एसपी को टेलीविजन के खाके में रखकर बेचा जा रहा है

27 जून को को एसपी सिंह को याद किया गया। एसपी की मृत्यु 15 बरस पहले हुई। लेकिन एसपी को टेलीविजन के खाके में रखकर आज भी बेचा जा सकता है, यह अहसास पहली बार एसपी सिंह को याद किये गये कार्यक्रम को देखकर लगा। नोएडा के फिल्म सिटी के मारवाह स्टूडियो में हुये इस कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड ने प्रायोजक और पत्रकारों की लकीर को मिटाया। वरिष्ठ पत्रकारों की लाइन में ही बिल्डरों का नाम छपा देखकर लगा हर वह शख्स मुख्य अतिथि बनने की काबिलियत रखता है, जो बाजार के नाम पर कुछ आयोजकों को दे सकता है।

एक जाने माने पत्रकार की याद में अब के नायक बने पत्रकारों के जरिये मीडिया के मौजूदा रुप को देखने के लिये एक मीडिया वेबसाइट की पहल वाकई अच्छी होगी। लेकिन बाजार के ओहदेदार लंपट लोगों की कतार मुख्य अतिथि बन जाये। पैसा देकर कार्ड में अपना नाम छपा ले। और बाजार-बाजार का ढिढोरा पीटते पत्रकारों को भी यह लगे कि यह तो आधुनिक चलन है, तो क्या कहेंगे?

दरअसल, बाजार शब्द की परिभाषा पत्रकारिता करते हुये हो क्या यह तमीज चेहरे के ऊपर जा नहीं पा रही है। चेहरा लिये घूमते पत्रकारों को सिल्वर स्क्रीन के कलाकारों से लेकर मॉडलिग करने वालों की कतार में रखने का नया नजरिया ही खबर है। अब के नायक पत्रकारों को देखकर भविष्य में न्यूज चैनलों से जुड़ने वाले साथ में खड़े होकर तस्वीर खींचने या ऑटोग्राफ लेकर एक-दूसरे को ग्लैमर की जमीन पर खड़ा करने से नहीं हिचकते और खबरों को पेश करने के पीछे बाजार में बिकने की परिभाषा में खुद को ढालने से नहीं हिचकते। लेकिन एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढे़ चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी। दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते नब्बे हजार तक जरुर कर दिया। लेकिन अब तो उल्टा चलन है। विज्ञापन बटोरने की होड़ में 10 सेकेंड का विज्ञापन घटते घटते 10 हजार या उससे कम तक आ चुका है।

यह राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज चैनलों का ही सच है। और अगर अब के नायक चेहरे एसपी सिंह को याद करते करते बाजार का रोना या हंसना ही देख कर खबरों की बात करने लगे तो सुनने वालों के जेहन में जायेगा क्या। और ऐसी बहसों को सुन-देख कर जो ब्लॉग-फेसबुक या कहें सोशल मीडिया में लिखा जायेगा, वह भी इसी तरह सतही होगा। इसलिये जरा पलट कर सोचें 27 जून के कार्यक्रम के बारे में सोशल मीडिया में जो लिखा गया, उससे पढ़ने वालो को क्या लगा। एक कार्यक्रम और हो गया। अब के दौर के नायक चेहरों का ग्लैमर आसमान छू रहा है।

पहली बार कई चेहरे एक साथ एक मंच पर जमा हुये तो आयोजन सफल हो गया। हो सकता है। लेकिन पत्रकारिता की साख कभी भी लोकप्रिय अंदाज, बाजार के ग्लैमर, बिकने-दिखने या फिर एसपी सरीखे पत्रकारिता के गुणगान से नहीं बढ़ सकती। मौजूदा दौर की पत्रकारिता को कठघरे में खड़ाकर जायज सवालों को उठाकर उसपर बहस कराने से कुछ आग जरुर फैल सकती है। असल में मैं सोचता रहा कि एसपी सिंह को याद करने वाले कार्यक्रम के बार में रिपोर्टिंग करते सोशल मीडिया में कहीं भी वह सवाल क्यों नहीं उठे, जिसे पहली बार मैंने उठते हुये देखा। सवाल चेहरों के भाषण का नहीं है। सवाल सुनने वालों के जेहन में उठते सवालों का है। मैंने तो पहली बार नायक चेहरों को धारदार सवालों के सामने पस्त होते देखा। क्या यह सच नहीं है कि अगर वाकई हर मीडिया संस्थान में भर्ती को लेकर कोई मापदंड बन जाये तो लायक छात्र पत्रकारिता करने की दिशा में सफल होंगे।

क्या यह सच नहीं है कि इंटर्नशिप को लेकर हर संस्थान अगर गंभीर हो जाये तो इंटर्न छात्र-छात्रा अपनी उपयोगिता को साबित भी करेगा और जो बैक-डोर एन्ट्री किये हुये संस्थान के भीतर पत्रकार बने बैठे हैं, उन्हें भी अहसास होगा कि काम तो करना होगा। न्यूज चैनलो में जा कर पत्रकारिता करने का माद्दा रखने वालों को क्या बाजार के ग्लैमर में खुद को बेवकूफ बनाकर पेश होने की मजबूरी आ गई है। क्योंकि पत्रकारिता बिकती नहीं। या फिर जो बिके वही पत्रकारिता है। है ना कमाल। एसपी सिंह को याद करते हुये सुनने वाले छात्रों के सवाल ही अगर एसपी सिंह की याद दिला दें तो सच की जमीन भी नायक चेहरों के जरिये नहीं बल्कि अपने आसरे बनाने होगी। किसी भी पत्रकार के साथ तस्वीर या ऑटोग्राफ का ग्लैमर खत्म करना होगा। खबरों की फेहरिस्त हमेशा नायक चेहरों को थमानी होगी, जिसे कवर करने का दवाब ऐसे ही कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर बनाना होगा। सवाल-जवाब के लिये हर नायक चेहरे से वक्त तय कर ठोस मुद्दों का जवाब मांगना चाहिये। जिससे मौजूदा पत्रकारिता का विश्लेषण हो सके। और तस्वीर और चेहरों की रिपोर्टिंग से बचते हुये जो मुश्किल मौजूदा पत्राकरिता को लेकर उभरे, उसके लिये रास्ता निकालने की दिशा में सोशल मीडिया से जुडे लेखकों को बहस चलानी चाहिये। और कार्यक्रम कमाई का जरिया हो तो बॉयकॉट करने की तमीज भी आनी चाहिये।

Bhoopendra Singh bahut achcha likha..
        

Anubhav Awasthi keval ap hi aisa likh skte hai sir…nice….
           

पिताम्बरी बाबा फेसबुक पर बजारबाद के दौर में आज केवल पित पत्रकारिता किया जा रहा है इसका उदाहरण हमारे समक्ष कई है

 Sanjay Kumar u r great sir
         

Sunny Sharad करारा जवाब !
          
 Bhargava Chandola
            SP aur un Jaisey patrekaron ki wajah sey thoda Chautha Stmbh tika hai warna Media house tow dalali key addey bantey jaa rahey hain Samachar Patre aur Samachar Channel Kukurmutton ki tarah ugg aye hain SAMAJIK sAROKARON SEY JYADA PATREKARON KO DALALI SEY KAMAI KARNA PRATHMIK HOTA JAA RAHA HAI… JIS PARKAR AAJ POLICE KI CHHAVI HAI THIK USI PARKAR PATREKARON AUR MEDIA HOUSE KI HO GAII HAI … YAHI KARAN HAI KI CHAUTHA STHAMB AAJ MIRTSHAYA PER KHADA HAI…
          

Nimish Kumar
            प्रसुनजी आप देर से आए थे। वरना पहला वाला ऑनलाइन मीडिया का सेशन सुनते। मजा आ जाता। मैं भी एक वक्ता था। और जो बातें आपने कहीं, ये बातें ही उठाई थी। इतना ही नहीं २००५ में संसद में इसे लेकर सवाल उठाने और बहस कराने की तैयारी भी थी। तब बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने साथ दिया था। लेकिन कोई सांसद सामने नहीं आया। और यहीं बात मैने खुले मंच से कही। चाहे तो मीडियाखबर डॉट कॉम पर जाकर मेरी स्पीच का वीडियो सुन ले। मै ही नहीं, बाकी सभी ने ज्वंलत मुद्दों पर तीखी बातें कही। बाद में प्रश्न-उत्तर का दौर और भी तीखा रहा। शायद इसीलिए कि वहां कोई भी आज की 'मीडिया का भगवान' नहीं था। आमीन।
       

Ajit Yadav you r great bajpai sir ji
           
            Manoj Kumar Singh bahut Badhiya bajpai Sir………. You are Great………….
          
 Ajeet Kumar ha sir..
            
 Amrit Kumar जी प्रसुन्न जी …एसपी जी के याद में अगर ऐसा होता तो पत्रकारिता की नई पौध लाजवाब होती ….. पर पैसे कि धमाचौकड़ी और बाजारवाद कि धमक ने पूरी पत्रकारिता का क्या हाल कर रखा है यह आपसे अच्छा कोई नहीं जान सकता ..कभी आप जैसे 'खबर नविशों' को सुन के हम जैसों ने पत्रकारिता रह पकड़ी थी पर आज बड़े अफसोश के साथ कहना पड़ता है कि 'जिसके लिए मैं यहाँ आया था ऐसा कुछ भी नहीं है यहाँ '…………
         
 Rishi Raj Singh Satya kaha sir aapne.
           
 Raman Shrivastava sir media par bajar es kadar habi ho gaya hai ki na to use chalane wale or na hi oha kam karne wa thori der k liye bhi khare ho pate hai hamari halat fil ohi hota ha jeshe ghar ka budhu fir ghar ko aaya….
            

Ajit K Singh Bikane-Bechane ka chalan to kafi pahale shuru ho gaya tha bus andaaj naya hai…..Chinta is baat ki bhi hai ki Patrakarita ke naye chehron me koi 'S.P. Singh' ya 'Punya Prasun' taiyar ho raha hai ya nahi, Agar nahi to aane wala samay media ke liye kaisa hoga.Badlaw Jaroori hai lekin kis keemat par iska khayal kaun rakhega ?
          

Vivek Vajpayee आपने शायद अपना लेख फेसबुक पर देर से शेयर किया…इससे पहले बहुत कुछ पढ़ने को मिला आपके इस परिचर्चा में उपस्थित होने और वाजिब सवाल उठाने पर …….
           

Rakesh Shukla
            हम जिस इलाके (बस्तर छत्तीसगढ़) से हैं यहाँ आम लोगों का कोई मानव मूल्य नहीं…जहाँ आरुषी हत्याकांड महीनो-सालों राष्ट्रीय मिडिया की सुर्खिया बनी रहती है…और यहाँ ७६ जवान एक साथ शहीद होते हैं या १४ ग्रामीण एक साथ मारे जाते है तो सिर्फ स्क्राल चलता है… मिडिया में फर्क ये है की आरुषी टी.आर.पी. क्षेत्र नोएडा की थी और जवान या ग्रामीण टी.आर.पी. विहीन बस्तर में मारे जाते हैं. मिडिया की नजर में भी भारत दो हिस्सों में बंटा हुआ है..विचारो की गहरी खाई है. हमने दिल्ली के बड़े पत्रकारों की हिकारत का अपमान उनकी आँखों में देखा है.. क्या पी.एम. साहेब को मालूम है की केरल से भी बड़ा बस्तर भारत में कहीं बसता है… पी. एम. साहेब आरुषी को जानते हैं… राष्ट्रीय समस्या यानि हत्याकांड पर सी.बी.आई. जांच के आदेश दिए गए लेकिन पी. एम. साहेब कभी बस्तर देखने नहीं आये…४० साल से बस्तर जल रहा है..
          

Rishi Raj Singh Sir ek nivedan hai k kuch patrakaar jo dalal ban gai hai unse bhi nevedan karna hoga k dalali chod kar patrakarita kare aur aane wale bhavishya k patrkaro ko aage badaye
           
Rahul Pandey aap ka koi jawab nahi sir bebaak hoker koi likhana aap se sikhe sir…..
            

Rahul Pandey super like…………
          

Rishi Raj Singh Sir aaj k samay me to paid samachar ka jo chalan chala hai ye patrakaar aur patrakarita dono k liye hi behat sarmsaar hai
            

Dhyanendra Singh सर आपने बहुत ही भावुक हो कर ये लिखा है ..,क्योंकि पिछले कई दिनो से आपके खिलाफ लिखा जा रहा था.., पर आपने ऩीडिया संस्थानो के बारे रियलिटी बताकर पल्ला झाड़ लिया ।
            

Kamlesh Kumar Journalist Satya Vachan
           
 Vijay Sharma प्रसून जी, एसपी के प्रति आप और आप जैसी सोच रखने वाले पत्रकारों की इससे बेहतर श्रधांजलि ओर क्या हो सकती है. आज कि पत्रकारिता और पत्रकारों में दलालों और बाज़ार का वर्चस्व देख सुन कर, आज तक तय नहीं कर पाया कि १०-१२ साल पहले पत्रकारिता छोड़ने के अपने निर्णय पर खुश होऊ या शर्मिंदा. एसपी और राजेंद्र माथुर आज के दौर में ओर भी याद आते है. एसपी को नमन और आपको साधुवाद.
         
Santosh Kumar Mishra Sp singh ko yad karte hue apne vartman patrakarita ki dasha aur disha ka jo samagra vishleshan kiya hai, us se savit hota hai ki aaj bhi, Sp ke adarshon ke kadra danon ki kami nahi hai. Aise lekh uchch koti ki patrakarita karne walon ko nischay hi sambal pradan karega.
           
 Ashish Jain
            प्रसून जी ,सबसे पहले तो मैं यह कहूंगा की आप मीडिया के इज्जतदार लोगो में से है जिनकी इज्ज़त लोग आज भी करते है ,राम नाथ गोयेनका अवार्ड के लिए नहीं ,वो अब आसानी से मिल जाता है ,उसकी भी तस्वीर बदली है ,जिस तर्ज़ पर पत्रकारिता के नायको के चेहरे बदले ..या यूँ कहें जिस तरीके से कहानी बदली ,इस कहानी में खलनायक पहली बार देखा गया ,मैंने आपके साथ काम कभी नहीं किया ,लेकिन ऐसा लगता है की मैं आपके साथ कई मुद्दतो से काम कर रहा हूँ ,प्रसून जी यह वही खलनायक है जो आपके और मेरे बीच किसी बाज़ार में खड़े व्यक्ति ने उस रोज़ छोड़ दिए जब हम सब सोये हुए थे ,पत्रकारिता की जिस व्यवस्था को हम बदलने के बात कर रहे है वो आपकी बात से इतफाक नहीं रखती ,कोई भी पत्रकार जितना मर्ज़ी चिल्ला है ,उसकी चैनल टू यु न कितनी भी उतेज़क हो ,उसका मकसद सिर्फ बाज़ार में बने रहना है ,मसला दरसल प्रोफिट का है ,व्यवस्था का नहीं ..टैम या कोई काटजू साहब यह तय नहीं करेंगे की हमे क्या दिखाना है या नहीं दिखाना है ,वो सिर्फ अपनी राय दे सकते है ,उसके पीछे जिम्मेदार हमारी कंटेंट निर्धारण नीतियाँ है जो कोई मार्किटिंग का बैठा हुआ बन्दा तैयार करता है ,वो आपको निर्देश देता है ,और हम उसका पालन करते है ,एस पी फिर याद आये ..यह तारीख फिर आएगी …मैं उम्मीद करता हूँ की कल कोई शराब और सिगरेट बनाने वाली कंपनी उनकी इस तारीख को याद रखेगी ,ताकि वो अगली बार एस पी को मिस न कर सके ,दरअसल इसके पीछे एक बाज़ार खड़ा है जो यह तय करता है की आपको और हमारे इस मार्किट को कहा लेकर जाना है …आजतक के दस्तक का स्लोट अब कम हो गया ,खबरें विधवा हो गई और दर्शक विधुर हो गए ,इसी बीच कोई तो ऐसा है जो अनाथ हुआ है.
 
Kalyan Kumar kay bat hi sir.. hakikit ko aap na rakha…

Manish Majra sir,aapne y lekh likh kar km se km mujhe is bat ka ahshas krwaya ki abhi aap jaise sensitive log system me bne hue h jo glamour se hat kar abhi b jameeni haqiqat ko mahsus kar rahe h or jis trah se aapne hmare swalo ko yaha fir se uthaya h us se aisi umeed ki ja sakti h…… ki us din k hmare swalo ka jwab bajar or glamours chero ko dena hi hoga??
        
Raman Sharma sir apki baat me dum hota hi
                    
Jagbir Ghanghas sir u r right

Vijay Jha और कार्यक्रम कमाई का जरीया हो तो बॉयकॉट करने की तमीज भी आनी चाहिये।

Sanjeev Rai सर, पत्रकारिता का मापदंड क्या हो, संस्थानों में लायक पत्रकारिता के मायने क्या हों…आज के दौर में ये बातें बेहद अहम हो गयी है…लेकिन यहीं से दूसरा सवाल भी उठ खड़ा होता है कि कौन उठायेगा इस बात को….किसकी सुनी जायेगी…और जिसकी सुनी जायेगी क्या उसके लिये नौकरी (मोटा पैकेज) से प्रिय पत्रकारिता है….?

Arun Kumar Aamir khan jo v baat kahn rhain hai loog unki sun rhain hain usi trh loog aapki sunaigay.
 
Dhananjay Kumar aisa hona chahie sir.
 
Obaid Nasir Kahan SP Singh aur kahan aj ke celebrity anchors.Unki atma tadap rahi hogi aj ke tv news channels ko dekh kar.
 
Md Mustahsan Rizvi Sir, iske lie bada sahas chahie aur dher sara jazba bhi. aap jaise kuchh thode log hi hain. magar hum nae generation ke log saf bandh ke aapke sath khade hain. aap rasta dikhate jaie .. hum amal karne ko tayyar hain….

Dinker Srivastava बोलने लिखने और करने में फर्क होता है…बोलने और लिखने वाले कुछ करने की हालत में नही होते …जो करने की हालत में होते हैं .वो कुछ करना नही चाहते…क्योकि वि इसकी जरुरत नही समझते …इसके लिए संवेदना का होना जरुरी है …जो आजकल बड़ी मुश्किल से नजर आती है..

Pankaj Kumar modi sahab kya apne apne working period men village economy ko sudharirah kiya ya sirf chandra babu nayadu kitarah bakwas w chadam develope gujrat banaya.
            
Deepraj Jugran manish kishan kahan hai bhai koi khabar toh de diya kar
            
Vinod Kumar Singh shai kha sir may aap ki baat say puri thrah samahet hu us din aap kay baare may jo bhi social media may chaap tha may uskay shai jawab kaa intjar kar raha tha muje appane lafaebaji sabed kaa proyaga kyu kiya tha uss darad kaa patha chal gya
            
Marut Pandey bilkul sahi kahaa sir aap ne
            
Shivamm Tripathi
            AAP BAAT TOH SAHI KAHI KI SELECTION PROCESS KE LIYE STANDARD PROCEDURE HONA CHAHIEY…AUR USH WAQT MAYANK NEA QUESTION BHI SAHI PUCHA THA….LEKIN SORRY TO SAY SIR, LEKIN KUAN NAHI JANTA KI MEDIA MEA SETTING LAGANA BHI APNE AAP MEA EK CRITE…See More
            
Anshuman Sakalley satya vachan sir g 🙂 bohot khoob likha aapne 🙂
            
Abhimanyu Pandey sir ye sp sing ji ko sacchi shradhanjali hai. media bhi bollywood ki tarah dream theam hota ja raha hai
          
Kuldeep Srivastava
            Sir mai naam nahi lena chahta lekin ankho dekhi kano suni likh raha hu-
            ek channel par ek shahar me sadak par bane gaddhe ki wajah se accidend ho gaya. Reporter mauke par idhar studio me anchor- reporter se pahla sawal- ''falaji hamare dar…See More
                       
Jaisharan Puri जी प्रसुन्न जी …मई आपकी बातों से सहमत हूँ. !
                       
Kumar Subodh Sinha aap ne satik likha hai.
            
Amrit Tiwari ना मैं एसपी सिंह को ठीक से जानता हूं और ना ही मीडिया का प्रख्यात विद्वान हूं….लेकिन न्यूज़ चैनलों की ढकोसलेबाजी और समाजिक सरोकार की आड़ में खुद का हित साधने वालों की फौज़ से आहत हूं..। यहां पर बुद्धिमान की नहीं चालू शख्सियतों की ज़रूरत है..। बाज़ार और सत्ता के साथ गलबहियां नहीं बल्कि उनके पैबंद सिलने वालों की भरमार है। फिर इन्ही लोगों के कुसंस्कारों से कुछ लोग घुटते हैं..तो कुछ फलते- फुलते हैं….।।

वरिष्‍ठ पत्रकार पुण्‍य प्रसून बाजपेयी के फेसबुक वॉल से साभार. 

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