”कई संपादक मित्रों ने नौकरी के आफर दिए पर मैंने ठुकरा दिया”

शुरू-शुरू में तो मुझे बड़ा अजीब लगा था। अमर उजाला से अवकाश ग्रहण करने के बाद न कोई फोन करता न आने-जाने वालों की लाइन लगती। प्रबंधन के तमाम जीएम टाइप के लोग जिनकी जबान सर-सर करते नहीं थकती थी, ने फोन तक उठाना बंद कर दिया था। उनके कई निजी काम भी मैंने करवाए थे अचानक मुझे भूल गए। पूरे कैरियर में पहली बार ऐसा देखा। लेकिन अब मजा आने लगा है।

अब तो अच्छा लगता है कि बहुत कम उम्र में सेवानिवृत्ति ले ली। मजे से घर पर आए सारे अखबार पढ़ता हूं, टीवी देखता हूं और रात समय पर सो भी जाता हूं। कभी-कभी सिंगल माल्ट व्हिस्की के एक-दो पैग ले लेता हूं। लोगों को खाने पर बुलाने का पूरा समय रहता है। सुबह एक पार्क में जाकर वाक करता हूं और नहीं गया तो घर पर ही ट्रेड मिल पर आधा घंटा चल लिया। डायबिटीज, बीपी सब समाप्त हो गया है। कोई टेंशन नहीं। जब मन आया तो कानपुर चला गया और अब तो वहां से अपने गांव भी चला जाता हूं। घर पर कोई जिम्मेदारी नहीं इसलिए जो नौकरी के आफर आए मैंने स्वयं ही ठुकरा दिए। अपने कई मित्र अब बड़े-बड़ पत्रों के संपादक हैं उन्होंने कहा भी लेकिन मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

मुझे लगता है कि ५५ के बाद आदमी को अपनी जिंदगी स्वयं जीनी चाहिए। नौकरी करते रहने का अर्थ है कि आप गुलामी से पिंड नहीं छुड़ा पा रहे हैं। आपको भले लगता हो कि आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, पत्रकारिता में नए मानदंड तय कर रहे हैं लेकिन कोई नहीं मानता कि आपने बड़े काम किए। मार्कण्डेय काटजू कभी भी आपके मुंह पर जूता मार सकते हैं कि जाओ और पढ़कर आओ, पत्रकार पढ़े लिखे होते नहीं बिल्कुल माटी के लोंदे की तरह। यह भी हो सकता है कि आपको लगता हो कि परिवार को आप सहारा दे रहे हैं। लेकिन यह भी आपके मन का भ्रम है। कोई भी आपसे उम्मीद नहीं करता। इसलिए मित्रों मुझे लगता है कि जितनी जल्दी नौकरी की टेंशन से मुक्त हो जाओ उतना अच्छा।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल की एफबी वॉल से साभार.

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