उस शैतान डाक्टर को सजा दिलाने के लिए लड़ रहे सुधीर के हौसले को सलाम

जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम अपने आस-पास के बड़े-बड़े योद्धाओं के बारे में तब नहीं जानते रहते हैं, जब तक हमारा भाग्य हम पर मेहरबान नहीं हुआ हो. इन तमाम शानदार लोगों के संघर्ष, उनकी लड़ाइयां, उनकी जिजीविषा, उनके साहस और उनके अदम्य धैर्य के हम अनजान बने रहते हैं जब तक वे सौभाग्यवश हमें नहीं मिलते अथवा इनकी किस्से हम तक नहीं पहुँचते हैं.

यह शायद मेरा भाग्य था कि आज मुझे सुधीर कुमार श्रीवास्तव नाम के एक ऐसे ही विरले व्यक्ति से मुलाक़ात हो गयी. श्री श्रीवास्तव पेशे से बैंककर्मी हैं. उनके जीवन में एक अत्यंत दुखद घटना तब घटी थी जब उनकी पत्नी सुश्री निधि श्रीवास्तव की संभवतः गलत डाक्टरी इलाज के कारण मृत्यु हो गयी. उस दिन से आज तक श्री श्रीवास्तव लगातार सभी प्रकार की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न्याय के लिए संघर्षरत हैं. इस प्रक्रिया में उन्हें ना जाने किन-किन गलियों से गुजारना पड़ा है जिनसे वे एक बैंकर के रूप में पूर्णतया अनजान थे, लेकिन आज वे आप कोर्ट-कचहरी, पुलिस थाने से लेकर मेडिकल काउन्सिल तक कहीं दिख जायेंगे.

श्री श्रीवास्तव मेरे पास कुछ विधिक बिंदुओं पर चर्चा हेतु आये थे. उनका कहना था कि उन्होंने मेरी काफी चर्चा सुनी थी और वे अपनी पत्नी की मृत्यु से जुड़े मामलों में अनौपचारिक रूप से परामर्श करना चाहते थे. उन्होंने मुझे बताया कि एफआई अस्पताल, लखनऊ के डॉ. विपुल शाह उनकी पत्नी की मौत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने उनके कंधे के दर्द को स्पष्टतया गलत ढंग से रयुमेटॉयड आर्थराईटीस बता दिया और इसके लिए गलत और निषिद्ध ड्रग लेफ्रा (लेफ्लुनोमाइड) दे दिया.

श्री श्रीवास्तव के अनुसार डॉक्टर को लेफ्रा हेपाटोटोक्सिलोजी ड्रग और उनकी पत्नी के लीवर रोग के बारे में इलाज किये

निधि
जाने के पूर्व से पूरी जानकारी थी और ऐसे मामलों में लेफ्रा ड्रग के बनाने वाले टोरेंट फार्मा कंपनी द्वारा लिखित रूप से पूर्ण मनाही और निषेध के बावजूद, डॉ. शाह ने मात्र रयुमेटॉयड आर्थराईटीस बीमारी की आशंका के आधार पर उन्हें यह गलत दवा दे दी. डॉक्टर ने जो लेफ्रा दवा दी थी वह मात्र तीव्र और पुराने रयुमेटॉयड आर्थराईटीस के मामलों में दिया जाता है, जबकि सुश्री निधि को हो रहा कंधे का दर्द किसी भी प्रकार से इस रयुमेटॉयड आर्थराईटीस के प्रारंभिक लक्षणों में नहीं आता था, और ना ही डॉक्टर ने लेफ्रा दवा दिये जाने के पहले किसी प्रकार का कोई आवश्यक डाक्टरी परीक्षण ही किया था. इस प्रकार डॉक्टर ने स्वतः ही बिना किसी चिकित्सकीय परीक्षण और डायगोनोस्टिक टेस्ट के उनकी पत्नी को रयुमेटॉयड आर्थराईटीस बता दिया और एक ऐसा खतरनाक दवा दे दिया जो उनकी मौत का जिम्मेदार बन गया.

श्री श्रीवास्तव दूर-दूर तक मेडिकल के जानकार नहीं हैं पर न्याय की उत्कट इच्छा ने उन्हें ना सिर्फ मेडिसिन बल्कि आरटीआई, विधि और अन्य तमाम विषयों का विशेषज्ञ भी बना दिया है. उन्होंने आरटीआई का प्रयोग करते हुए ना सिर्फ भारत बल्कि इंग्लैंड के जनरल मेडिकल काउन्सिल और अमेरिका के डिविजन ऑफ औक्यूपेशन एंड प्रोफेशनल लाइसेंसिंग (डीओपीएल) तक से यह तथ्य ले आये कि डॉ. शाह अपने पर्चे पर जो इंग्लैंड और अमेरिका की डिग्रियां दिखाते हैं वे फर्जी डिग्रियां हैं और उन्हें इस प्रकार की कोई डिग्री उन देशों की सक्षम संस्थाओं द्वारा नहीं प्रदान की गयी हैं.

डॉ. श्रीवास्तव ने इसके बाद थाना कैसरबाग, लखनऊ में एफआईआर संख्या 246/2011 अंतर्गत धारा 420/304 आईपीसी बनाम डॉ. विपुल शाह दायर किया. उनका कहना है कि यहाँ उन्हें एक नए किस्म के झमेले का सामना करना पड़ा. उनका कहना है कि जहाँ पुलिस ने शुरू में तहरीर के आधार पर धारा 304 आईपीसी दर्ज किया था, वहीँ उसे बाद में पुलिसवालों ने मिलीभगत करके धारा 304ए में गलत ढंग से परिवर्तित कर दिया. इन दोनों धाराओं में बहुत अंतर है क्योंकि जहाँ धारा 304 सदोष मानव वध है वहीँ धारा 304ए लापरवाही के कारण मौत है, जिसमे सजा बहुत कम है.

इसके बाद श्री श्रीवास्तव एक लंबी कानूनी लड़ाई में उलझे जब डॉ. शाह ने एफआईआर खारिज करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिका संख्या 8186/2011 दायर किया. श्री श्रीवास्तव द्वारा कोर्ट के सामने सारे तथ्य रखे जाने पर कोर्ट ने ना सिर्फ डॉ. शाह का मुक़दमा खारिज किया बल्कि उन्होंने डॉ. शाह और दोषी पुलिसवालों के प्रति भी अत्यंत तल्ख़ टिप्पणी की-“ इस मामले में सरकारी दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया गया है जो एक अत्यंत गंभीर प्रकरण है”. हाई कोर्ट ने इस मामले की जांच करा कर सभी दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिये थे. श्री श्रीवास्तव इस सम्बन्ध में की गयी जांच से संतुष्ट नहीं हैं और उनका दृढ मत है कि इस मामले को बाद में रफा-दफा करते हुए दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने का पूरा प्रयास किया गया है.

इसी बीच उन्होंने उत्तर प्रदेश मेडिकल काउन्सिल में डॉ. शाह के विरुद्ध याचिका दायर की जिसे काउन्सिल ने अपने आदेश दिनांक 14/10/11 द्वारा निक्षेपित कर दिया. श्री श्रीवास्तव यूपी काउन्सिल की रिपोर्ट से कदापि संतुष्ट नहीं हैं. उनका मानना है कि काउन्सिल ने यह मानने से अस्वीकार कर दिया था कि उनकी पत्नी की मृत्यु लेफ्लूनोमाइड दवा के कारण सृजित हेपाटाईटीस के कारण हुई थी जबकि फोर्टिस अस्पताल, नयी दिल्ली में उनका आखिरी इलाज करने वाले डॉ. अशोक कुमार ने यह बात लिखित रूप से कही है और उस दवा के अत्यंत गंभीर दुष्परिणाम के सम्बन्ध में दवा निर्माता कंपनी टोरेंट फार्मा ने ड्रग कंट्रोलर जनरल (सीडीएससीओ), नयी दिल्ली को अपनी रिपोर्ट दिनांक 04/06/11 में बताया था.

श्री श्रीवास्तव के अनुसार इस जांच रिपोर्ट ने गलत ढंग से डॉ. शाह द्वारा किये गए इलाज को टोरेंट फार्मा कंपनी के लेफ्रा ड्रग के कवर पर लिखे गए स्पष्ट वार्निंग और निषेध के बाद भी स्वीकार नहीं किया जबकि उच्चतम न्यायालय ने मलय कुमार गांगुली बनाम डॉ. सुकुमार मुखर्जी (2009(9)एससीसी 221) में साफ़ तौर पर आदेशित किया है कि किसी भी डॉक्टर द्वारा किसी दवा के सूचना मोनोग्राम पर अंकित किसी भी निर्देश का उल्लंघन चिकित्सकीय लापरवाही की श्रेणी में मानी जायेगी. श्री श्रीवास्तव ने इसके अलावा चौदह अन्य भी कारण प्रस्तुत किये हैं, जिनके आधार पर वे यूपी मेडिकल काउन्सिल के फैसले को गलत मानते हैं और इन 16 आधारों पर उन्होंने इस फैसले को मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया के सामने चुनौती दी है.

डॉ. शाह ने उच्चतम न्यायालय में अपने सम्बन्ध में एक मुक़दमा किया, जिसमें उन्हें गिरफ्तारी आदि के सम्बन्ध में कुछ छूट मिली है, पर श्री श्रीवास्तव भारत के उच्चतम न्यायिक पटल पर भी पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. एक ऐसे व्यक्ति को, जो मूल रूप से बैंकिंग व्यवसाय में हो, इस प्रकार कानूनी, पुलिसिया और मेडिकल जगत में अपनी उस पत्नी, जिसे वे बहुत प्यार करते थे और जिसके लिए किये जा रहे अपने इस युद्ध को वे अपनी पत्नी के प्रति अपनी आखिरी सेवा और सम्मान के रूप में मानते हैं, से जुड़े मामले में इस प्रकार पूरी शिद्दत और गहराई से संघर्षरत देख स्वतः ही उनके प्रति असीम सम्मान और आदर के भाव जग जाते हैं. वे कहते हैं कि वे यह सब किसी मौद्रिक लाभ के लिए नहीं बल्कि इस पुनीत उदेश्य से कर रहे हैं कि भविष्य में कोई अन्य निधि इस प्रकार किसी डॉक्टर की जानबूझ कर की गयी लापरवाही और उसके पेशागत बेईमानी के कारण असमय मौत के मुंह में ना समा सके.

अब तक श्री श्रीवास्तव अपनी यात्रा में आधे से भी कम दूरी चल सके हैं और उनके ज्यातादर प्रयास तमाम झंझावातों, दुश्वारियों, कानूनी दांवपेंच में उलझे हुए हैं लेकिन मेरे लिए उनकी जीत से कई गुणा महत्वपूर्ण उनकी लड़ने की हिम्मत, उनका आतंरिक विश्वास और उनका अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण है. मैं उनकी जीत और हार से परे उन्हें एक सच्चा योद्धा और देश और समाज के लिए मिसाल के तौर पर मानता हूँ जिन्होंने लगातार अपने कार्यों से न्याय की लौ जलाए रखी है. मैं अपनी बात यह कह कर समाप्त करता हूँ-“ईश्वर करे ऐसे योद्धाओं की संख्या में दिन ब दिन भारी इजाफा हो.”

लेखक अमिताभ ठाकुर यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. 

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