एंकरों की मौज हो गई है, जोंक की तरह स्क्रीन पर रेंगते रहते हैं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : भारतीय मीडिया का 'कहा काल ' चल रहा है । इसमें हर कोई कह रहा है । कोई कहने से पहले तो कोई उस कहे के बाद कह रहा है तो कोई कहा कही के बीच में ही कहे जा रहा है । कहाँ से कह रहा है क्यों कह रहा इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है । ऐंकरों की मौज हो गई है । जोंक की तरह स्क्रीन पर रेंगते रहते हैं । धंधे की एक बात बताता हूँ । टीवी में यही एक प्रजाति है जो कुछ काम नहीं करती । मुफ़्तख़ोर हैं सब ।

अगर आप रिपोर्टिंग छोड़ एंकरिंग करना चाहते हैं तो बिल्कुल काजिए । आपके पेशे के हर बड़े लोग ललित निबंध की पाँच दस लाइनें बोल कर पोपुलर हो रहे हैं और पैसे पा रहे हैं तो आपको हक़ नहीं है ऐंकर बनने की । ऊपर से किसी नेता की खिंचाई कर दीजिए तो पत्रकार भी कहलाने लगेंगे । निर्भिक भी लग सकता है नाम में ।

मैं ख़ुद एंकरिंग कर समझ गया कि क्यों एंकर टेढ़ा चलता है । दरअसल वो अहंकार में नहीं चलता बल्कि उसका काम ही कुछ नहीं है इसलिए वो काम करते हुए दिखना चाहता है । टीवी के लोगों कोई ये कहे कि रिपोर्टर बनो तो समझना कि फुसला रहा है । एंकर ही बने रहो । कई बार लोग फ़ोन करते हैं और जल्दी से यह कहते हुए रख देते हैं कि ओह आपका वक्त ले रहे हैं । हँसी आती है मुझे । लोग भी यही समझते हैं कि एंकर काम करता है ।

    Prakhar Mishra Vihaan निर्भिक भी लग सकता है नाम में …
 
    Kumar Sankalp baat pate ki hai Ravish ji,par afsos ye hai k NDTV ka bhi congresikaran hota dikh raha hai…….humare peshe mei kehte hain naa k camera aur microfon se koi chori chipti nahi……..
 
    Prakhar Mishra Vihaan Kumar Sankalp ई बात खुद के दिल को तसल्ली देने के लिए कही जाती है भाई ..एंकर चालीसा का एक हिस्सा है बस
   
    Ila Joshi सुबह सवेरे ख़ुद पर ये सवाल दागने की कोई ख़ास वजह
    
    Satish Pancham Yadav कभी-कभी लगता है कि रिसेप्शनिस्ट से एक दर्जा ऊपर है एंकर, जो आते हैं उन्हें अंदर न भेजकर उनके बीच आपस में बातें करवा कर खुद को और दूसरों को व्यस्त रखता है एंकर
     
    Umesh Dwivedi Anchor ko " Barfy" bolna sikhaye….jaise Priyanka Chopra film mai bolti hai….taki Anchor ko lage kuch kaam hai….
     
    Kumar Sankalp Prakhar ji,hum thehre chote mote log……..humari baaten to mayne bhi nahi rakhti. Sach kahun to khabariya channel aaj kal sirf comedy show hi dikha raha hai…….baad baki jo Ravish ji kahe wahi sahi.
    Humko maloom hai jannat ki haqiqat lekin,
    Dil behlane ko galib ye khayal accha hai……
    Ravish ji jaise khati logo pe antar-dwand accha bhi to nahi lagta naa……
     
    Ravish Kumar कुछ लिखने के लिए मत लिख दीजिए । बात गंभीरता से कही है तो इसे गंभीरता से ही बरतिये । कमेंट करना ज़रूरी नहीं हर बात पर ।
     
    Ravish Kumar सही कहा सतीश
     
    Ravish Kumar कोई ख़ास वजह नहीं है । जोशी जी ।
     
    Kumar Sankalp ummed tutne ka dard hai……samjha kijye sahab
     
    Ila Joshi फिर आप भी कुछ सिर्फ लिखने के लिए मत लिख दीजिये
     
    Deepak Acharya ye log naam bahut jaante hai, baki agadi pachadi kuch nahin..
     
    Satish Pancham Yadav रिसेप्शनिस्ट वाली बात मजाक में कही है रवीश बाबू, दिल पर मत लिजिएगा…….कोशिश करता हूं यदा कदा कि आपका प्राईम टाईम देखूं लेकिन उसी वक्त डीडी भारती पर शास्त्रीय संगीत से जुड़े कार्यक्रम आते हैं सो उस ओर मुड़ जाता हूँ.
     
    Udan Tashtari कमेंट करना ज़रूरी नहीं हर बात पर….सहमत…अतः चुप!!
     
    Ajit Anjum sau fisadi sahmat
     
    Ila Joshi बेचारे बाकी के एंकर्स..
     
    Madhusudan Srinivas ravish, anchor se Angkor ki vaat tak!
     
    Umesh Dwivedi @ Ravishji—-Shayad aapne mujhe samjaya hai ki likhne ke liye mat likhiye……Darasal maine aapki bhawana ko hi aage badaya hai apne comment mai….Priyanka Chopra ne " barfy" bolne ki practice lagatar 27 dino tak ki thi…….Aur aap yadi yah kahte hai ki eak Anchor banana bahut aasan hogaya hai tau kuch sikhaiye…..
     
    Sameer Kapoor Ravishbhai – I agree. Sadly. But i also saw some exceptions. Plus I have often wondered as to why does the system allow this? Commercial organisations which otherwise want returns and productivity continue to accept these holy cows. Why? Blatantly lazy, always arrogant and sometimes not even clean. But still thrive ….
     
    Ravish Kumar Anchors are really bad impact on the internal system of organization. Most of the time it's presence devalues others hard work. Yes system is lazy and has no idea
     
    Sameer Kapoor Sorry. System knows but ignores. I don't know why.
     
    Ritu Kant Ojha Ravish bhai my wife asked me the other day — why is Ravish doing anchoring. Wasn't he doing better work as a reporter-anchor in Ravish Ki Report ! (Though both of us like your anchoring as you sound genuine. But discussions are sooo boring)
    I feel the very segregation in reporter and anchor is stupid. Why should it be demeaning for an editor/anchor to actively report…??
     
    Anoop Joshi sir,jab aadmi kisi kam me nipun ho jata hai to wo phir alochak bhi ho jata hai.chaye wo uska kaam hi kyon na ho.ab aap mujhe dekhe me ab itini tipini karne laga hun ki, apne guru (aap) ki baat kaat raha hun.
     
    Ramnish Kumar Ritu Kant Ojha I think the biggest fault lies with the Editors. Almost all of them want to call politicians, bureaucrats, celebrities etc on their show; have extremely boring and lengthy discussions with them which puts off most of the younger generation. Most of the times commom sensical questions are avoided and discussion revolves around what the editor's mood is for that particular day. As we used to say in Film City "uski baja dee aaj….".

    All juniors who look upto the senior managment (all of them into anchoring) want to sit in a studio and give gyaan and take fat salaries. Howsoever senior reporter you are, the anchor will hog all the limelight.

    I do not remember if even a single TV editor actually goes to ministries or report from the spot! At least I have not seen a single one….
 
    Santosh Kumar Ravish jee , kiya aap par bhi Jaipur Chintan – Chinta shivir ka asar ho gaya hai kiya….
 
    Santosh Kumar Jyada Tension mat lijiye …
   
    Ravish Kumar नहीं संतोष जी टेंशन ही नहीं होता अब
    
    Santosh Kumar Chaliye Ravish jee, isi pira ke sath prime time ki ahuti de kar phir se ek baar Ravish ki Report shuru kar dijiye…
     
    Shishir Soni रविश की बात से मैं सौ फीसदी सहमत नहीं हूँ। ऐसा सिर्फ एनडीटीव़ी में ही होता है। जहाँ एंकर्स को रिपोर्टिंग की बारीकियों से कोई मतलब नहीं। बस पैरवी वाला सुंदर मुखड़ा देखा ऑनएयर कर दिया। किसी ब्यूरोक्रेट के परिवार से है तो सोने पे सुहागा। न भाषा की समझ न ख़बरों का ज्ञान। रविश ने तो शुरुआत 2000-2003 में रिपोर्टिंग की है लेकिन कई ऐसे एंकर्स हैं जिन्हें स्टूडियो से बाहर भेजा जाए तो उन्हें सर्दी ज़ुकाम हो जाये। भाषा की जितनी अशुद्धियाँ स्क्रोल और खबर वाचन में एनडीटीव़ी में हैं कही नहीं है। ये सब अहंकार की वजह से है। निठल्ले बन के जब लाखों मिल रहे हैं तो इनकी बला से।
     
    Santosh Kumar Ab hum darshak bhi tension nahi lete … Ab hum log bhi used to… Ho gaye hai …
     
    Ashok Dusadh लेंकर ,एंकर हो गए क्या, सर जी
     
    Mukul Srivastava आपकी साफगोई को सलाम
     
    Divya Gupta Jain
     
    Swati Arjun चूंकि सिस्टम का हिस्सा होने के नाते मुझे लगता है कि इस संकट से उबरने के लिेए सोचविचार से ज्यादा काम करने की ज़रुरत है. अगर हर चैनल पांच या छह दिन की शिफ्ट में दो दिन इन एंकर्स की ड्यूटी डेस्क या रिपोर्टिंग या रिसर्च में लगाए तो स्थिती में सुधार हो सकता है. Stereotype से बचने की ज़रुरत है.
     
    Priti Shekhar I disagree ravish. Aap anchors ki nahi mathadhishon ki baat kar rahe hain, yahan bhi class difference hai. Aap un anchors ka apmaan kar rahe hai jo 8 -8 ghante tak breaking news banakar chillate rahte hai aur producer talkback par ek line ki khabar bata kar kahta hai rap karte raho aur apna gyan baki logon ke samne bagharta rahta hai. So I disagree
     
    Ravish Kumar मैं उसी को काम नहीं मानता ।
     
    Priti Shekhar Main yahi to kahalwana chahti thi. Mathadhish aur mazdoor.
     
    Krishna Kumar Kanhaiya रविश जी जनता तो यही सोचती है कि एंकर कितना ज्ञानी है बिल्कुल कालीदास की तरह…लेकिन उन्हें नहीं पता कि ज्यादातर एंकर टीपी देखकर ज्ञान बांटते हैं..वैसे कुछ अच्छे और जानकार एंकर भी है…लेकिन कभी ज्ञान की उल्टी ज्यादा करने लगते हैं…..और रही बात रिपोर्टर की तो ज्ञान के आधार पर नहीं बल्कि नेताओं से गुफ्तगू के आधार पर रिपोर्टिंग करते हैं…..

जाने-माने टीवी एंकर और एनडीटीवी के खास चेहरे रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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