कई चैनलों में काम करता हूं पर पांच हजार से ज्यादा नहीं मिलते..

एक बार फिर से कुछ लिखने का मन हुआ.. खबर है कि न्यूज़ चैनेल्स इन दिनों खर्च कम करने में लगे हैं. कस्‍बों में उनके लिए काम करने वालों के लिए ये बुरी खबर है. आज तक, स्टार न्‍यूज और अन्य ने स्ट्रिंगर से काम लेना करीब-करीब बंद कर दिया है. मजबूरी में ही स्ट्रिंगर को याद किया जाता है कि ये शॉट्स भेज दो या ये बाईट भेज दो. बाकी सब एएनआई से ले रहे हैं… इस न्यूज़ एजेंसी ने हजारों स्ट्रिंगर्स के पेट में लात मार दी है.

न्यूज़ चैनल्स से एएनआई महीने की एक मुश्त फीस लेकर फीड दे रही है. यूपी चुनाव के दौरान ऐसा ही कुछ देखने में आया. खार खाए बैठे स्ट्रिंगर्स एएनआई के कैमरा परसन के कार की हवा निकलने की सोचते रहते थे, ताकि वो कवरेज तक न पहुँचने पाए. जाहिर सी बात है सवाल रोज़ी रोटी का था… सन २००० के आसपास एक स्टोरी करने का चैनल्‍स से ४००० रुपये का भुगतान हुआ करता था. कार-टैक्सी, खाना खर्चा अलग… टेप भेजने तक के लिए टैक्सी मिलती थी.. जो अब घटा कर ३०० से ९०० रुपये कर दिया गया है, कुछ चैनल अपनी अटती पर १५०० रुपए तक दे देते हैं.

तस्वीर का दूसरा पहलू देखें.. चैनल में काम करने वालों का वेतन कहाँ से कहाँ पहुँच गया? ..अंग्रेजी चैनल्‍स में तो दो से पांच लाख वेतन आम बात हो गयी. हफ्ते में पांच दिन काम, आठ घंटे की ड्यूटी.. साल में लम्बी छुट्टी, कोई बड़ा ब्रांड है तो कहने ही क्या? एक एक पर हर माह बीस-बीस लाख से ज्यादा का खर्चा, कोई बोलने वाला नहीं. चैनल्‍स चाहे भी तो एक ब्रांड रिपोर्टर कम करके सभी स्ट्रिंगर का पेट पाल सकते हैं… पर ऐसा करे कौन? कस्बों में चैनल्‍स का स्ट्रिंगर भ्रष्ट हो रहा है. उसका जिम्मेदार कौन है? उसे यदि भर पेट रोटी मिले तो शायद पत्रकारिता की गिरावट रोकी जा सकती है… कुछ साल में चिरकुट चैनल्‍स भी आये हैं यानी रिपोर्टर, स्ट्रिंगर बनाने की दुकानें या ये कहें कि चैनल आईड़ी बनाने का कारोबार शुरू हो गया. पांच से पचीस हज़ार दो आईड़ी ले लो खबर कहीं नहीं दिखेगी… वो सिर्फ इसलिए ताकि कस्बों में ब्लैकमेलिंग का धंधा हो सके.. ऐसा क्यों हुआ? कौन जिम्मेदार है?

एक स्ट्रिंगर का मेरे पास फ़ोन आया… सर मेरा वहां करा दो, आपके दोस्त हैं वहां… मैंने पूछा आप तो पहले से ही दो-दो चैनल्‍स में कर रहे हैं… वो बोला भाई साहब दोनों से पांच हज़ार भी नहीं आता… एक और हो जायेगा तो सात आठ हज़ार हो जाएगा बच्चे की फीस…. कहते-कहते वो रुक सा गया… बोला बड़ी परेशानी में हूँ… ऐसे कई लोग हैं जो ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं पर अंदरूनी तौर पर रो रहे हैं… कुछ काम इसलिए नहीं कर सकते क्यूंकि उनकी दुश्मनी पत्रकरिता की वज़ह से समाज में बढ़ गयी है… प्रशासन के साये में रहना मजबूरी है… ग्लेमर भी एक वज़ह है…. भोपाल में एक युवा मित्र है उन्हें एक बड़े चैनल में दूसरे चैनल से लाकर इस लिए रखा गया कि तुम्हे ६ महीने में रिटेनर से रिपोर्टर बना देंगे पर दस साल बीत गए वो रिपोर्टर तो नहीं… स्ट्रिंगर जरूर बन गए… अब आगे उनका क्या होगा? कोई नहीं जानता दस साल बर्बाद हो गए… अब कोई दूसरी नौकरी का विकल्प भी नहीं बचा… पता चला है कि वो शादी-बारात में वीडियो फिल्म बना रहे हैं… क्या करें घर खर्चा चलाना मुश्किल हो गया है.

हम ये इस लिए लिख रहे हैं ताकि नए लोग इस लाइन में आने से पहले दस बार जरूर सोचें… वो लोग ख़ास तौर पर जो कि पत्रकरिता की पढ़ाई या कोर्से करने और टीवी में ख़बरें पढ़ने या रिपोर्टिंग के सपने देखते हैं… दोस्तों बड़े चैनल्‍स जो कि अपने मीडिया संस्थान चला रहे हैं वो आजकल अपने यहाँ नौकरी नहीं दे पा रहे…. इस लिए सोच विचार कर इस दुनिया में आइये…. क्यों कि ये वो दुनिया है जो किसी की सगी नहीं है…. हर कोई अपनी बचाने में लगा है… दूसरे को धक्का मारने में लगा है… यहाँ कोई मर्यादा नहीं है, कोई माप दंड नहीं है… कोई बच्छावत नहीं है… कोई काटजू नहीं है… कोई ब्रॉडकास्टर यूनियन नहीं है… कोई स्ट्रिंगर के लिए मंच नहीं है.. तो ऐ भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

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