ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है

Ravish Kumar : "द ट्रिब्यून जैसे बड़े अख़बार ने चण्डीगढ़ बनने के दौरान नेहरू द्वारा किये गए दौरों को तो काफी जगह दी लेकिन इस परियोजना के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी। पचास और साठ के दशक में चण्डीगढ़ शहर की वजह से राज्य द्वारा विस्थापित किये गए किसानों की कहानी का यदि कोई लेखा जोखा बचा है तो वह यहाँ के बड़े बूढ़ों का मौलिक इतिहास ही है। राज्य के पूरे विमर्श ने, जिसके मुख्य प्रवक्ता जवाहरलाल नेहरू थे, इन विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्र राज्य निर्माण के शोरगुल में दरकिनार करना ही उचित समझा।"

"नेहरू ने कांग्रेस को मिले वोटों का तात्पर्य नागरिकों द्वारा नेहरूवादी आधुनिकता को दी गया सहमति के रूप में ग्रहण किया था। कांग्रेस की चुनावी जीत को उत्तर औपनिवेशिक राज्य में आधुनिकता लाने के इरादे से शुरू की गयी बड़ी परियोजनाओं के प्रति लोगों की पूर्ण सहमति मान लिया गया था। इसी चक्कर में राज्य व्यवस्था ने विरोध के सभी स्वरों को ख़ारिज कर दिया। ये विरोधी स्वर उन सभी विस्थापितों के थे जिनके खेत खलिहानों को ज़बरदस्ती अधिग्रहीत कर राज्य ने देश के विभिन्न भागों में ऐसी योजनाएँ तथा परियोजनाएँ शुरू की थीं।"

मीडिया तब भी वैसा ही था। विरोध की आवाज़ राष्ट्र निर्माता के स्वप्न से कमतर लगती थी। हम अभी तक एक मीडिया समाज के तौर पर महानायकी का गुणगान करने की आदत से बाज़ नहीं आए। आज भी शहर के बसने और गाँवों के उजड़ने के क़िस्सों को दर्ज करने में मीडिया असंतुलन बरतता है। कोई कराता है या अपने आप हो जाता है इस पर विवाद हो सकता है। उस दौरान विस्थापित हुए लोगों की पीढ़ियां मीडिया और राज्य व्यवस्था की इस नाइंसाफ़ी से कैसे उबर पाई होंगी आप अंदाज़ा लगाने के लिए अपने आज के समय को देख सकते हैं।

शुरू के दो उद्धरण मैंने नवप्रीत कौर के लेख से लिये हैं। यह लेख सीएसडीएस और वाणी प्रकाशन के सहयोग से प्रकाशित हिन्दी जर्नल 'प्रतिमान' में छपा है। 'प्रतिमान' हिन्दी में ज्ञान के विविध रूपों को उपलब्ध कराने का अच्छा प्रयास है। इसके प्रधान सम्पादक अभय कुमार दुबे हैं। साल में इसके दो अंक आते हैं और काफी कड़ाई से इसमें लेख छपने योग्य समझा जाता है। नवप्रीत कौर चंडीगढ़ के इतिहास पर काम करती हैं।

भारत में उत्तर औपनिवेशिक शहर बनाने का सपना आज कहाँ खड़ा है। चंडीगढ़ हमारे आज के शहरी विमर्श की मुख्यधारा में भी नहीं है। उसके बाद के बने शहर चंडीगढ़ को न अतीत मानते हैं न भविष्य। लवासा, एंबी वैली, सहारा शहर, नया रायपुर, गांधीनगर, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गुड़गाँव, नवी मुंबई, इन नए शहरों ने हमारी शहरी समझ को कैसे विस्तृत किया है या कर रहा है हम ठीक से नहीं जानते। बल्कि अब इस देश में हर तीन महीने में कोई नया शहर लाँच हो जाता है। उस शहर का निर्माता कोई बिल्डर होता है। नेहरू न मोदी।

नरेंद्र मोदी भी सौ स्मार्ट सिटी लाने का सपना दिखा रहे हैं। यूपीए सरकार ने भी सोलह हज़ार करोड़ का बजट रखा है। केरल के कोच्चि में स्मार्ट सिटी की आधारशिला रखी जा चुकी है। छह सात स्मार्ट सिटी बनाने का एलान उसी बजट में किया गया था। स्मार्ट सिटी से मंदी नहीं आएगी या अर्थव्यवस्था कैसे चमक जाएगी इसका कोई प्रमाणिक अध्ययन सार्वजनिक विमर्श के लिए उपलब्ध नहीं है। कुछ हफ़्ते पहले पुणे की एक राजनीति विज्ञानी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक छोटा सा लेख ज़रूर लिखा था, उम्मीद है "स्वतंत्र और निष्पक्ष" मीडिया इस बार विस्थापन के सवालों पर नेहरू के स्वर्ण युग वाले दौर की तरह ग़लती नहीं करेगा। स्मार्ट सिटी की परिकल्पना पर सूचनाप्रद बहस शुरू करेगा।

अच्छा लग रहा है जिन दलों के नेता मीडिया के सवालों का सामना नहीं करते वे आजकल केजरीवाल के बयान के बहाने मीडिया की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। इंटरव्यू तक नहीं देते मगर चौथे खंभे का सम्मान करते हैं। पत्रकार सीमा आज़ाद को जेल भेजने वाली सरकारों के नेता कहते नहीं है। चुपचाप जेल भेज देते हैं। यही फ़र्क है। ज़रा गूगल कीजिये। नमो से लेकर रागा फ़ैन्स के बहाने इन दलों ने आलोचना की आवाज़ को कैसे कुचलने का प्रयास किया है। किस तरह की गालियाँ दी और इनके नेता चुप रहे। नमो फ़ैन्स और रागा फ़ैन्स की भाषा देखिये। किराये पर काल सेंटर लेकर अपने फ़ैन्स के नाम पर हमले कराना अब स्थापित रणनीति हो चुकी है।

कपिल सिब्बल जो सोशल मीडिया पर अंकुश लगा रहे थे वे अरविंद के बयान की मज़म्मत के बहाने मीडिया के चैंपियन हो रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने उस लड़की के साथ क्या किया था जिसने फेसबुक पर बाल ठाकरे के निधन के बाद टिप्पणी की थी। महाराष्ट्र में लोकमत के दफ़्तर पर हमला करने वाले कौन लोग थे। इन दलों ने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के मालिकों को लोक सभा से लेकर राज्य सभा दिये कि नहीं दिये। दे रहे हैं कि नहीं दे रहे हैं। इन राजनीतिक दलों के उभार के इतिहास में मीडिया कैसे सहयात्री बना रहा इसके लिए इतिहास पढ़िये। राबिन ज्येफ्री की किताब है। नाम याद नहीं आ रहा। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के समय हिन्दी पट्टी के अख़बार क्या कर रहे थे राबिन ज्येफ्री की किताब में है। भाजपाई मीडिया और कांग्रेसी मीडिया का आरोप और द्वंद अरविंदागमन के पहले से रहा है।

मीडिया को अपनी लड़ाई खुद के दम पर लड़नी चाहिए न कि अलग अलग समय और तरीक़ों से उन पर अंकुश लगाने वालों की मदद से। मीडिया को अपने भीतर के सवालों पर भी वैसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए जैसी अरविंद के हमले के बाद की जा रही है। स्ट्रींगरों के शोषण से लेकर छँटनी और ज़िला पत्रकारों के वेतन के सवाल पर भी उन मीडिया संगठनों को बोलना चाहिए जो इनदिनों मीडिया की तरफ़ से बयान जारी कर रहे हैं। रही बात जेल भेजने की तो यह काम कई तरीके से हो रहा है। राज्यों की मीडिया संस्थानों को विज्ञापनों के ज़रिये जेल में रखा जा रहा है। कोई जेल भेजने की बात कर रहा है तो कोई विज्ञापनों या स्वभक्ति के नाम पर अपने आप जहाँ है वहीं पर खुशी खुशी निर्विकार जेल में रह रहा है। विज्ञापन का विकल्प क्या है। पूरी दुनिया में ऐसे आरोप लग रहे हैं और इनका अध्ययन हो रहा है।

मीडिया प्रवक्ताओं को बताना चाहिए कि राज्यों में अख़बारों को लेकर ऐसी अवधारणा क्यों है। सही है या ग़लत है। पाठकों को अहमदाबाद, पटना, राँची लखनऊ और भोपाल के अख़बारों का खुद अध्ययन करना चाहिए और देखना चाहिए कि उनमें जनपक्षधरता कितनी है। मुख्यमंत्री का गुणगान कितना है और सवाल या उजागर करने वाली रिपोर्ट कितनी छपती है।

इस बार जब चुनाव आयोग ने कहा कि इस चुनाव में मुक्त और निष्पक्ष चुनाव को सबसे बड़ा ख़तरा पेड न्यूज़ से है तब किस किस ने क्या कहा ज़रा गूगल कीजिये। मुख्य चुनाव आयुक्त ने सम्पादकों को चिट्ठी लिखकर आगाह किया है और सरकार से क़ानून बनाने की बात की है। डर है कि कहीं अरविंद के इस बयान के सहारे कवरेज़ में तमाम तरह के असंतुलनों को भुला न दिया जाए। पेड मीडिया एक अपराध है जिसे मीडिया ने पैदा किया।

आज हर बात में कोई भी पेड मीडिया बोलकर चला जाता है। मीडिया को लेकर बयानबाज़ी में हद दर्जे की लापरवाही है। सब अपने अपने राजनीतिक हित के लिए इसे मोहरा और निशाना बनाते हैं। आख़िर कई महीनों तक चैनलों ने क्यों नहीं बताया कि मोदी की रैली में झूमती भीड़ के शाट्स बीजेपी के कैमरे के हैं। उस चैनल के नहीं। लोगों को लगा कि क्या भीड़ है और कितनी लहर है। तब हर चैनल पर मोदी का एक ही फ़्रेम और शाट्स लाइव होता था। अब जाकर आजकल सौजन्य बीजेपी या सौजन्य कांग्रेस लिखा जाने लगा है। क्या मीडिया ने खुद जिमी जिब कैमरे लगाकर अन्ना अरविंद आंदोलन के समय आई भीड़ को अतिरेक के साथ नहीं दिखाया। जंतर मंतर में जमा पाँच हज़ार को पचीस हज़ार की तरह नहीं दिखाया। क्या इस तरह का अतिरिक्त प्रभाव पैदा करना ज़रूरी था। याद कीजिये तब कांग्रेस बीजेपी इसी मीडिया पर कैसे आरोप लगाती थी। बीजेपी के नेताओं ने ऐसे आरोप दिसंबर में आम आदमी की सरकार बनने के बाद के कवरेज पर भी लगाए। तीन राज्यों में जहाँ बीजेपी को बहुमत मिला उसे न दिखाकर अरविंद को दिखाया जा रहा है। जेल भेजने की बात नहीं की बस। शुक्रिया। जबकि उन्हीं चैनलों पर महीनों मोदी की हर रैली का एक एक घंटे का भाषण लाइव होता रहा है। मोदी की रैली के प्रसारण के लिए सारे विज्ञापन भी गिरा दिये जाते रहे। किसी ने बोला कि ऐसा क्यों हो रहा है। याद कीजिये। यूपी विधानसभा चुनावों से पहले राहुल की पदयात्राओं कवर करने के लिए कितने ओबी वैन होते हैं। राहुल जितनी बार अमेठी जाते हैं न्यूज़ फ़्लैश होती है। क्यों? बाक़ी सांसद भी तो अपने क्षेत्र जाते होंगे।

अरविंद को ऐसे हमलों से बचना चाहिए। सबको गाली और दो चार को ईमानदार कह देने से बात नहीं बनती है। दो चार नहीं बल्कि बहुत लोग ईमानदारी से इस पेशे में हैं। वो भले मीडिया को बदल न पा रहे हों मगर किसी दिन बदलने के इंतज़ार में रोज़ अपने धीरज और हताशा को समेटते हुए काम कर रहे हैं। हम रोज़ फ़ेल होते हैं और रोज़ पास होने की उम्मीद में जुट जाते हैं। अरविंद अपने राजनीतिक अभियान में मीडिया को पार्टी न बनायें। मीडिया को लेकर उनके उठाये सवाल जायज़ हो सकते हैं मगर तरीक़ा और मौक़ा ठीक नहीं। जेल भेजने की बात बौखलाहट है। पेड न्यूज़ वालों को जेल तो भेजना ही चाहिए। अरविंद की बात पर उबलने वालों को मीडिया को लेकर कांशीराम के बयानों को पढ़ना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि मीडिया उनके साथ उस वक्त में कैसा बर्ताव कर रहा था। किस तरह से नई पार्टी का उपहास करने के क्रम में अपनी उच्च जातिवादी अहंकारों का प्रदर्शन कर रहा था। कांशीराम भी तब मीडिया को लेकर बौखला जाते थे।

आज मायावती खुलेआम कह जाती हैं कि मैं इंटरव्यू नहीं दूँगी। पार्टी के लोगों को सोशल मीडिया के चोंचलेबाज़ी से बचना चाहिए। मीडिया में कोई आहत नहीं होता क्योंकि मायावती अब एक ताक़त बन चुकी हैं। अरविंद बसपा से सीख सकते हैं। बसपा न अब मीडिया को गरियाती है न मीडिया के पास जाती है। जब कांशीराम बिना मीडिया के राजनीतिक कमाल कर सकते हैं तो केजरीवाल क्यों नहीं। योगेंद्र यादव भी तो आप की रणनीतियों के संदर्भ में कांशीराम का उदाहरण देते रहते हैं। जिस माध्यम पर विश्वास नहीं उस पर मत जाइये। उसे लेकर जनता के बीच जाइये। जाना है तो।

और जिन लोगों को लगता है कि मीडिया को लेकर आजकल गाली दी जा रही है उनके लिए अख़बारों के बारे में गांधी जी की राय फिर से दे रहा हूँ।

"कोई कितना भी चिल्लाता रहे अख़बार वाले सुधरते नहीं। लोगों को भड़काकर इस प्रकार अख़बार की बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीक़ा अख़बार वालों का है। ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है।" 12.2.1947- महात्मा गांधी (सौजन्य: वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत)

एनडीटीवी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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