एक निराश चिट्ठी मुख्यमंत्री के नाम

अखिलेशजी, जब आप क्रांति रथयात्रा लेकर गोरखपुर आए थे तब मैं हिन्दुस्तान हिन्दी में संवाददाता हुआ करता था। अखबार की तरफ से बगैर कोई एसाइनमेंट मिले मैं एक नौजवान नेता से मिलने की उत्सुकता में सर्किट हाउस पहुंच गया। नौसढ़ से महाबीर छपरा तक आपके रथ में मैंने भी सवारी की और आपका एक साक्षात्कार छापा था। सम्पादकीय विभाग के उच्चाधिकारियों के निर्देश के बगैर वह साक्षात्कार छापने के लिए मुझे खरी-खोटी भी सुननी पड़ी थी।

आपसे करीब 20 मिनट की वह मुलाकात याद आती है और आज का आपका काम देखता हूं तो बड़ी निराशा होती है। आपसे बात करने के बाद मुझे भरोसा हो गया था कि मुख्यमंत्री आप ही बनेंगे न कि मुलायम सिंह यादवजी। जब चुनाव के बाद सत्ता में सपा आई और आपको मुख्यमंत्री बनाया गया तो बड़ी उम्मीदें पाल ली मैंने। यह मेरे लिए रोमांचित करने वाला विषय था कि जिस शख्स से मैंने निजी तौर पर बात की वह प्रदेश की बागडोर संभाल चुका है। अब मैं किसी समाचारपत्र में काम नहीं करता।   
 
07 मार्च 2013 को हिन्दुस्तान अखबार पढ़ने के बाद मुझे अफसोस हुआ कि आपके नेतृत्व की दिशा सही नहीं है। एक ही दिन की तीन घटनाओं ने मुझे उद्वेलित किया और मैं सोचने पर विवश हूं कि आप अपनी काबिलियत का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। आपकी पुलिस बगैर वारंट के गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार करने पहुंच जाती है। उन्हें ट्रेन से उतारती है और एक  नागरिक के तौर पर मूल अधिकारों और बतौर सांसद उनके विशेषाधिकार का हनन करती है। अखबार के मुखपृष्ठ पर यह घटना पढ़कर बड़ा अफसोस हुआ।

कुंडा में सीओ की हत्या का मामला अभी थम भी नहीं पाया कि गोरखपुर में अधिवक्ताओं के एक समूह ने सीओ बांसगांव को न्याय की दहलीज पर पीट दिया। आपके अफसर संदेश देने में विफल रहे। अगर पुलिस का उच्चाधिकारी कचहरी में न्यायधीश के सामने सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी कहां सुरक्षित है? गोरखपुर कलक्ट्रेट कचहरी से कुख्यात अपराधी फरार हो गया। यहां भी आपकी पुलिस पिट गई। कैसे अफसर तैनात कर रखे हैं आपने? पुलिस और जनता के बीच खाई क्यों बढ़ती जा रही है? क्या पुलिस महकमे का एक बड़ा हिस्सा केवल उस रकम की वापसी में नहीं जुटा हुआ है जो उसने तैनाती के समय ‘इन्वेस्ट’ किया था। साल भर के लिए योग्य पुलिस अधिकारियों की तैनाती एक ही बार क्यों नहीं कर देते आप? अभी उम्मीद खत्म नहीं हुई है। कुछ करिए अखिलेशजी। मुझे अभी भी ओज से भरा आपका वह चेहरा याद है जो मैंने रथ में साक्षात्कार के दौरान देखा था।

वेद प्रकाश पाठक
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
गोरखपुर

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