एकदम छोटी-सी स्कर्ट में उर्मिला को देख हम लोग सकपकाए कि पिताजी क्या सोच रहे होंगे

Sanjay Sinha :  जिस साल आमिर खान और उर्मिला मातोंडकर की फिल्म 'रंगीला' आई थी, मेरे पिताजी जीवित थे। मैं, मेरी पत्नी, मेरा बेटा, छोटे भाई का परिवार और पिताजी, सब साथ गए थे बड़ौदा के उस सिनेमा हॉल में 'रंगीला' देखने। पीछे का टिकट नहीं मिला था, इसलिए आगे की सीट पर हमने बैठ कर 'रंगीला' नाइट शो में देखी। उर्मिला मातोंडकर का गाना आया, एकदम छोटी सी स्कर्ट में उर्मिला को देख कर हमलोग थोड़ा सकपका गए कि पिताजी क्या सोच रहे होंगे।

पूरी फिल्म देखने के बाद पिताजी ने पूछा कि वो लड़की कौन थी। मैंने कहा उर्मिला मातोंडकर। तो पिताजी ने कहा कि अच्छी एक्टिंग की है। हमारी सांस में सांस आई कि पिताजी ने ज्यादा टोका टाकी नहीं की… खैर, पिताजी बड़ौदा में छोटे भाई के पास कुछ दिन और रह कर दिल्ली आने वाले थे। मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ अगले दिन शाम को दिल्ली वापस चला आया था। हमारी वापसी के तीसरे दिन बड़ौदा से छोटे भाई की पत्नी ने फोन किया कि पिताजी को बुखार हो गया है, उन्हें पास के नर्सिंग होम में भर्ती करा दिया है। मेरा छोटा भाई बड़ौदा से अहमदाबाद टूर पर गया था, और उसकी पत्नी को जितना समझ में आया उसने कर दिया।

मुझे जरा चिंता हुई। मैंने डॉक्टर का नंबर लिया और उस नर्सिंग होम में डॉक्टर से बात की। डॉक्टर ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, उन्हें बुखार है, ठीक हो जाएगा। मैंने पूछा कि आपने खून जांच की होगी, क्या निकला? डॉक्टर ने कहा कि नहीं, अभी तो पानी चढ़ा रहा हूं, कल खून की जांच के लिए भेजूंगा। मेरे मन में खटका हुआ। खैर, मैंने फिर छोटे भाई की पत्नी को फोन किया तो उसने बताया कि सब ठीक है। एक दिन और बीता और तीसरे दिन छोटा भाई बड़ौदा लौट आया था। आते ही वो पिताजी के पास गया। पिताजी ने उससे बात कि और कहा कि संजय को बुला दो।

भाई ने मुझे फोन किया। मैंने कहा कि कल सुबह की फ्लाइट से चला आउंगा। उन दिनों शायद सिर्फ इंडियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट दिल्ली से बड़ौदा जाती थी, या फिर अहमदाबाद से बड़ौदा जाना पड़ता था। रात में एक बार फिर फोन किया। तो पता चला कि खून जांच की रिपोर्ट आ गई है। डॉक्टर ने फाल्सीफेरम मलेरिया बताया है। मैं रात भर सपने में पिताजी को देखता रहा। पिताजी मुझे बुला रहे थे। चार दिन पहले उनसे मिल कर आया था। उनके साथ मैंने रंगीला फिल्म देखी थी। और आज पिताजी फिर मुझे बुला रहे हैं, यकीनन पिताजी परेशान हैं। सारी रात जागे हुए सोता रहा। सोते हुए जागा रहा।

सुबह-सुबह कनॉट प्लेस गया, नौ बजे टिकट काउंटर खुला। अहमदाबाद का हवाई टिकट मिला। टिकट लिया। दस बजे वापस लौटते हुए आईटीओ पुल के पास मुझे पता नहीं क्यों लगा कि पिताजी सामने खड़े हैं, और कह रहे हैं कि देर कर दी बेटा। मैं बहुत उदास होकर घर पहुंचा, तो पत्नी फोन पर बात कर रही थी, और रो रही थी। मैंने उससे पूछा कि पिताजी नहीं रहे क्या? तो वो सुबक पड़ी।
मैं भागा-भागा अहमदाबाद गया, वहां से टैक्सी लेकर बड़ौदा पहुंचा।

पिताजी की लाश घर आ चुकी थी, बर्फ की सिल्ली पर रखी थी। यकीन नहीं हो रहा था कि चार दिन पहले उर्मिला को नाचते देख कर मुस्कुराते हुए पिताजी अब नहीं है, सदा के लिए नहीं है। मृत्यु के बाद की औपचारिकता के बाद मैं उस नर्सिंग होम में उस 'डॉक्टर' से मिलने गया, जिससे मैंने फोन पर बात की थी। डॉक्टर ने कहा कि खून जांच के लिए दो दिनों के बाद भेजा। उसके पास खून जांच की सुविधा नहीं थी, जाहिर है किसी और पैथोलॉजिकल लैब में भेजा, जिससे उसका कमीशन बंधा था। रिपोर्ट अपने समय पर आई। फिर डॉक्टर ने 'लैरियम' नामक टैबलेट लिखा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मैंने फाल्सीफेरम मलेरिया के बारे में बहुत पढ़ा। ये मलेरिया का एक जानलेवा रूप है। इस बीमारी के होने पर अगर 'लैरियम' नामक टैबलेट समय पर मिल जाता तो पिताजी सौ फीसदी बच जाते। लेकिन देश के किसी 'डमडम डिगाडिगा' छाप मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री पाए उस डॉक्टर को मलेरिया के इस रूप के बारे में कुछ पता ही नहीं था। इस बीमारी में मलेरिया के जीवाणु तय समय पर दवा न मिलने पर किडनी, दिमाग और फेफड़ा पर अटैक करते हैं। पिताजी की किडनी फेल होने लगी थी, शरीर सूजने लगा था तब भी डॉक्टर 'बुखार-बुखार' कहता रहा। फिर फेफड़ा पर संक्रमण हुआ, और फिर दिमाग पर। उसके बाद 'लैरियम' टैबलेट दें, या कुछ और पिताजी नहीं बच सकते थे।

डॉक्टर मेरे सामने खड़ा था, और कह रहा था सॉरी, मैं नहीं बचा पाया। उफ! एक हत्यारा मेरे सामने खड़ा था, और मैं कुछ नहीं कर सकता था। करता भी क्या? हमारे देश में कोई भी राजनेता, उद्योगपति 20-25 लाख रुपए लेकर किसी को अपने 'डमडम डिगाडिगा' कॉलेज से डॉक्टर बना सकता है। और वहां से डॉक्टरी की डिग्री लेकर वो डॉक्टर चौड़ा होकर आपको सॉरी कह सकता है। सिर्फ बताने के लिए बता रहा हूं कि उसी साल पिताजी की मौत के बाद मेरी सासु मां जब बड़ौदा से लौटीं तो उन्हें बुखार हो गया। मैंने अपने एक डॉक्टर मित्र को फोन किया तो उसने कहा कि क्योंकि वो बड़ौदा से आई हैं, इसलिए शक है कि कहीं फाल्सीफेरम मलेरिया ना हो, इसलिए आप इन्हें फलां डॉक्टर को दिखा दें। सासु मां को लेकर मैं उस बुजुर्ग डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने कांपते हाथों से मेरी सास की नब्ज टटोली और कागज पर लिखा- 'लैरियम।'

मैंने पूछा कि 'लैरियम' क्यों? तो उसने कहा कि इन्हें फाल्सीफेरम मलेरिया है। खून जांच बाद में कराइएगा। पहले ये टैबलेट दीजिए, नहीं तो देर हो जाएगी। मैंने वहीं से लैरियम टैबलेट लिया, सासु मां ने एक-एक गोली दो बार खाईं और अस्सी की उम्र में टनाटन हमारे साथ हैं। खूब फिल्में देखती है, और मस्त रहती हैं. जब मेरे पिताजी 'डममडम डिगा डिगा' कॉलेज के हथ्थे चढ़े थे तब 60-62 साल के रहे होंगे। सोचता हूं कि आज होते तो हमारे साथ किसी सिनेमा हॉल में बैठ कर कंगना रनाउत की नई फिल्म 'क्वीन' देखते और कहते कि लड़की हो तो ऐसी हो…!

डॉक्टर ने तो एक बार 'सॉरी' कहा था, मैं हर रोज पिताजी से सॉरी कहता हूं कि काश, आप दिल्ली में होते और उस बुजुर्ग डॉक्टर ने आपकी नब्ज देखी होती, जो सारी ज़िंदगी गले में स्टेथस्कोप लटकाए एक स्कूटर पर घूमता रह गया। ना उसके पास डमडम डिगाडिगा में पढ़ने के लिए कभी 25 लाख हुए और ना कभी नर्सिंग होम खोल कर 25 लाख कमाने की चाहत हुई।

टीवी टुडे ग्रुप से जुड़े वरिष्ठ पत्रका संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

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