एक ज़बानी फरमान आ गया कि मीडिया टीम अब संजय द्विवेदी को रिपोर्ट करेगी

: लौट के फुटेला घर को आए (दो) : कहां तो कंपनी महिलाओं की मदद करने, कराने के लिए एक एनजीओ लाने वाली थी, कहां उस ने एक ऐसी भी लड़की को डिब्बों पे स्टीकर चिपकाने के काम पे लगा दिया जिस को असल में वो एंकर बनाने वाली थी. इस बच्ची को भी मेरे आने से पहले चुन लिया गया था. मुझे जिस दिन वो पहली बार मिली तो मुझे उस की आँखों में एक अजीब किस्म की उदासी दिखी थी. मेरा शक ठीक निकला. उस के सिर पे बाप का साया नहीं था. उसे खाली डिब्बों पे स्टीकर चिपकाते देखना मुझे भीतर तक हिला गया था.

इंडस्ट्री का उसूल है कि किसी भी कंपनी की नौकरी आप करो तो उस में आप की निजी सोच या संबंधों के कोई मायने नहीं होने चाहिए. लेकिन उन का क्या जिन्हें एक लाइन लिखनी आती न हो और आप का अपना भी आकलन उन जैसों के हिसाब से होने वाला हो. काम की समझ न हो और भाषा भी न आती हो तो आप सिखा भी लो.  मात्राएं तक न आती हों तो किस दीवार में अपना सिर मारो आप! … ये एक ऐसे आदमी की छुट्टी का आवेदन है जो आज की तारीख में चैनल का चीफ रिपोर्टर है.

''निवेदन यह हँ ! की में किसी जरूरी कम से कल दिनाक 15 जून को अवकाश पर रहूगा ! इस लिय आपको सूचनार्थ मेल भेज कर अवगत करवा रहा.. धन्यवाद ''

ये एप्लीकेशन देख के मुझे उस घटना की याद आई कि एक जगह कोई कवि सम्मलेन हो रहा था. सब के सब कवि घटिया. लोग लट्ठ ले के स्टेज पे चढ़ गए. कवि लठैतों से बोले, अपना काम शुरू करो. हमें तो ऐसी ही कविताएं आती हैं. मगर लठैतों में से एक बोला कि तुम अपनी कविताएं जारी रखो. हम तो उन्हें ढूंढ रहे हैं जो तुम्हें बुला के लाए हैं.

मात्राएं आप अपनी तरफ से लगा भी लो तो ये समझना मुश्किल है कि ये असल में छुट्टी ही है या महज़ एक सूचना है…और ये तेवर किसी का भी तब होता है कि जब वो आप की टीम में पैराशूट से उतरा हुआ होता है. बहरहाल इस बंदे से बार बार अपने और औरों के लिए गाड़ी ड्राइव करने को कहा गया. कहा ही जाता रहा जब तक उस ने बगावत नहीं कर दी. आखिर शूट शुरू होने के कोई तीन हफ्ते बाद एक ड्राइवर आया. शूट या किसी भी काम के लिए किसी एकाउंटेंट की कोई व्यवस्था आज तक नहीं है. बल्कि बीच में तो एक बार ये भी कहा गया कि जो भी शूट पे जाए, अपनी जेब से टैक्सी या तेल के पैसे दे दे, वापिस आ के बिल दे दे. ये उम्मीद उन से की गई जिन के पास अपाइंटमेंट लैटर कोई नहीं है और तनख्वाह भी जिन्हें एक महीने के ऊपर आधा महीना और बीत जाने के बाद मिलने वाली है.

दिल से … मैं किसी को भी निकालने के हक़ में नहीं था. कायदे कानूनों, कमियों खूबियों के बीच एक अप्रोच मानवीय भी होनी ही चाहिए. मैं होता तो शायद ऐसे लोगों नहीं लेता. लेकिन पैराशूट से ही सही आ ही जब गए तो उनको निकालने के लिए कसाई सा जो कलेजा चाहिए, वो मुझ में है नहीं. सो, मैंने सोचा कि स्कूल मास्टरी भी करनी पड़ी तो करूंगा. लेकिन सब को सिखाऊंगा. कागज़ पे बुलेटिन बनने लग गया था. सभी लोग सीखने, बेहतर होने लगे थे. इतने में एक मेल आ गई कि सब का इवेल्यूएशन होगा. मैं समझ रहा था कि समाचारों से स्टिकरों तक ले आने के बाद ये लोगों को निबटाने की तैयारी थी. वो मेल टीम को मेरी मार्फ़त या मेरी जानकारी में भी नहीं गई. मुझे पता चला तो रात में मैंने जगमोहन फुटेला स्टाइल में उस का जवाब लिखा. मैंने पूछा कि वीटीआर मशीन के बिना वीटी एडिटर की और उस के किसी काम के बिना प्रोग्रामिंग या आउटपुट हेड की इवेल्युएशन कैसे होगी? मूल सुविधाओं के बिना बाकी टीम की कैसे? मैंने ये भी पूछा कि स्ट्रिंगरों के बिना इनपुट हेड के काम की परख कैसे हो रही है और स्ट्रिंगरों को क्या देना है इस बारे में कोई फैसला ले कर इनपुट हेड को कुछ बताया ही कब गया है. मैंने कहा मुझे बताया जाए कि इनपुट एडिटर जब कोई भी कमिटमेंट कर के स्ट्रिंगरों से खबरें मंगाएगा और कंपनी अगर कल किसी को कोई पैसा कल देगी नहीं तो जैन टीवी की तरह ज़हर खा के मर जाने वाले स्ट्रिंगरों जैसे केसों को भुगतेगा कौन?

इस मेल का जवाब तो कभी नहीं आया. एक ज़बानी फरमान आ गया कि मीडिया टीम अब संजय द्विवेदी को रिपोर्ट करेगी. इतनी हिम्मत किसी में नहीं थी कि इस का एक मेल ही जारी कर दे. इस की वजह सिर्फ ये नहीं थी कि संजय मूल रूप से संपादकीय विभाग देखने भी नहीं वाले थे. वजह ये है कि कंपनी किसी को संपादक घोषित कर ही नहीं सकती थी. संपादक के रूप में सूचना प्रसारण मंत्रालय के रिकार्ड में आज भी उन विनोद मेहता का नाम है जिन्हें ये कंपनी छोड़ के गए भी अब ज़माना बीत चुका है. रोज़ उन्हें 'खबरें अभी तक' पे दुनिया के देखने के बावजूद कंपनी उन्हें अपना ऑन रिकार्ड एडिटर बता के चल रही है. विनोद मेहता के भी जाने की एक कहानी है. वे चैनल के सर्वेसर्वा थे और उन से कहा गया कि वे आते जाते हाजिरी वाली मशीन पे उंगली लगा के जाया करेंगे. विनोद मेहता की उस कम हाज़िरी की तनख्वाह भी काटी जाने लगी जब वे चैनल का लायसेंस दिलाने के सिलसिले में तमाम सरकारी दफ्तरों में जूते घिसाते फिर रहे होते थे.

दरअसल मेरा मानना ये है कि कंपनी को किसी बाहरी आदमी संपादक की ज़रूरत ही नहीं है. बल्कि किसी भी संपादक की नहीं. चैनल की संपादक, खुद किरन के मुताबिक, उन्हें होना है. किरन हरियाणा के स्पीकर रह चुके डा. रघुबीर सिंह कादियान की बेटी की ननद हैं. वे अपने अब तक के जीवन में कभी किसी अख़बार या चैनल की एक दिन भी स्ट्रिंगर तक नहीं रही हैं. इधर भाई की कंपनी में आने से पहले वे कुछ समय साधना चैनल के विज्ञापन विभाग में रही हैं. हिंदी में आने वाले चैनल का 'आई विटनेस' जैसा अंग्रेजी नाम उन्हीं की देन है. चैनल की डिस्ट्रीब्यूशन के मामले में वे एक नया प्रयोग करने जा रही हैं. जिस चैनल को महीने भर में लौंच होना हो, उस की डिस्ट्रीब्यूशन के लिए बंदा अभी कोई नहीं है. मार्केटिंग के लिए भी कोई नहीं. सुना है चैनल ऑन डिमांड होगा. ये भी किसी ने कभी सुना, सोचा नहीं होगा. ये क्या होता है, अगली क़िस्त में पढ़िए.

… जारी ….

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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लौट के फुटेला घर को आए (एक)

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