ओरछा और झांसी से गहरा रिश्‍ता था चंद्रशेखर आजाद का

देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलाकर अपनी मातृभूमि को स्वाधीन करने के लिए महात्मा गांधी और अन्य सेनानियों द्वारा छेड़े गए आंदोलन में सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में ही कूद पडे़ थे। पंद्रह दिन की सशक्त कैद और बेतों की सजा मिली लेकिन हौंसले पर रंचमात्र असर न पड़ा। बेतों का बेरहम प्रहार झेलने के बाद भी जिनके मुंह से भारत माता की जय के स्वर लगातार फूटते रहे। उस दृश्य को देखने वालों की रूह भी कांप उठी लेकिन स्वतंत्रता के उस दीवाने की दीवानगी पर कोई जर्फ नहीं आई। मातृभूमि की आजादी के दिए प्राण न्यौछावर कर देने वाले उस वीर सपूत का नाम था चंद्रशेखर आजाद।

स्वतंत्रता सेनानियों के गरम दल की अगुआई करने वालों में उनका नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। आजाद लंबी अवधि तक झांसी और निकटवर्ती ओरछा क्षेत्र में स्थित सातार नदी के तट पर फैले जंगलों में छदम नाम से रहते रहे। इन स्थानों से ही वे अपने क्रांतिकारी साथियों से संपर्क साधे रहते और अंग्रेजों के हौंसले को पस्त करने के लिए माकूल रणनीति बनाते रहे। उनके समय में झांसी और ओरछा क्रांतिकारियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन गए थे।

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के भावरा नामक ग्राम में 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। ये दोनों बहुत धर्मिक प्रवृत्ति के थे। माता जगरानी चंद्रशेखर को संस्कृत का प्रकांड विद्वान बनाना चाहती थीं। वे उन्हें वाराणसी के काशी विदयापीठ में अध्ययन के लिए भेजने के लिए पिता पर दबाव  डालती थीं, लेकिन विधाता को कुछ और मंजूर था। बचपन भावरा में ही बीता। इसी दौरान उन्होंने भील समाज के लोगों से तीरंदाजी यानी धनुर्विद्या सीख ली जो बाद में अंग्रेजों से संघर्ष के दौरान उनके काम आई। दिसंबर 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो सिर्फ 15 साल की आयु वाले चंद्रशेखर भी उसमें कूद पड़े। ब्रिटिश हुक्मरानों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पंद्रह दिन की कड़ी सजा मिली। बेतों का प्रहार झेलने के बाद भी वे भारत माता का जयघोष करते रहे। इस नजारे को देखने वाले थर्रा उठे लेकिन चंद्रशेखर का हौसला और मजबूत हो गया। अंग्रेजों के जुल्म की आंच में तपकर उनका व्यक्तित्व कुंदन होकर इस तरह उभरा कि पूरी दुनिया उन्हें आजाद के नाम से जानने पहचानने लगी।

हालांकि 1922 में महात्मा गांधी ने आंदोलन को निलंबित कर दिया लेकिन आजाद और आक्रामक हो उठे। उन्होंने देश की संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए कुछ भी कर गुजरने का निर्णय लिया। वे देश को आजाद कराने के लिए कड़ा से कड़ा रुख अख्तियार करने के हिमायती थे। वे अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष करने की भी पैरोकारी किया करते थे। उनका मानना था कि अंग्रेज यूं ही आसानी से देश छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे उन्हें खदेड़ना पड़ेगा। वे यह भी मानते थे कि भारत का भविष्य समाजवाद में ही सुऱक्षित है। कालांतर में चंद्रशेखर युवा क्रातिकारी प्रणवेश चटर्जी से मिले जिन्होंने उनकी मुलाकात पंति राम प्रसाद बिस्मिल से कराई। बिस्मिल ने हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक संगठन बनाया था। इस संगठन के उददेश्य चंद्रशेखर को बहुत भाए। आजाद ऐसे स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार मिले। जाति धर्म वर्ग या सामाजिक प्रस्थिति के आधार पर किसी से किसी प्रकार का कोई भेदभाव न किया जाए। परिचय के समय ही बिस्मिल उनसे बहुत प्रभावित हुए। बाद में इन युवाओं ने अंग्रेजों को हिला देने वाले कारनामे अंजाम दिए। सशस्त्र संघर्ष के लिए धन जुटाने की मंशा से क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खजाने को लूटने की भी योजना बनाई। सन 1925 में काकोरी में अंग्रेजों का खजाना ट्रेन से लूटने और सन 1928 में लाहौर में एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी की हत्या में आजाद और उनके साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

लाहौर की घटना के बाद भी वे क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम देने में लगे रहे। वे छदम वेश में झांसी में भी रहे। अंग्रेजी सेना की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए वे झांसी के सदर बाजार क्षेत्र के बुंदेलखंड मोटर गैरेज में दूसरे नाम से काम करते रहे। यहीं से उन्होंने कार चलाना भी सीखा। झांसी से करीब 9.3 मील दूर स्थिस है ओरछा। इसी के पास के सातार क्षेत्र के जंगल में आजाद ने अपने क्रांतिकारी साथियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। जंगल के पास स्थित हनुमानजी के एक मंदिर में लंबे समय तक वे ब्रहमचारीजी के नाम से रहते रहे। पास के धीमरपुरा गांव के बच्चों को उन्होंने पढ़ाया भी। इस कारण गांव के लोगों से उनका संबंध अच्छा हो गया। जब वे झांसी में रह रहे थे तो उनका संबंध सदाशिवराव मलकापुरकर विश्वनाथ वैशंपायन और भगवानदास माहौर से भी हो गया। ये लोग आजाद के बेहद करीबी हो गए। तब के झांसी के प्रख्यात कांग्रेस नेता रघुनाथ विनायक धुलेकर एवं सीताराम भास्कर भागवत से भी उनके काफी घनिष्ठ संबंध बन गए। वे नई बस्ती के निवासी मास्टर रूद्रनारायण के घर भी कुछ दिन तक रुके।

राम प्रसाद बिस्मिल के कारण शाहजहांपुर भी क्रांतिकारियों का अहम केंद्र रहा। काकोरी ट्रेन लूटकांड के बाद ब्रिटिश शासन ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। बिस्मिल अशफाकउल्ला खान रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा सुना दी गई। बिस्मिल का गीत सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में स्वतंत्रता के दीवानों पसंदीदा तराना बन गया। यह गीत आज भी सुनने वालों को जोश से भर देता है। अपने कुछ साथियों को फांसी की सजा मिलने के बाद आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के नाम से पुनर्गठित किया। इसके लिए उन्होंने शिव वर्मा महावीर सिंह और भगवतीचरण बोहरा का सहयोग लिया।

वर्ष 1931 के फरवरी माह में आजाद सीतापुर जेल में बंद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। उन्हें उम्मीद थी कि विद्यार्थीजी के मार्फत वे भगत सिंह के केस में कांग्रेसियों को उनकी पैरोकारी करने के लिए मना सकेंगे। विद्यार्थीजी ने उन्हें यह सलाह दी कि वे इस संबंध में इलाहाबाद जाकर पंडित जवाहर लाल नेहरू से बातचीत करें। आने वाले समय वायसराय लार्ड इरविन एवं महात्मा गांधी के बीच समझौता वार्ता प्रस्तावित थी। आजाद अपने साथियों भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव के केस में कांग्रेस के बड़े नेताओं का समर्थन हासिल करना चाहते थे, ताकि उन्हें फांसी से बचाया जा सके। जब वे पंडित नेहरू से मिले तो उन्होंने किसी भी प्रकार की मदद देने से इनकार कर दिया। यही नहीं उन्होंने आजाद को तुरंत इलाहाबाद छोड़ने की सलाह भी दे डाली। 27 फरवरी 1931 को आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अपने साथियों से बातचीत करने के लिए पहुंचे। इसी बीच किसी गद्दार ने उनके अल्फ्रेड पार्क में उपस्थित होने की सूचना ब्रिटिश पुलिस को दे दी। पुलिस ने चारों ओर से पार्क की घेरेबंदी कर ली। आजाद ने अपनी पिस्टल से पुलिस की गोलीबारी का सामना किया। उनकी गोलियों से तीन पुलिसकर्मी मारे गए और कई घायल भी हुए। जब आजाद की पिस्टल में सिर्फ एक गोली बची तो अपने नाम को सार्थक करने के लिए उन्होंने खुद को गोली मारकर प्राणोत्सर्ग कर दिया। वे किसी भी सूरत में आजाद ही रहना चाहते थे। पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने से बेहतर उन्होंने खुद मौत को गले लगा लेना ही माना। जब लोगों को सूचना मिली तो वे पार्क के पास एकत्र हो गए। लोगों ने वहां आजाद के समर्थन और ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में नारे भी लगाए। बाद में उनका अंतिम संस्कार रसूलाबाद घाट पर कर दिया गया। आजाद से संबंधित फाइल आज भी लखनऊ स्थित सीआईडी के मुख्यालय पर रखी हुई है। उनकी पिस्टल इलाहाबाद के संग्रहालय में रखी गई है। अब अल्फ्रेड पार्क को आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है।

सन 1965 में मनोज कुमार अभिनीत फिल्म शहीद में आजाद भगत सिंह और उनके साथियों की गतिविधियों रुपहले परदे पर दिखाया गया। 23 मार्च 1931 शहीद फिल्म में भी इन सबकी गतिविधियों दर्शाया गया। इसके नायक सन्नी देओल रहे। लीजेंड आफ भगत सिंह फिल्म में भी इन सबको दिखाया गया। सन 2006 में प्रदर्शित आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती में भी इन क्रांतिवीरों को याद किया गया। किसी शायर ने ठीक ही लिखा है – शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले.. वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।

लेखक उमेश शुक्‍ल बुंदेलखंड विश्‍वविद्यालय के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नंबर – 9452959936 के जरिए किया जा सकता है.

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