“उसका रिश्‍तेदार आईएएस है, कंप्रोमाइज कर लो ठीक रहेगा”

आम तौर पर देखा गया है कि एक सीनियर जर्नलिस्ट अपने जूनियर की हर संभव मदद करता है और उसका उत्साह बढ़ाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी में तो दृश्य कुछ और है। हुआ यूं कि एक अंग्रेज़ी दैनिक के युवा पत्रकार की बेटी लखनऊ के एक बड़े गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती है।

कुछ दिनों से उसकी 8 साल की बच्ची स्कूल जाने से कतरा रही थी। माँ बाप के बहुत कुरेदने पर उसने रोते हुए बताया कि एक फलां सब्जेक्ट की टीचर उसे और अन्य बच्चे, जिनकी राइटिंग स्पीड थोड़ी कम है और राइटिंग थोड़ी गंदी है, उन्हें वो ज़मीन पर बैठा देती है। और जब वो डांटती है तो और बच्चे हँसते हैं। हमे इन्सल्ट फील होता है इसलिए मैं स्कूल नहीं जाऊँगी।

सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के बाद भी अगर किसी बच्चे को पब्लिकली हुमिलिएट किया जाए तो ये गलत है और यही सोच कर इस युवा पत्रकार ने प्रिंसिपल से मुलाकात की। और भी पैरेंट्स ने इंडाइरेक्‍टली अपनी बात पहुंचाई पर प्रिंसिपल ने इस युवा को बुला कर परसनली मीटिंग रखी और 2-3 दिन बाद उस टीचर का इस्तीफा ले लिया गया। ये तो हुई एक जेनुइन बात जो हर जिम्‍मेदार माँ-बाप अपने बच्चे के लिए करेगा।

पर हद तो तब हो गई जब मीटिंग वाले दिन शाम को ही उस युवा पत्रकार के पास एक बड़े ही वरिष्ठ और सरकारी तंत्र में खासे लोकप्रिय पत्रकार का फोन आता है। "तुम्हारी कम्प्लेंट की वजह से एक टीचर का इस्तीफा ले लिया गया है", वो कहते हैं। युवा को उस वक़्त तक नहीं मालूम था कि एक्शन लिया जा चुका है। उसे 3 दिन बाद पता चला। उन्होंने आगे कहा, "उस टीचर के एक रिश्तेदार आईएएस हैं और वो तुम्हारे बॉस के बारे में पूछ रहा था। उनका नंबर मांग रहा था। कम्‍प्रोमाइज कर लो ठीक रहेगा।''

हालांकि उस युवा पत्रकार ने आगे न कुछ किया न किसी से बात की क्योंकि ऐसी गीदड़ भभकियां देने की आदत कई वरिष्‍ठों के बारे में प्रचलित है. लेकिन इससे ये सिद्ध होता है कि कुछ वरिष्ठ अपनी मूछ लोगों के सामने टाइट करने में और फर्जी भोकाल टाइट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। इन्हे शायद ये नहीं मालूम कि ऐसे लोगों की मुंह पर वाह वाह और पीठ पीछे ऐसी की तैसी होती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्रकार के पत्र पर आधारित.

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