कपड़े उतारने की परम्‍परा तो खबर है, फिर क्‍यों नहीं चला पाए समाचार

बाबा गंगा दास जी का आश्रम आस्था व भाईचारे की मिशाल है और इस पावन स्थान पर जाकर लोग मनन और चिंतन के साथ साथ अपना सबकुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं। उस पवित्र सिद्धपीठ के अन्दर जाने के लिए अलग वस्त्र पहने जाते हैं। यह अपने आप में खबर है। बावजूद इसके अनिल भाई अपने चेलों के समूह में गए, आईबीएन7, जीन्यूज, एनएनआईएस, जनसंदेश जैसे कई चैनलों की माइक आईडी लगाकर इन्टरव्यू भी किये। कपडे़ निकालकर बाबा का दर्शन भी किया और गिफ्ट पैक व लिफाफे पाकर भावविभोर भी हो गए थे। लेकिन उपर्युक्त किसी चैनल में इन्टरव्यू और यहां के कपडे़ की परम्परा का कोई भी समाचार नहीं चला पाए। यह तो धर्म के साथ-साथ विश्वासघात है। और यही बात मैंने लोगों के सामने रखने की कोशिश की। मेरे हिसाब से उन्होंने यह साबित भी कर दिया कि स्थान कोई भी हो गिफ्ट लेने में कोई ऐतराज नहीं है।

दूसरी तरफ सरायलखंसी थाने में मेरे खिलाफ 376 का कोई मामला नहीं है, अगर वे साबित कर दें कि सरायलखंसी थाने में मेरे खिलाफ 376 का मुकदमा दर्ज है तो मैं इनको एक हजार रुपए का नगद इनाम दूंगा। साथ ही मैं 2007 से 2010 तक स्टार न्यूज का संवाददाता था, जिसका सबूत मौजूद है। अब मैं न्यूज एक्सप्रेस में हूं या कहां हूं यह सफाई मुझे देने की कोई जरूरत नहीं है। अनिल ने मेरे दो कार्ड भड़ास को भेजे हैं, उस तरह का कार्ड बनाना इनके बांए हाथ का खेल है। 2 माह पूर्व अनिलजी ने पत्रकार संगठन में रहते हुए दर्जनभर के आसपास लोगों को पत्रकार संगठन का फर्जी कार्ड व सदस्यता उपलब्ध कराए थे, जिसे लेकर काफी हंगामा हुआ था। यहां तक कि मौजूदा अध्यक्ष की ओर से कार्ड वापस करें नहीं तो मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी के बाद किसी तरह मामला शान्त किया गया। तो साफ है ऐसे आईडी कार्डों की जरूरत इन जैसे धंधेबाजों को होती है।

ये एलआईसी, सहारा के एजेन्ट है, केबल डिश का धंधा भी करते हैं, पान की दुकान भी चलवाते हैं, पत्रकारिता की धौंस देकर मकान मालिक की दुकान पर कब्जा भी जमाते हैं, जिसका मामला कोर्ट तक जा चुका है। जीन्यूज और आईबीएन7 जैसे दो बडे़ चैनलों के अनिल कुमार और अनिल कश्यप, दो अलग-अलग नामों से पत्रकार भी हैं। ये सारी योग्यताएं इनकी फितरत बयां करने के लिए काफी है। भड़ास पर पूर्व में इन्‍होंने फर्जी बिल भेजकर मुझे बदनाम करने का प्रयास किया था, लेकिन हम वर्ष 2002 से पत्रकारिता में हैं, जब इनका पत्रकारिता से दूर दूर तक का वास्ता नहीं था। मेरा अलग से कोई कारोबार नहीं है। यहां के लोग मुझे व मेरे कार्यों को लम्बे अरसे से देख रहे हैं। इनका बेहतर काम इनको आगे ले जाएगा, आईडी कार्ड व लेटर की जरूरत मुझे कभी पड़ती ही नहीं।


इस बारे में जानने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं –

पत्रकारों की कुश्ती का मैदान न बन जाए भड़ास

सिद्ध पीठ में धोती पहनकर जाने का रिवाज है, इसलिए पत्रकारों ने पैंट उतारा

गिफ्ट-पैसा पाने के लिए पैंट तक उतार दी पत्रकारों ने


वर्ष 2007 में हुई शहर में 5 हत्याओं मे मेरी संलिप्तता की बात ही निराधार है। पूरा मामला आत्महत्या का था। और पुलिस ने मुझे इनके वर्तमान गुरुदादा जैसे बडे़ पत्रकारों के कहने पर हिरासत में लिया था, लेकिन अंततः 43 दिन बाद ही मुकदमा बंद कर दिया गया। फाइनल रिपोर्ट लग चुकी है। अतः आप द्वारा इस मामले में मेरे उपर लगाया गया आरोप मेरा ही नहीं बल्कि मुझे बाइज्जत बरी करने वाले न्यायालय के सम्मान को भी आहत करने वाला हैं।

अनिल भाई, बाबा मेरे पूर्व से श्रद्धेय है। उस कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित भी किया गया था। लेकिन यह खबर मेरे चैनल पर जाने लायक नहीं थी। अतः मैं नहीं गया। तो इसमे खीझ होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन आप तो गिफ्ट के नाम पर मिलने वाली पेनड्राइवों के चक्कर में बाइक शोरूमों में जाने से भी गुरेज नहीं करते। अनिल भाई आपकी पत्रकारिता का आलम यह है कि अगर कोई पुलिसवाला हाथ दे दे तो आप मौके पर ही धरना देने लगते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले आपने अफीम कारखाने के गेट पर कुछ ऐसा ही किया था। अनिल भाई जी न्यूज के पत्रकार है या आइबीएन7 के इसकी जानकारी यहां के सूचना विभाग को 2 माह पूर्व तक नहीं थी। हम माइक कैमरा चमकाने का नहीं चलाने का अनुभव रखते हैं। इसलिए आप जो भी आरोप लगा रहे हैं, वो कितने सच है, गाजीपुर के लोग और पत्रकार बखूबी जानते हैं। आपके द्वारा पीडित एक संस्था के लोगों द्वारा दी गई जानकारी संलग्न है गौर फरमाइएगा।

राकेश पाण्डेय

गाजीपुर

 

 
 

 

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