ओम थानवी का शिकार करने को आए थे, शिकार होकर चले गए!

अभिषेक श्रीवास्‍तव ने भड़ास को एक स्‍टोरी भेजी थी, जिसमें उन्‍होंने जनसत्‍ता के संपादक ओम थानवी को कटघरे में खड़ा किया था. इस मामले में भड़ास के हाथ ओम थानवी का एक पत्र लगा है, जिसे उन्‍होंने अभिषेक श्रीवास्‍तव को भेजा था. इस पत्र और तथ्‍यों को समझने के बाद कथित तौर पर अभिषेक श्रीवास्‍तव ने अपनी गलती मानी थी तथा खेद जताते हुए कहा था कि
ओम जी ने जो तारीखों वाली बात कही है, वह सही है। मुझसे तारीखों को लेकर गफ़लत हुई, इसे मैं मान रहा हूं. इसके बाद भी अभिषेक श्रीवास्‍तव ने ओम थानवी को कटघरे में खड़ा कर डाला. नीचे ओम थानवी द्वारा अभिषेक श्रीवास्‍तव को भेजा गया पत्र, जिसमें उन्‍होंने बातों को क्‍लीयर किया है.  

प्रिय अभिषेक जी,

आपकी टिप्पणी आपके पहले सन्देश पर ही मैं पढ़ चुका था. आपने फिर उसका लिंक भेजा है. मैंने पहले भी लिखा कि यह प्रकरण हमारे लिए बहुत हो चुका. टिप्पणी में अपना लिंक देकर आपने लिखा है : ''यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है।"

मुझे नए कटघरों से परहेज नहीं, पर ज़रा तथ्यों को ज़रूर देख लें. वर्मा जी का "पत्र" और उसके नीचे मंगलेश जी का स्पष्टीकरण आपने (और आप से मोहल्ला लाइव में)  २ मई को शाया हुआ. मेरा स्तम्भ २९ मई को छप चुका था (२० को नहीं, इस तरह डेढ़ महीने को एक महीना कर लें!), तो यह नया कटघरा किस आधार पर? आपके लिंक पर २ मई की तारीख अब भी पड़ी है. मंगलेश जी का कहना है मैंने उनका यह स्पष्टीकरण अपने स्तम्भ (२९ अप्रैल) में क्यों नहीं छापा. आप ही बताएं, आपके २ मई के लिंक से (जिसमें अनंतर का ज़िक्र तक है) इसे जनसत्ता में २९ अप्रैल को कैसे छापा जा सकता था?

आपका,

ओम थानवी

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