उस दिन दोपहर में ही ‘आज’ अखबार का बंडल उतरते देखकर अजीब लगा

Shambhunath Shukla : सावधान! आपातकाल लागू है। साल 1975 तारीख 26 जून। दोपहर के ढाई बज रहे थे। अपना अखबारी बुलेटिन नया मोर्चा छोड़ने का समय हो रहा था। इसे हम चार पांच एमएल के विचारों के हामी लेकिन डेमोक्रेटिक मूल्यों में यकीन करने वाले साथियों ने निकाला था। इसमें एक लघु उद्यमी अजय सहगल, मजदूरों के बीच काम कर रहे पीयूषकांत सूर उर्फ मोना दा, कामरेड सुमनराज और साथी दिनेश चंद्र बंधु ने निकाला था।

हम इसकी 500 प्रतियां छापते, जिसकी लागत करीब ढाई सौ रुपये आती। हम खुद ही इसे आईआईटी व मेडिकल कालेज में समान विचारों वाले छात्रों को बेच आते। हम इसकी एक प्रति आठ आने में बेचते इस तरह लागत तो निकाल ही लेते। यहा पेपर साप्ताहिक था। उस दिन हम प्रिंटिंग मशीन से सारी कापियां निकल आने का इंतजार कर रहे थे ताकि फटाफट उन्हें अपने शुभचिंतकों को बांट आएं। कुछ ही देर पहले ज्ञान वैष्णव ढाबे से हम दोपहर का खाना खाकर लौट रहे थे तो रास्ते में जयहिंद टाकीज के पास एक मेटाडोर से आज अखबार के बंडल उतरते हुए देखा तो अजीब लगा कि दोपहर के समय ये बंडल क्यों उतारे जा रहे हैं।

हमें अपने अखबार को छोडऩे की जल्दी थे इसलिए हम बिना कुछ पता किए आ गए शंकर प्रिंटर्स और उसके मालिक से कहने लगे कि जल्दी हमारा अखबार छुड़वा दें। शंकर प्रिंटर्स कानपुर में गुमटी नंबर पांच के एक शापिंग कांप्लेक्स के बेसमेंट में था। तभी दूर से आती हाकर्स की आवाज आई आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर हम भागकर ऊपर आए और ताजा खबर यानी आज का उस दिन का स्पेशल बुलेटिन खरीद लिया। उसमें आठ कालम में बैनर था आपातकाल लागू। यह पढ़ते ही हम सन्न रह गए। शंकर प्रिंटर्स के मालिक ने मशीन बंद की और अपने छापाखाने पर ताला डालकर चले गए। हमें 12 जून के बाद से ही यह अंदेशा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में हार के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार को बचाए रखने के लिए कोई अप्रत्याशित कदम उठाएंगी पर इमरजेंसी लगाने को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद राजी हो जाएंगे यह नहीं सोचा था।

कांग्रेस के तमाम मंत्री ऐसा कदम उठाए जाने के खिलाफ थे पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय और संजय गांधी इसके प्रबल समर्थकों मे से थे। पर इंदिरा जी पुत्र प्रेम में इस कदर अराजनीतिक कदम उठा लेंगी यह हम नहीं सोच पा रहे थे। कुछ ही देर में पुलिस चारों तरफ फैलने लगी। शंकर प्रिंटर्स भी आई पर वहां ताला लगा था। हमें तो वह पहचानती नहीं थी लेकिन अंदेशा था कि घर में पुलिस आ सकती है इसलिए हमने एक दोस्त को घर भेजा और कहलवा दिया कि बता देना शंभू गांव गए। क्योंकि हमारे साथियों ने तय किया था कि अब हमें यूजी यानी अंडरग्राउंड हो जाना चहिए। वह रात तो हमने शहर में ही मोना दा के एक परिचित के यहां काटी। यह एक शुक्ला परिवार था। घर के मालिक समृद्ध व्यापारी थे और उनको राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। पर मालकिन मोना की सिंपेथाइजर थीं। वे ढलती उम्र की एक भली और धार्मिक महिला थीं।

उन्हें यह नहीं पता था कि कामरेड मोना की पालिटिक्स क्या है लेकिन उन्हें लगता था कि मोना एक भला काम कर रहा है इसलिए वे मोना को आर्थिक मदद भी किया करती थीं। हम उस रात वहीं रुके और सुबह सब को कहा गया कि अपने-अपने ठिकाने तलाशो। मैंने सुबह झांसी पैसेंजर पकड़ी और कानपुर के बाद के पांचवें स्टेशन तिलौंची उतर कर अपने गांव चला गया। दादी-बाबा इस तरह मेरे अचानक आ जाने से कुछ परेशान हुए पर मैंने समझा दिया कि कुछ दिन रुकूंगा। फिर जल्दी ही अपना गांव छोड़कर अपने पिताजी की मौसी के गांव अंगद पुर आ गया। पिताजी के मौसा अंगदपुर के टंडन परिवार के कारिंदा थे। अच्छी खासी जमीन थी उनके पास और बाग बगीचे ऊपर से। वे निसंतान थे और पिताजी को बहुत पसंद करते थे। चाहते थे कि पिताजी यहीं आकर रहें। मेरी अपनी दादी भी चाहती थीं कि उनकी छोटी बहन उनके चार बेटों में से एक को गोद ले लें ताकि उनकी गरीबी मिटे। लेकिन पिताजी की मौसी अपने भाई को अपने यहां रखना चाहती थीं इसलिए मौसा की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने भाई को बुला लिया। पर मेरे से उनका लगाव था इसलिए मैं इमरजेंसी के दौरान अंगदपुर रहा जाकर। पर वहां न तो अखबार था न ही संचार के अन्य साधन।

हालांकि अंगदपुर अब एनएच-2 के किनारे अब आ गया है और अखबार, रेडियो और टीवी के सारे साधन वहां उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे मैं अपने अन्य साथियों की कमी के कारण बोर होने लगा लेकिन बिना पुख्ता सूचना के कानपुर जाना खतरे से खाली नहीं था। पढ़ाई भी अधूरी छूटी हुई थी और उम्र कुल बीस की। तभी एक दिन बाबा आए और घोषणा कर गए कि शंभू की शादी कर देने का फैसला किया है। पिताजी आए तो मैंने पूछा उन्होंने कहा कि लड़की देख लो। मैंने विरोध किया कि खिलाएगा पिलाएगा कौन? वे बोले अभी तुम्हारा खर्चा कौन उठाता है तो जैसे तुम्हारा खर्च उठाया जा रहा है वैसे ही एक और प्राणी का खर्च उठाया जाएगा। मैं कानपुर आ गया। अब यहां सब कुछ सामान्य था। एक कांग्रेसी मित्र से पूछा तो उसने कहा कि मजे करो यहां गोविंद नगर पुलिस की यह औकात नहीं कि तुम पर हाथ धरे लेकिन उस सीपीआई वाले तिवारी से न मिलना वह पुलिस का मुखबिर है।

दरअसल उस समय सीपीआई (एमएल) और सीपीएम तो कांग्रेस के खिलाफ थे लेकिन सीपीआई सोवियत संघ के चलते इंदिरा गांधी और इमरजेंसी की समर्थक। मैं एक दिन आईआईटी भी गया वहां श्रीनिवास से मिला पता चला कि आजकल वे कणाद दर्शन पर शोध कर रहे हैं और सुनील सहस्त्रबुद्धे गांधी दर्शन पर। यानी एमएल के सारे कार्यकर्ता अचानक दार्शनिक हो गए हैं। कामरेड शिवकुमार मिश्र जरूर डटे थे पर उनका भी बाद में मोहभंग हो गया। अगले साल इमरजेंसी के दौरान ही मेरी शादी हो गई और जिससे हुई वह मेरे ही कालेज में पढ़ चुकी थी। यह इमरजेंसी विचारों के साथ ही मेरे जीवन में अनुशासन लाने वाली तो रही ही।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

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