ऊंची पकड़ है तो अपराधियों के भी बन जाते हैं शस्त्र लाइसेंस

सुलतानपुर : भले ही आम लोगों को शस्त्र लाइसेंस पाने के लिए दर-दर भटकना पड़े लेकिन रसूख अच्छी है तो अपराधियों को भी लाइसेंस बड़े आसानी से मिल जाएगा। इसका खुलासा नगर कोतवाली पुलिस ने कर दिया है। अवैध असलहे के कारोबारी को पुलिस ने शस्त्र लाइसेंस बनवाने के मामले में भले ही जेल भेज दिया गया हो लेकिन इससे जिला व पुलिस प्रशासन की कलई खुल गई है। आरोपी की दलील है कि जब उसने लाइसेंस पाने के लिए आवेदन किया था तो उस पर मुकदमा नहीं दर्ज था।

पुलिस उस समय सक्रिय हुई जब एक पत्रकार ने दूसरे पत्रकार के खिलाफ पुलिस अधीक्षक के यहां तहरीर दे डाली। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। बहरहाल आरोपी की भी दलील में दम दिखाई पड़ रहा है कि उसने कोई भी साक्ष्य नहीं छिपाया है। उस पर हो रही कार्रवाई गलत है। अगर कार्रवाई होनी ही है तो उसके साथ-साथ रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारियों व लाइसेंस निर्गत करने वाले जिला प्रशासनिक अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाए। बहरहाल माना जा रहा है कि यदि पुलिस गहराई से छानबीन करे तो इस तरह के शस्त्र लाइसेंस बनवाने वालों की लंबी फेहरिस्त नजर आएगी।

अमूमन देखा जाता है कि जब कोई आम आदमी बिना कोई सिफारिश के लाइसेंस फार्म भरता है तो उसकी फाइल अधिकारियों के दफ्तर का चक्कर लगाने के बाद थाने पर पुनः पहुंच जाती है। इसके उलट जब कोई आवेदक माननीय या फिर लक्ष्मी का सहारा लेता है तो तीन महीने के भीतर उसकी फाइल जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचने के बाद उसे शस्त्र लाइसेंस भी मिल जाता है। बानगी के तौर पर कुड़वार ब्लॉक के प्रधान पति राना ने दो साल पहले शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। तब से आज तक उनका लाइसेंस नहीं बन पाया है। राना का कहना है कि उसकी फाइल कई बार जिलाधिकारी कार्यालय में पहुंचने के बाद थाने लौटाई जा चुकी है। जानमाल का खतरा तो है लेकिन कोई भी अधिकारी सुनने वाला नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक फाइल अंतिम छोर पर पहुंचने के बाद सौदेबाजी शुरू कर दी जाती है। मन माफिक सौदेबाजी नहीं करने पर फाइल पुनः थाने पर भेज दी जाती है। सूत्रों का दावा है कि यदि लाइसेंस बनवाने के मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए तो भ्रष्टाचार की परत खुल जाएगी। दूसरा वाकया कोतवाली नगर का है। आरोप है कि वर्ष 2012 में विष्णु कुमार निषाद को अमेठी जनपद की पुलिस ने अवैध असलहे के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा था कि विष्णु असलहा सप्लायर है। गौरीगंज थाने में एसओजी टीम ने मुकदमा अपराध संख्या 449/12 धारा 325 के तहत विष्णु को जेल भेज दिया गया था। इधर बीच सुलतानपुर जिले से विष्णु का शस्त्र लाइसेंस बन गया। शस्त्र लाइसेंस बनने के पीछे भी एक बड़ा खेल है। सूत्रों के मुताबिक शस्त्र लाइसेंस बनवाने में सत्ता पक्ष के एक माननीय ने अहम रोल निभाया था। यहां तक कि विष्णु ने शस्त्र लाइसेंस पाने के बाद शस्त्र खरीदने की भी तैयारी कर ली थी, लेकिन यहां पर अपनों ने ही दगा दे दिया।

शुक्रवार को विष्णु के करीबी ने ही पुलिस अधीक्षक को अवैध ढंग से शस्त्र लाइसेंस बनवाने की पोल खोल दी। सक्रिय हुई पुलिस ने विष्णु को गिरफ्तार कर उसके विरुद्ध 419, 420, 467, 468, 471 आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया। पुलिस का दावा है कि विष्णु ने साक्ष्य छिपाकर शस्त्र लाइसेंस प्राप्त किया है। वहीं विष्णु का कहना है कि उसने कोई भी साक्ष्य नहीं छिपाया है। सितम्बर 2012 में अमेठी जिले की एसओजी ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा था। जबकि उसने अप्रैल 2012 में ही शस्त्र लाइसेंस फार्म जमा कर दिया था। ऐसे मंे उसकी कोई गलती नहीं है। पुलिस ने उस पर बेवजह मुकदमा दर्ज किया है। बहरहाल इस खुलासे से जिला व पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

नगर कोतवाली, डीसीआरबी, सीओ व एएसपी की जांच धरी की धरी रह गई। लोगों का कहना है कि ऐसे ही रहा तो कोई आतंकवादी भी साक्ष्य छिपाकर शस्त्र लाइसेंस बनवा सकता है। सूत्रों का कहना है कि यदि शस्त्र लाइसेंस बनवाने की जांच की जाए तो कई और बड़े खुलासे होंगे। जिस सत्ता पक्ष के माननीय ने विष्णु का शस्त्र लाइसेंस बनवाने में अपनी भूमिका निभाई थी उसी सत्ता पक्ष के माननीय के मिलते जुलते नाम के एक युवक ने भी शस्त्र लाइसेंस बनवा लिया है। बताया जाता है कि उस पर भी कई गंभीर मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। इस बावत अपर पुलिस अधीक्षक डीपीएन पांडेय ने बताया कि विष्णु ने पुलिस को गुमराह कर शस्त्र लाइसेंस बनवाया है। जिस पर उसके विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया है। हालॉकि विष्णु के परिजनों का कहना है कि विष्णु पत्रकारिता में सक्रिय था। जिस वजह से पुलिस वाले उस पर चिढ़े थे, और उस पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया है।

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