ऑफर था कि पहली किस्त अभी, बाकी के पचास हजार छपने के बाद

Vikas Mishra : लखनऊ में मुफिलिसी एक अलग तरह का मजा दे रही थी। संघर्ष भीतर से सफाई कर रहा था। एक मोटरसाइकिल थी, एक किराए का मकान था और दिमाग कुछ यूं चढ़ा था कि मीडिया में अगली क्रांति हमीं करेंगे। दिमाग चढ़ाने में सबसे ज्यादा भूमिका थी विचार मीमांसा के मालिक वीएसवाजपेयी की, उन्होंने हम लोगों को स्वयंभू तोप बना दिया था। यही वजह थी कि किसी बड़ी संस्था में नौकरी करने का ख्याल तक नहीं आता था। एक बार तो घनश्याम पंकज से मिलने गया। कुबेर टाइम्स के वो संपादक थे, हफ्ते भर में कुबेर टाइम्स जागरण के लिए चुनौती बन चुका था।

मैंने उन्हें बधाई दी, काफी देर तक बात हुई, उन्होंने इशारों में कुछ नौकरी की बात की और ये जानकर उन्होंने पागल नौजवान ही समझा होगा जो उनके जैसे दिग्गज को सिर्फ बधाई देने गया था। मुख्तार अब्बास नकवी ने युग नाम से एक पत्रिका निकाली थी, उसमें मैं लखनऊ से फ्री लांसर के तौर पर यूपी की सारी कवरेज देता था। उन्होंने लखनऊ ब्यूरो चीफ के तौर पर मेरा नाम भी छापना शुरू कर दिया। मैग्जीन बाद में बंद हो गई, मुख्तार अब्बास नकवी साहब ने मेरे करीब पांच हजार रुपये मार लिए। तब वो सूचना प्रसारण मंत्री थे और बड़ी शानदार मुलाकात भी उनसे हुई थी। लखनऊ से एक बड़ा पत्रकार यूनियन चलाने वाले एक सज्जन ने पत्रिका निकाली, उनके कहने पर मैं उससे विशेष प्रतिनिधि के रूप में जुड़ा। मुझे कई लोगों ने कहा कि ये गे है, कई कुकर्मियों के साथ जुड़ा है, मुझे इससे कोई लेना देना नहीं था। दिन रात मेहनत करके मैग्जीन निकाली। जब पैसे देने की बात आई तो उसने कहा कि मैग्जीन पसंद नहीं आई, मैंने पूछा कि क्या पसंद नहीं आया, बोला- अब इस पर क्या डिस्कस करें।

मैंने फटकार लगाई उसकी नीचता पर और बिना एक भी पैसे लिए वहां से निकल आया। इसी बीच हमारी मुलाकात शील कुमार शुक्ला से हुई थी। अद्भुत क्रांतिकारी जीव थे। पत्रिका शुरू की थी-अभियान क्रांति। उनसे बात हुई, मैं भी उससे जुड़ गया। अब ये था कि क्रांति हो जाएगी। पत्रिका निकालने का मैं मास्टर हो चुका था। शील जी से मैंने कह दिया था कि कम से कम अपनी तनख्वाह भर का विज्ञापन मैं दिलवा दूंगा। दर्जन भर मंत्री ऐसे थे, जिनसे सीधे बात होती थी, कुछ तो घर भी आते थे। व्यावहारिक रिश्तों और हनक पर मुफलिसी का कोई असर नहीं था। लेकिन ये मैग्जनीन भी डूबने लगी।चलने में कोई कमी नहीं थी, लेकिन विज्ञापन में हम लोग मात खा जा रहे थे। हम लोग समझौते के लिए तैयार नहीं थे। दिक्कतें तो हजार पांच सौ की थीं। ऐसे में पचास हजार रुपये का बंडल लेकर एक सज्जन आए। कल्याण सिंह और कुसुम राय की आस पास बैठे कुछ तस्वीरें दीं। एक तस्वीर में कल्याण सिंह बनियान और धोती में थे, बगल में कुसुमराय बैठी थीं। आर्टिकिल भी उनके पास तैयार था, हमें तो बस उसे छापकर 'कल्याण' करना था। ऑफर था कि पहली किस्त अभी बाकी के 50 हजार छपने के बाद। कहने की जरूरत नहीं कि उन भाई साहब को बेइज्जत करके भगा दिया गया।

एक और फाइनेंसर सामने आया। कभी विचार मीमांसा वाले वक्त में ये घंटों इंतजार करके मुझसे मिलता था, लेकिन हालात बदल गए थे। करीब महीने भर बाद जब प्रिंटिंग के पैसे देने की बात आई तो उसने शील जी से कहा कि मेरा नाम विकास जी के नाम से ऊपर जाएगा। मुझे इसमें कोई समस्या नहीं थी, मैं राजी था, लेकिन शील जी राजी नहीं हुए, वो भी हाथ से गया। उसके बाद के दौर में संघर्ष और मुफलिसी की कहानियां जुड़ीं। उधार चढ़ता गया। किसी कुपात्र से नहीं कहा, कहीं बेचारगी से नहीं मांगा। पुराने कई मित्र अच्छी पोजीशन में थे, संदेशा भेजा, दौ़ड़ते हुए पूरा किया।

इसी दौरान विनोद मिश्रा (संपाकीय प्रभारी विचार मीमांसा) यूपी से पहला इंटरनेट बेस्ड न्यूज एजेंसी एक्सप्रेस मीडिया सर्विस लेकर आए। मैं फिर इसका ब्यूरो चीफ बना, लेकिन उपेंद्र मिश्रा जी को भी इससे जुड़वा दिया था। विनोद जी और उपेंद्र जी में ऐसी लड़ाई हुई कि मेरे पास इस्तीफा देने के सिवा कोई रास्ता नहीं था। 1999 में अच्युतानंद मिश्रा जी लखनऊ आए और बुलाकर कहा कि सी वोटर का यूपी का कामकाज देख लो। देखा, अच्छे से देखा। चुनाव खत्म हुए तो राष्ट्रीय स्वरूप अखबार में बतौर ब्यूरो चीफ ज्वाइन किया। और फिर चार महीने बाद मेरठ आ गया अमर उजाला में। ये मेरे जिंदगी की पहली नौकरी थी, जिसे मैंने मांगी थी। बाकी तो बस मिलती चली गई थीं। क्रांति का ख्याल झोले में रखकर टांग दिया था। पहले मेरा ख्याल था कि जहां से हम चलेंगे, वही मुख्यधारा होगी। अब ख्याल बदल चुके थे, पता चल चुका था कि हमारी औकात धारा बदलने की नहीं, बेहतर है कि मुख्यधारा में चलो।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.


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