ऐसा तो अमर उजाला, बनारस में ही हो सकता है

ऐसा अमर उजाला, बनारस में ही हो सकता है कि कोई पत्रकार काम ना करना चाहे और संपादक उसको सोचने के लिए छुट्टी दे, वो भी सवेतन. एक हैं अरविंद मिश्रा, अमर उजाला में सीनियर सब एडिटर हैं. कहा जाता है कि संपादक के बड़े चहेते हैं. पिछले एक पखवाड़े से ऑफिस नहीं आ रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि उन्‍होंने शुरुआत में दो दिन की छुट्टी ली थी, पर सोलह दिन से ज्‍यादा समय हो गया ऑफिस नहीं आए. दो दिन पहले ऑफिस पहुंचे भी थे तो लोगों से हॉय-हलो करके चलते बने. रविवार की सुबह गंगा के लिए श्रमदान के समय भी नजर आए थे.

कहा जा रहा है कि ये गंगा सेवा अभियान के पीआरओ बन गए हैं. अब उसी के लिए काम कर रहे हैं. यह सारा खेल गंगा सफाई में भावी संभावना को देखते हुए किया जा रहा है. हालांकि अरविंद इस बात से इनकार करते हैं कि वे इस संस्‍था के पीआरओ बन गए हैं. इस संदर्भ में अरविंद मिश्रा का कहना है कि अब वो अखबार में काम नहीं करना चाहते हैं. उनका मन भर चुका है. हालांकि वे ये भी कहते हैं कि उन्‍होंने रिजाइन नहीं किया है. और दूसरे किसी अखबार में काम नहीं करना है. इस बारे में संपादक डा. तीर विजय सिंह का कहना है कि अरविंद ने इस्‍तीफा नहीं दिया है. वे मेरी सहमति से अवकाश पर हैं. गंगा सेवा हमारी संस्‍कृति में है और अरविंद भावुक होकर लग गए हैं. घर परिवार की चिंता छोड़कर गंगा सेवा में जुटे हैं. जब उनसे अरविंद के विचार के बारे में बताया गया तो कहा कि हम उनकी वापस आने का इंतजार कर रहे हैं.

कर्मचारियों का कहना है कि अब संपादकजी की ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अ‍रविंद मिश्रा अखबार में काम नहीं करना चाहते और संपादक की सवेतन उनको छुट्टी देकर उनके वापस लौटने का इंतजार कर रहे हैं. अ‍ाखिर क्‍यों कंपनी के पैसों को बरबाद कर रहे हैं. जबकि यही संपादकजी कुछ समय पहले पीठ की दर्द से परेशान सुनील सोनकर को छुट्टी देने से इनकार कर दिया था. आखिर इस तरह का डबल स्‍टैंडर्ड व्‍यवहार क्‍यों हो रहा है बनारस अमर उजाला में? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. 

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