एक अप्रैल से होगी बिहार में पत्रकारिता पर अघोषित सेंसरशिप की जांच

बिहार में अघोषित रूप से प्रेस की स्‍वतंत्रता पर सेंसरशिप लागू होने के आरोप सालों से लगते आ रहे हैं. सरकार के खिलाफ खबर लिखने वाले पत्रकारों और अखबारों को तमाम दूसरे तरीकों से परेशान किए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं, जिनमें पत्रकारों को नौकरी से हटवा दिए जाने, तबादला करवा दिये जाने, अखबारों का विज्ञापन रोक दिए जाने की शिकायतें शामिल रही हैं. इन्‍हीं शिकायतों और आरोपों के आधार पर प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने बिहार में प्रेस की आजादी पर सवाल खड़े किए थे.

काटजू के सवाल खड़े करने पर बिहार की पत्रकारिता दो खेमों में बंट गई थी. एक तरफ उनके समर्थक पत्रकार थे तो दूसरी तरफ विरोधी. जस्टिस काटजू के इस बयान पर बिहार एवं बिहार से बाहर भी काफी हो हल्‍ला मचा था. इसी दौरान काटजू ने स्‍वयं संज्ञान लेते हुए बिहार में पत्रकारिता की स्‍वतंत्रता की स्थिति का पता लगाने के लिए तीन सदस्‍यी समिति गठित करने की घोषणा की थी. बाद में उन्‍होंने राजीव रंजन नाग की अध्‍यक्षता में अरुण कुमार और कल्‍याण बरुआ की तीन सदस्‍यीय समिति गठित की थी.

अब ये समिति 1 अप्रैल से लेकर 4 अप्रैल के बीच बिहार में पत्रकारों की स्थिति तथा पत्रकारिता की स्‍वतंत्रता से संदर्भित तमाम बातों की जांच करेगी. सभी तथ्‍यों का पता लगाएगी. इस संदर्भ में प्रेस काउंसिल की सचिव विभा भार्गव ने बिहार सरकार के मुख्‍य सचिव, सचिव गृह (पुलिस) तथा राज्‍य के निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क को पत्र लिखकर तीन सदस्‍यीय समिति को कई मुद्दों पर सहयोग देने की अपील की है. पीसीआई द्वारा गठित तीन सदस्‍यी 'तथ्‍य खोजी समिति' इसके बाद अपनी जांच रिपोर्ट जस्टिस काटजू को सौंप देगी. 

 

 
 

 

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