…और दादा नाराज हो गए

दादा… यानि की कमर वहीद नकवी। उनके साथी और शिष्य उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं। शांत और सौम्य दादा को बहुत कम लोगों ने ही नाराज देखा होगा। उनमें से हम कुछ लोग हैं। गलती हमारी ही थी। असल में, आईआईएमसी (२००७-०८) के दिनों की बात है। आनंद सर… की मनुहार पर दादा हिन्दी पत्रकारिता की कक्षाएं लेने को तैयार हुए थे। पहली कक्षा में टेलीविजन पत्रकारिता के गूढ़ तत्वों की जानकारी देने के पश्चात उन्होंने हमें कुछ गृहकार्य दिया था। अगले दिन हम पहुंचे तो ३९ विद्यार्थियों में से कुछ श्रेष्ठ और विज्ञ विद्यार्थियों ने ही गृहकार्य को अंजाम दिया था।

कक्षा में दादा ने एक एक कर सबको खड़ा करना शुरू किया और थोड़ी नाराजगी जाहिर की। बात में शिक्षकों ने बताया कि दादा ने कक्षाएं नहीं लेने की धमकी दी है। कुछ पढऩे वाले विद्यार्थियों को इस बात से बड़ा धक्का लगा, लेकिन हमारे जैसे लोफर टाइप विद्यार्थियों को इस धमकी में बड़ी सम्भावना दिखी। हमने सोचा चलो एक और ज्ञानी से छुटकारा मिलेगा। हठधर्मी में हमने उनकी बाद की कक्षाएं भी नहीं कीं। अब सोचता हूं। हम लोगों ने बड़ी गलती की थी। दादा स्वयं में पत्रकारिता के संस्थान हैं। हमने नासमझी में बड़ा अवसर खो दिया। अपनी और अपने सहपाठियों की इस मूर्खता का क्षमाप्रार्थी हूं।

हाल में ही दादा ने 'आजतक' से सेवानिवृत्त हुए, यह सूचना भड़ास फॉर मीडिया से प्राप्त हुई। बरबस ही पुरानी यादें ताजा हो गईं। दादा को उनके उज्ज्‍वल भविष्य की शुभकामनाएं। आपका पत्रकारिता में योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। धन्यवाद…।

लेखक अरुण कुमार वर्मा आईआईएमसी के छात्र रहे हैं तथा इन दिनों राजसमंद में राजस्‍थान पत्रिका से जुड़े़ हुए हैं.

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