”ओम थानवी जी आपसे ऐसी उम्‍मीद नहीं थी मुझे”

आ. Om Thanvi जी. नमस्कार. सर, आपलोग थोड़े-बहुत लोकतांत्रिक बचे हैं इसका भरोसा मैं आप ही का उदाहरण देकर दिलाता था लोगों को. निश्चित ही आपका कद जितना बड़ा है उसमें किसी प्रमाण पत्र की ज़रूरत नहीं है. लेकिन मेरे जैसे एक आम नागरिक का ये कष्ट बड़ा है कि आपने भी असहिष्णुता का ही परिचय दिया. सोशल मीडिया में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता. बाहर कोई कितने भी बड़े तोप हों, उनके जाने-आने से फेसबुक पर कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन आपके द्वारा अन्फ्रेंड करने पर अफसोस केवल यही है कि असहमति के प्रति इतने कठोर दिख कर आप भी ‘वही’ निकले.

 

बाबा भारती की कहानी जानते ही हैं आप. अभिव्यक्ति की आज़ादी के बड़े पैरोकार बन जाने का भरोसा कौन करेगा अब आप पर? सर, इसी आज़ादी ने आप लोगों को भी लाखों में लोकप्रिय बनाया है. लेकिन पीड़ा की बात है कि आप खुद भी वो आजादी किसी को नहीं देना चाहते हैं, ऐसा आपने साबित किया है. लोकतांत्रिक और सहिष्णु बन जाने की सीख केवल लोगों को ही ना दें बल्कि थोडा अमल भी करें इस पर सर. यहां कोई निजी अदावत नहीं है किसी से भी. आपने विनम्रता और शालीनता का भी अभाव नहीं देखा होगा मेरी किसी टिप्पणी में. बस बात महज़ इतनी कि असहमति दिखाने के मौलिक अधिकार में भरोसा करते हैं आप, ये भरोसा था जिसके टूटने पर कष्ट हुआ है और कोई बात नहीं. अफ़सोस.

सादर/पंकज झा.

Yogesh Singh : Pankaj Jha aaj subah aapne meri vyatha padhi ya nahi ??

Yogesh Singh : मेरे दो दो कमेंट्स को थानवी जी ने डिलीट कर दिया, मैंने पूछा क्या रिश्ते इतने नाज़ुक है की सवाल भी नहीं पुछ सकता –उन्होंने मुझे आज सुबह ही ब्लोक कर दिया. जितने बड़े नाम उतना छोटा काम ……

Ravi Tiwari : jeevan isi ka naam hai..aana jaana lga rhega

Girish Pankaj : कुछ लोग अपनी प्रतिभा से नहीं, अपनी चालाकियों से बड़े हो जाते है। चिंता मत करो कि कोई अन्फ्रेंड कर देता है। इनके भयंकर वैचारिक धरातल को देख कर एक दिन मैं खुद इनसे अलग हो गया, क्योंकि मैं केवल ”मनुष्य’ किस्मके लोगों से मित्रता रखता हूँ।, जब वो ”देवता” बनाने की कोशिश करता हूँ, उसे फ़ौरन ”अन्फ्रेंड’ कर देता हूँ। मैं इन्हें अन्फ्रेड कर चुका हूँ। ऐसे लोग मित्र सूची में न भी रहें तो कोई बात नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

Saurabh Tripathi : मैंने आपकी ये पोस्ट उनके वाल पर कमेन्ट के रूप में चैप दी है …अब शायद मुझे भी ब्लॉक कर देंगे Om Thanvi जी….

Anil Purohit : एक प्रसिद्ध विचारक ने कहा है : यह ज़रूरी नहीं कि मैं तुम्हारे विचारों से सहमत होऊँ, पर तुम्हारे असहमति व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्त्तव्य है। काश! अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार भी इस विचार-कण को जीवन का मूलमंत्र बनाएं!

Saurabh Tripathi : जुकरबर्ग का हार्दिक आभार ….अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार(?) बने बैठे बड़े-बड़े मठाधीशों को नंगा करके रख दिया फेसबुक ने …

Srijan Shilpi : ओम थाणवी जी मेरा भ्रम भी बहुत पहले तोड़ चुके हैं और अपनी असलियत जाहिर कर चुके हैं। आप चाहे जितने संतुलित और शालीन शब्दों में उनसे असहमति जताएं, वह उसे अपनी मानहानि समझ लेंगे और दंड-स्वरूप अनफ्रेंड कर देंगे। आखिर बड़े जतन से उन्होंने वह मान अर्जित किया है, इतनी सहजता से कैसे आहत होने दे सकते हैं उसे सोशल मीडिया पर!

Keshav Patel : Hahaha…. Nach meri dulhan peisa milega.

Anil Dwivedi : अफसोस… लेकिन ऐसे लोगों की मानसिकता पर सिर्फ दया ही दिखलाई जा सकती है. वैसे पंकज जी बधाई.. इस मामले से यही साबित होता है कि आपका लेखन ऊंचाईयां छू रहा है और उस पर थानवी जी जैसे लोग पसंद-नापसंद जताने लगे हैं.

Kumar Radharaman : ओशो सिद्धार्थ जी की कुछेक पंक्तियों का संदर्भ देना चाहूंगाः

संबंधों की इस दुनिया में,कुछ छोड़ो मत आधा-आधा

अभिवादन से शुरुआत करो, आभार व्यक्त कर करो विदा

प्रतिक्रिया कभी हो,तो समझो, तुमने घटना को मूल्य दिया

थी लहर ज़रा-सी, लेकिन तुमने,सागर-सा बहुमूल्य किया!

Ashish Maharishi : hahahhahah

बृजभूषण गोस्वामी : मैं आपको आनंद प्रधान और थानवीजी के साथ पढ़ रहा था और पसंद कर रहा था इन्हें बसने के हिसाब से इनका अंर्तराष्ट्रीयवाद इन्हें मुबारक हमारे लिए तो राष्ट्र के परिप्रेक्ष में इनका अध्यन भर है परमाणु बम गिरे या शांति हम यही है और अपनी तरफ से इसके रणनीति कारको को राष्ट्र के स्वाभिमान की चाहना में हम निश्चिन्त करते है और यही हम कर सकते है . मेने एक जगह बामपंथी विचारो में लिखा था आप अपने विचारो के विकास के लिए हमारे बीच में स्वतंत्र है यह जानते हुए भी की जब आप मजबूत होंगे तब हम नहीं रह सकेगे.

Maithily Gupta : जो लोग लम्बे अरसे पुच पुच, हाँजी हाँजी सुनते आये हैं वे फेसबुक पर आकर वही अपेक्षा करते हैं. जब फेसबुक पर लोग काले को काला और सफेद को सफेद कहते हैं तो उनका परेशान होना स्वाभाविक है. लम्बे समय की कुटेब जाते जाते जाती है.

Kalpesh Patel : ये असहमति न सुन सकने कि विवशता है, ये सुतुर्मुर्गी जैसे प्राणी है जो रेट में सर छुपा कर समझते है तूफ़ान नहीं आयेगा, ये खुद को खुदा समझते हैया अपने से बराबर य ज्यादा ज्ञानी से डरते है, इन्हें अन्धो कि भीड़ चाहिए ताकि काने भी रजा हो सके ,,,,,,,,,,,,,,,,सबसे आखिर में वो ये कह सकते है मेरी वाल, मेरी आई डी, मैं किसे रखु किसे न रखु,,,

Ramash Singh : पंकज जी, श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी, मेरी आलोचनाओं से घबडाकर मेरे साथ ऐसा बहुत पहले कर चुके हैं, जबकि वे इतिफाक से मेरे फेशबुक मित्र बने थे।

बृजभूषण गोस्वामी : sab ek hi theli ke hai kyo inka nam kar rahe ho badnam karke

Shashi Shekhar : ये सब तथाकथित अब सुविधाभोगी बन चुके है, अतिरंजना में जी रहे हैं……..

पत्रकार पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार. 

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