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एक हैं नीरज पटेल : वे संपादकों को खटकने लगे, संपादक उन्हें पटकने लगे

एक हैं नीरज पटेल. नाम से जाहिर है कि पिछड़ी जाति के हैं. सो, यकीन के साथ कोई भी कह सकता है कि इन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन यानि आईआईएमसी तक पहुंचने में कितनी जद्दोजहद करनी पड़ी होगी. नीरज पटेल न सिर्फ आईआईएमसी पहुंचे बल्कि अपनी प्रतिभा से सबको लोहा मनवाया. लगातार नए नए एंगल से सोचने, लिखने, बात करने वाले नीरज पटेल की नियुक्ति एक दिन हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के आगरा संस्करण में हो गई. वहां उन्हें नगर निगम समेत कई बीट कवर करने को थमा दिया गया. नीरज पटेल रिपोर्टिंग करने लगे.

एक हैं नीरज पटेल. नाम से जाहिर है कि पिछड़ी जाति के हैं. सो, यकीन के साथ कोई भी कह सकता है कि इन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन यानि आईआईएमसी तक पहुंचने में कितनी जद्दोजहद करनी पड़ी होगी. नीरज पटेल न सिर्फ आईआईएमसी पहुंचे बल्कि अपनी प्रतिभा से सबको लोहा मनवाया. लगातार नए नए एंगल से सोचने, लिखने, बात करने वाले नीरज पटेल की नियुक्ति एक दिन हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के आगरा संस्करण में हो गई. वहां उन्हें नगर निगम समेत कई बीट कवर करने को थमा दिया गया. नीरज पटेल रिपोर्टिंग करने लगे.

नीरज पटेल सख्त रिपोर्टर साबित हुए. नो लायजनिंग. नो पीआर. वनली न्यूज. नगर निगम कितने करप्ट होते हैं, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं. नगर निगम वाले अफसर इस बीट को कवर करने वाले रिपोर्टरों के महीने बांध देते हैं. यहां तक कि अब सीधे संपादकों के महीने बंध जाते हैं ताकि बीच में रिपोर्टर कुछ खुरपेंच न कर सके. नीरज पटेल ने एक से बढ़कर एक करप्शन की खबरें निकाली और फाइल की. पर इनमें से कई खबरें हिंदुस्तान अखबार में छपने से अक्सर रह जातीं.

हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के आगरा संस्करण के संपादक पुष्पेंद्र शर्मा की जाने क्या लायजनिंग नगर निगम वालों से है कि नीरज पटेल नगर निगम के करप्शन की बिग न्यूज ले आते तो सुबह उन्हें अपने ही अखबार में वो खबर एक लाइन नहीं दिखती. नीरज चुप रहने वाले शख्स नहीं. उन्हें पता है कि पत्रकारिता पढ़े लिखों का पेशा है सो बात, विमर्श, राय, मशवरा, तर्क से क्यों पीछे रहा जाए. हालांकि आजकल की जो यसमैन वाली पत्रकारिता है, उसमें ये सब डेमोक्रेटिक चीजें नहीं चलतीं पर नीरज पटेल को अपने हुनर, काबिलियत और समझ पर भरोसा है सो वो संपादक से पूछते-जांचते-तर्क-विमर्श करते रहे.

संपादक पुष्पेंद्र शर्मा को नीरज पटेल खटकने लगे, इसी कारण उन्हें वे रिपोर्टिंग से हटाकर प्रादेशिक डेस्क पर पटकने लगे. इस बदलाव के मर्म को नीरज पटेल समझ चुके थे लेकिन उन्होंने अपना विरोध जता दिया. नीरज पटेल के तेवर, लेखन और बेबाकी की बात प्रधान संपादक शशि शेखर तक पहुंची. शशि शेखर ने इस युवा उत्साही बेबाक पत्रकार से सीधी बातचीत की. शशि शेखर ने नीरज को काफी ज्ञान दिया. इस ज्ञान का नतीजा हुआ कि नीरज पटेल की आंख खुल गई और वे समझ गए कि पुष्पेंद्र शर्मा अलग-थलग कुछ नहीं कर रहे बल्कि सारा कुछ प्रधान संपादक शशि शेखर के संरक्षण में हो रहा है.

तब नीरज पटेल ने आगरा से ही प्रकाशित लीडिंग व सरोकारी कहे जाने वाले न्यूज पेपर अमर उजाला के दरवाजे को खटखटाया. नीरज पटेल की खबरों रिपोर्टिंग तेवर को देख पढ़ सुन अमर उजाला वालों ने उन्हें अपने यहां ज्वाइन कराने में देरी नहीं की. नीरज पटेल फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं. हिंदुस्तान में कार्यकाल के दिनों में भी फेसबुक पर सक्रिय रहे. वे गाहे बगाहे मीडिया में ब्राह्मणवाद के खिलाफ लिखते रहते हैं. समाज में जाति व्यवस्था के साइड इफेक्ट्स के बारे में हुंकार लगाते रहते हैं. नीरज देश दुनिया के ढेर सारे दलित, पिछड़े बुद्धिजीवियों के संपर्क में रहते और नए नए ट्रेंड्स से खुद को अपग्रेड करते रहते. दुनिया जहान में चलने वाली अच्छी-बुरी चीजों से खुद को संज्ञान रखते ताकि कभी उन्हें इस पेशे में अज्ञान की स्थिति का सामना न करना पड़े.

नीरज पटेल को क्या पता था कि उनके व्यक्तित्व की यह सब तेजी, फेसबुक पर लिखना, विमर्श करना व राय देना, करप्शन के खिलाफ सीधी व बड़ी खबरें फाइल करने से जैसे पंडित पुष्पेंद्र शर्मा को चुभा, वैसे ही पंडित राजेंद्र त्रिपाठी को भी चुभने लगेगा. बता दें कि पंडित राजेंद्र त्रिपाठी रिवाल्वर वाले अमर उजाला, आगरा के संपादक हैं और एक जमाने में अतुल माहेश्वरी के काफी खास हुआ करते थे. हालांकि बाद में समय के साथ अपग्रेड न कर पाने के कारण इन्हें मालिक अतुल माहेश्वरी ने डिग्रेड कर दिया था लेकिन बाद में जब अमर उजाला में घनघोर घरेलू वॉल शुरू हुआ तो उन्हें फिर संपादक की कुर्सी थमा दी थी और खास होने के कारण खास मोर्चे आगरा का सेनापति बना दिया. अतुल जी इस दुनिया से चले गए. राजेंद्र त्रिपाठी अब भी अमर उजाला, आगरा की कप्तानी कर रहे हैं.

बात नीरज पटेल की हो रही थी. नीरज ने अमर उजाला में घुसते ही एक से बढ़कर एक खबरें ब्रेक की. नए मिजाज, नई समझ, नए तेवर, नए एंगल से खबरें वे लगातार निकालते रहे, ब्रेक करते रहे, बाइलाइन उनकी खबरें छपती रहीं. साथ ही साथ वे खबरों पर अपनी राय देने, स्टोरी आइडियाज डिस्कस करने, संपादक से बातचीत-विमर्श करने, फेसबुक पर लिखने-पढ़ने में भी लगे रहे. पंडित राजेंद्र त्रिपाठी के दो चार पंडित शिष्यों ने, जो रिपोर्टिंग में हैं, अपने संपादक जी का कान भरना शुरू कर दिया. नीरज पटेल के साथ अमर उजाला में भी वही खेल होने लगा जो हिंदुस्तान में हुआ था. सुना है कि उन्हें अब रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क पर कर दिया गया है.

नीरज पटेल को समझ में नहीं आ रहा कि उनकी गलती क्या है? क्या टैलेंटेड होना गुनाह है? क्या पिछड़ी जाति का होना गुनाह है? क्या मीडिया के ब्राह्मणवाद के खिलाफ फेसबुक पर लिखना गुनाह है? क्या बिना किसी मुरव्वत के लोकल प्रशासन, अथारिटीज व इंस्ट्टीट्यूशन के करप्शन के खिलाफ खबर देना गुनाह है? नीरज पटेल आगरा में ब्राह्णवादियों और भ्रष्टाचारियों की चकरघिन्नी में घिर कर दुखी मन से ता थैया ता थैया कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि अब क्या करें? अमर उजाला में पहले काफी संजीदा लोग हुआ करते थे. पढ़े लिखे संपादक हुआ करते थे. संवेदनशील और साहित्यिक अभिरुचि के लोग हुआ करते थे. ये लोग लीक से हटकर काम करने वालों को न सिर्फ प्रोटेक्ट करते थे, बल्कि उन्हें बढ़ावा भी देते थे, उन्हें छूट भी देते थे, उन्हें उनकी क्षमता के हिसाब से बड़ा और चैलेंजिंग काम देते थे. ये दौर कभी वीरेन डंगवाल के नेतृत्व में अमर उजाला के कानपुर यूनिट में चला, अजय अग्रवाल के नेतृत्व में आगरा में चला, अतुल माहेश्वरी के नेतृत्व में मेरठ, नोएडा समेत कई यूनिटों में चला. कई काबिल लोगों के नेतृत्व में कई अन्य यूनिटों में भी चला.

लेकिन अब नीरज पटेल जैसों का दुर्भाग्य कहिए या चरम-परम बाजारू समय की मार, प्रबंधन के कारपोरेट होते जाने की जिद-मजबूरी के कारण अखबारों में बड़े पदों पर वैसे लोगों के बने रहने की गुंजाइश कम हो गई है जो क्लर्कों की तरह नौकरी करने-कराने की जगह समाज, समय, संवेदना की नब्ज पकड़ने का माद्दा रखते हों और लीक से हटकर करते-कराते हों. नीरज पटेल को देर-सबेर इन औसत किस्म के मैनेजर टाइप संपादकों के मुताबिक सुधरना होगा, सधना होगा, बदलना होगा या फिर उन्हें दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहर के किसी बड़े मीडिया ब्रांड को पकड़ना होगा जहां उनकी प्रतिभा के साथ ठीक ठीक न्याय हो सके. ऐसा न कर पाने की स्थिति में नीरज पटेल डिप्रेसन में जाएंगे और धीरे-धीरे मेन स्ट्रीम मीडिया से खुद को दूर पाएंगे. बदले दौर में किसी तेजतर्रार जमीनी युवा पत्रकार और कारपोरेट हो रही मेन स्ट्रीम मीडिया के बीच बिलगाव का सही नाम हैं नीरज पटेल. समझ सको तो समझो वरना नासमझों की कमी थोड़े ना है.

जय हो.

लेखक यशवंत भड़ास से जुड़े हैं. संपर्क: [email protected]


इस खबर के प्रकाशन के बाद नीरज पटेल ने जो अपना पक्ष भड़ास के भेजा है, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें…

भड़ास पर मेरे यानि नीरज पटेल को लेकर छपी खबर के संबंध में…

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