कभी कभार गरीबों का भी सुन लिया करो ईमानदार विधायकों!

हो सकता है यह सब लिखने पर मुझे यूपी विधानसभा की अवमानना का सामना करना पड़े। यह भी संभव है कि इसके लिए मुझे दंडित किया जाये। ऐसे में यह लिखना उचित नहीं है मगर यह नहीं लिखा तो मेरी आत्मा पर बोझ रहेगा लिहाजा मैं कुछ बातें लिख रहा हूं, मगर इन सबको लिखने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं लोकतंत्र की इज्जत नहीं करता या फिर मुझे यूपी की गौरवशाली विधानसभा पर यकीन नहीं है।

यूपी विधानसभा में मैं प्रेस दीर्घा में बैठा हुआ था बल्कि उस समय उठने ही वाला था जब भाजपा विधायक सुरेश खन्ना ने मसला उठाया कि विधायकों की तनख्वाह कम है और इसमें वह ईमानदारी से लोगों को चाय भी नहीं पिलवा सकते। मुझे लगा कि सदन में बैठे लोग अभी यह बात कहेंगे कि प्रदेश की हालात को देखते हुए विधायकों की तनख्वाह बढ़ाना उचित नहीं है। मगर अगले कुछ मिनटों में जो कुछ हुआ वह मुझे हतप्रभ कर देने वाला था या यूं कहूं कि मैंने इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी।

आजम खां ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए न केवल इसे जायज बताया बल्कि मीडिया के लोगों को खरी-खरी सुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। उनका कहना था कि जरा सी तनख्वाह बढ़ाने पर मीडिया उनको बुरा भला कहने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि मीडिया वालों को अपनी तनख्वाह नजर नहीं आती जो इतनी बढ़ी हुई है। विधान सभा अध्यक्ष से भी उन्होंने अनुरोध किया कि वह इसका विरोध न करें। यही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि इस तनख्वाह में किसी का भी सत्कार नहीं किया जा सकता। लगे हाथ उन्होंने जोड़ा कि इससे पहले विधायकों को गाडिय़ा खरीदने के मामले में अनुदान दिये जाने पर भी मीडिया ने खासा बवाल मचाया था जबकि ऐसा नहीं था। आजम खां की इस बात का विरोध करने वाला सदन में कोई भी विधायक दिखाई नहीं दिया।

सबसे पहले बात मीडिया की तनख्वाह की। आजम खां जी को यह बात भली भांति मालूम होगी कि मीडिया में पत्रकारों का कम शोषण नहीं है। आये दिन बिल्डर, माफिया छवि के लोग अखबार निकालते जा रहे हैं मगर पत्रकारों को बेहद कम पैसा दे रहे हैं। साथ ही यह बात भी सही है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया सहित कुछ बड़े अखबारों में तनख्वाह बहुत ज्यादा है। मगर मैं यह बात समझ नहीं पाया कि मीडिया की तनख्वाह और विधायकों की तनख्वाह की तुलना कैसे की जा सकती है। मीडिया को पैसा जनता की कमाई से नहीं मिलता। इसके अलावा न ही कोई विकास निधि मीडियाकर्मियों को मिलती है। ऐसे में उनकी तुलना विधायकों से करना कदापि उचित नहीं है।

आजम खां जी जब विधायकों की इस गरीबी और उनकी ईमानदारी और सज्जनता का जिक्र कर रहे थे उस समय मैंने पूरे सदन में देखा तो मेरी निगाह बरबस राजा भैया, मुख्तार अंसारी, अभय सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह पर जाकर ठहर गईं। मैं सोचता रहा कि इतने सम्मानित सदन में इस तरह की छवि के लोग आखिर कैसे आ जाते हैं। नेता रटा-रटाया भाषण देते हैं कि जब जनता ने उन्हें चुना है तो उन पर उंगलियां कैसे उठाई जा सकती है। बात सही है। हमारे नेता बहुत काबिलियत के साथ जनता को धर्म और जाति के ऐसे खेल में उलझाये रहते हैं कि जनता को इस बात की फुरसत ही नहीं होती है कि वह इससे इतर भी कुछ और सोच-समझ सकें।

सदन में मैं बड़ी संख्या में विधायकों को निजी तौर पर जानता भी हूं। इनमें से दर्जनों विधायक ऐसे हैं जो अपने साथ एक दो नहीं बल्कि दो तीन गाडिय़ा लेकर चलते हैं। किसी भी गाड़ी की कीमत बीस लाख से कम नहीं होती। कई विधायक ऐसे हैं जब वह पहली बार चुनकर आए तो अपने शपथ पत्र में कुल संपत्ति मात्र कुछ लाख दिखाई, मगर कुछ सालों के भीतर ही यह संपत्ति इतनी ज्यादा बढ़ गयी कि बड़े से बड़े उद्योगपति भी इस बात पर रश्क करेंगे कि आखिर पैसा बढ़ाने का यह सिस्टम उन्हें क्यों नहीं आता।

आजम खां की खुद की छवि ईमानदार किस्म की है। वह पैसा नहीं कमाते ऐसा सभी का मानना है। कितना अच्छा होता कि वह तनख्वाह बढ़ाने की बात पर सदन में इन सब बातों का उल्लेख भी करते और कहते कि ऐसे आचरण से सदन की मर्यादा गिरती है। किसी भी जनपद में जाकर स्ट्रिंग ऑपरेशन कर लीजिए। विधायकों की विकास निधि की सच्चाई सामने आ जायेगी। विधायकों के विकास कार्यों के लिए फाइल बनाने वाले क्लर्क से लेकर कलेक्टर तक का कमीशन तय है। कोई भी कार्य हो यह कमीशन बड़े आराम से बंट जाता है। कोई पूछने वाला नहीं होता कि अफसरों की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है कि वह विधायकों के काम में भी कमीशन ले लेते हैं। मगर मामला बेहद साफ है। अफसरों को पता है कि विधायक कौन सा काम क्यों और किस लिए करा रहे हैं।

कुछ साल पहले ही प्रदेश भर के आधे से अधिक विधायक मिट्टी का काम कराने पर तुल गये थे। एक किलोमीटर मिट्टी डलवाने में पैंतीस से चालीस हजार रुपये का खर्चा आता था मगर अफसर इसके लिए एक से सवा लाख की धनराशि जारी करते थे बचा हुआ पैसा विधायक जी और अफसरों में सम्मान पूर्वक बंट जाता था। अच्छा होता आजम जी पिछली सरकार में विधायक निधि से लगवाई गयी हाई मास्क लाइटों की जांच करवा लेते। पन्द्रह हजार की लाइट नब्बे हजार में लगवाई जा रही थी। यहां भी कमीशन का यही खेल बड़ी ईमानदारी के साथ खेला जा रहा था। यह तो पैसा कमाने की बात थी। मगर कुछ और बातें भी जरूरी हैं। जिस प्रदेश में किसान भूख और कर्जे के कारण आत्महत्या कर रहे हों। जहां लोगों को दो वक्त की रोटी और उनके बच्चों के लिए दवाइयां न मिलती हों उस प्रदेश में इस गरीब जनता के भाग्य विधाता उस जनता की छोड़कर अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बात करें तो उनकी आत्मा कैसे यह सब स्वीकारती होगी। बेहतर हो कि विधायक एक स्वर में यह मांग करें कि जब तक इस प्रदेश के लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिल जाती तब तक वह अपनी तनख्वाह का कुछ प्रतिशत इन गरीबों को देंगे। मगर नेताओं से इस ईमानदारी की बात करना उफ…!

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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