सटा नहीं सकती और कांग्रेस के साथ मिलकर उनकी मंशा पूरी हो सकती है। बिहार और उत्तर प्रदेश के उन लोगों को इन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के नाम पर वोट लेने के बाद वे कांग्रेस का समर्थन क्यों कर रहे हैं? इसे ठगी की राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। राजनीति के इन चतुर खिलाड़ी की अंतिम भूमिका क्या होगी? इसे लेकर मुलायम भी अभी कुछ तय नहीं कर पाए हैं, लेकिन इतना तय मानिए की आगामी राजनीति इन्हीं चार यादव नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती नजर आएगी।

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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