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एएनआई में अंदर ही अंदर असंतोष की आग, पंद्रह वर्षों का नाता तोड़ रही हैं अजीथा मेनन

खबर है कि समाचार एजेंसी एएनआई से पंद्रह वर्षों का साथ अजीथा मेनन छोड़ रही हैं. अजीथा कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार हैं और एएनआई की ब्यूरो चीफ हैं. अजीथा ने एक महीने का नोटिस एएनआई प्रबंधन को दिया है. सूत्रों का कहना है कि एएनआई मैनेजमेंट की मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर अजीथा ने इस्तीफा देने का फैसला लिया. पत्रकारिता में कोलकाता यूनीवर्सिटी से गोल्डमेडलिस्ट रहीं अजीथा को कई फेलोशिप मिल चुके हैं.

खबर है कि समाचार एजेंसी एएनआई से पंद्रह वर्षों का साथ अजीथा मेनन छोड़ रही हैं. अजीथा कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार हैं और एएनआई की ब्यूरो चीफ हैं. अजीथा ने एक महीने का नोटिस एएनआई प्रबंधन को दिया है. सूत्रों का कहना है कि एएनआई मैनेजमेंट की मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर अजीथा ने इस्तीफा देने का फैसला लिया. पत्रकारिता में कोलकाता यूनीवर्सिटी से गोल्डमेडलिस्ट रहीं अजीथा को कई फेलोशिप मिल चुके हैं.

एएनआई मैनेजमेंट अब अपने लोगों से गुलामों की तरह काम कराना चाहता है. खासकर कैमरामैनों से बीस-बीस घंटे की ड्यूटी कराने की कोशिश कर रहा है. साथ ही एएनआई की तरफ से इन कैमरामैनों को लिखित में कुछ भी नहीं दिया जा रहा है. अजीथा ने इस प्रवृत्ति के खिलाफ जब आवाज उठाई तो प्रबंधन उन्हें परेशान करने लगा. सूत्रों के मुताबिक एएनआई प्रबंधन की तरफ से जितने लोगों को अपने यहां काम दिया गया है, उसमें से करीब सत्तर फीसदी लोगों को कोई कांट्रैक्ट लेटर नहीं दिया गया है. जिनको कांट्रैक्ट लेटर दिया जाता है, उनका लेटर रिन्यू नहीं किया जाता. कांट्रैक्ट लेटर में बिना नोटिस बाहर निकालने का क्लाज रखा जाता है जो लेबर लॉ के खिलाफ है.

यहां ज्यादातर अनक्वालिफाइड लोगों को भर्ती किया गया है. कुछ लोग प्लस टू पढ़े हैं पर उन्हें जब-तब विदेश भेजा जाता है रिपोर्टिंग के लिए. ऐसा इसलिए क्योंकि वो लोग बॉस के करीबी हैं. यही अनक्वालीफाइड लोग ब्यूरो में बैठे सीनियर और क्वालिफाइड लोगों को आर्डर देते हैं और न्यूज की समझ ना रखते हुए, लाजिस्टिक की समझ ना रखते हुए ब्यूरोज को गंदी गाली भी बकते हैं. कुछ दिन पहले रायपुर के सारथी जी को रिपोर्टर से लाइव ही असिस्टेंट बना दिया गया. इस वजह से उन्होंने भी नौकरी छोड़ दी.

एएनआई के कुल्लू ब्यूरो चीफ प्रेम ठाकुर ड्यूटी के वक्त हादसे में मारे गए कुछ महीने पहले. वो एएनआई में दस वर्षों से थे. पर ऐसे वक्त में एएनआई ने कहा कि वो हमारे स्टाफ नहीं थे. उनकी फेमिली को एक पैसा भी एएनआई की तरफ से नहीं दिया गया. एएनआई की मनमानी का कोई तोड़ नहीं है. कब तक ये मैट्रिक और प्लस टू वाले बंदे ब्यूरोज में काम कर रहे क्वालिफाइड पत्रकारों का खून चूसते रहेंगे. इनका भंडाफोड़ क्या कभी संभव नहीं है? क्या लेबर डिपार्टमेंट, प्रेस काउंसिल आफ इंडिया, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आदि के लोग इनकी इनक्वायरी नहीं करेंगे?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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