”कमलेश, कुलदीप, ओम थानवी के बाद अब फेसबुक के पण्डों के निशाने पर हैं अशोक वाजपेयी”

Om Thanvi : कमलेश, कुलदीप कुमार, ओम थानवी, प्रताप राव कदम के बाद अब फेसबुक के पण्डों के निशाने पर हैं प्रतिष्ठित कवि अशोक वाजपेयी। कोसा जा रहा है कि वे मुंबई में एक दक्षिणपंथी मंच पर एकल कविता-पाठ करने क्यों गए थे? एक पण्डे ने इस पाठ के लिए उनकी "सख्त भर्त्सना" भी कर दी है!

जरा पण्डों से पूछा जाय कि फेसबुक पर वे जो स्टेटस लगाते हैं, क्या उन्हें पढ़ने वाले हर शख्स की विचारधारा उन्हें मालूम है? अगर उनका स्टेटस या विचार कोई भी पढ़ सकता है, तो अशोक वाजपेयी की कविता हर कोई क्यों नहीं सुन सकता? कभी-कभी लोकतंत्र की बात करने वाले लोग जाने किस किस्म के लोकतांत्रिक आचरण की बात करते हैं, जिसमें कवि पहले कविता सुनने वालों की विचारधारा मालूम करे?

दक्षिणपंथियों से मेरी जरा सहानुभूति नहीं, न उनकी विचारधारा का मैं लिहाज करता हूं; पर कविता सुनने के उनके अधिकार को चुनौती देना निहायत तानाशाही का फतवा है। यह एक तरह का फासीवाद है, जिसमें जातिवाद और छुआछूत को विचारधारा का जामा पहनाया जा रहा है।

जैसे कविता की किताब पढ़ने का अधिकार सबको होता है, मंच से कविता सुनाना भी कविता का प्रकाश फैलाना है। ठीक वैसे ही जैसे कवि द्वारा अपने काव्य-संकलन को प्रकाशित करना। कौन कविता किसके कान में पड़ने के योग्य है और किसके नहीं – क्या इसे पहले तय किया जा सकता है? वह भी वैचारिक पूर्वग्रहों के आधार पर?

स्वप्निल कुमार ये तालिबान बनाकर छोड़ेंगे.

Dhiraj Bhardwaj पता नहीं लोग फेसबुकी पण्डों को इतनी माइलेज क्यों दे रहे हैं..

Bharat Tiwari ये हल्युसिनेशन के घोर लक्षण हैं

Vaibhav Mani Tripathi विचार आदमी के लिए है की आदमी विचार के लिए?

Zubair Shahid taras aata hai aise logo par jo purvagarah se grasit hai. ek kavi ko he kyo sabko ajaadi hai bolne ki, wakai me yd log barbad karne par tule huye hai.

Cine Manthan गांधी को बचाना पडेगा चोट से अगला निशाना वे भी हो सकते हैं| उन्होंने तो बचपन में बीते ऐसे प्रसंग ही लिख दिए हैं आत्मकथ्य में कि वे गाँव के बुरी आदतों वाले लड़कों के साथ इसलिए रहे कि उन्हें सुधार सकें|

Dhiraj Bhardwaj उन फेसबुकी पण्डों का वजूद तब तक ही है, जब आप उन्हें नोटिस करने के लिये पोस्ट और कमेंट लिख रहे हैं.

Shayak Alok keep rockkin ! .. जरुरी हस्तक्षेप आपका ..

Devesh Rajeev Tripathi Itni ''Potash'' Laate Kaha Se Hain….?

Pravesh Shukla चलो माना ऐ अजनबी खूबियाँ मुझमें नहीं,
मगर कुछ तो है जरुर जो तू सिर्फ मुझे,
नज़रअंदाज़ करता है!!

Binit Kumar बहुत पहले स्टारलिन ने कहा था कि हथियार कहां से आता है ये मतलब नहीं है यह किसके खिलाफ इस्तमाल हो रहा है यह् ज्यादा महत्वपूर्ण है

Cine Manthan क्या ये स्वयम्भू फतवेबाज वामपंथी दलों की भर्त्सना कर चुके हैं क्योंकि इन्होने अपनी घोर विरोधी दक्षिणपंथी भाजपा के साथ मिलकर वी.पी.सिंह की सरकार बनवाई थी और तकरीबन डेढ़ साल चलवाई भी और हरेक मंगल को वी.पी सिंह के यहाँ डिनर टेबल भी भगवाधारियों और तिलकधारियों के साथ सांझी की|

Rashmi Chaturvedi ये समाज में बढ़ती असहिष्णुता के लक्षण है|

Cine Manthan कवि के बाद रवि का भी नंबर लग सकता है कि वह दक्षिणपंथियों के आँगन में किरणे क्यों बिखेरता है?

Pratyush Pushkar इस मामले में जब एक कवि/साहित्यकार दूसरे का नहीं हो पाता है तो आप कहाँ किसी पण्डे से उम्मीद रखते है ! दूसरों की की गयी हर गोष्ठी से दिक्कत है पहले वाले को यहाँ, और नुख्स खोजे जाते है, कवितायों से लेकर मंच तक में ! बहुत क्षोभ है और नया ही जुड़ा हूँ पर देखा है यह क्षोभ ! दुखद! साहित्या को किसी भी सीमा में बाँधने की बात गलत ही है !! संगठन से लेकर आइडियोलॉजी तक !!

Bharat Tiwari अजब तबका है ये … दया आती है इनपर … खुद चैन नहीं तो दूसरे को चैन से ना रहने दो … क्या इस दुनिया में कोई ऐसी भी बात है? जिस पर इनकी अपनी राय ना हो और जिसे वो हर दूसरे पर ना थोपें … वैसे सुनता कोई नहीं इनकी (प्रीमियर लीग के मेम्बरान को छोड़ दें तो) लेकिन फिर भी बक-बक बक-बक … जी मैं लेखक हूँ – सबसे बड़ा … जी मैं संपादक हूँ – सबसे बड़ा … जी मैं इतिहास का सबसे बड़ा ज्ञाता हूँ … कूक मंडूक ……… फलां को लाइसेंस से दिया – अब ये नए युग का सबसे बड़ा अ.ब.स.द. है … यहाँ सब कुछ ना कुछ हैं … और सबके पास अपने अपने दिमाग भी हैं …

Raj Ke Geet ओम जी, ये नोट पढ़कर अच्छा लगा। लगा की कोई प्रतिबद्ध है मॉडरेशन के लिए, समन्वयता के लिए ..हम ही हम है तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो। अलग विचार, अलग बिम्ब, आवश्यक है सभी चीजों के लिए। कविता तब तक बनी रहेगी जब तक मतभेदों के साथ आदर भाव से रहने की संभावना जीवित रहेगी ..सहमत

Ankit Muttrija सर,दक्षिणपंथी विचारधारा मुझे भी फूंटी आँख नहीं सुहाती ना ही दक्षिणपंथियों की बातें|पर सोचिये यदि इसी रवैए से हरेक विचारधारा का शख्स अपने-अपने खेमों में विभाजित हो कर एक दूसरें का बहिष्कार करें तो क्या होगा ?मैं पहले स्वयं नास्तिक होने के नाते भी आस्तिकों की आस्था का सम्मान करता था आज भी करता हूं पर कभी-कभी अतार्किक हो कर बहुत ज्यादा उग्र हो जाता था पर अब मेरा सोच यह है कि यदि हम दूर से ही उन चीज़ों का बहिष्कार कर देंगे जिन्हें हम नापसंद करते हैं तो बदलाव करना संभव ही नहीं|अंतत:उन्हीं लोगों के बीच जा कर हमें अपनी बात रखनी होगी जिनकी विचारधारा हमें पसंद नहीं|इसलिए किसी विचारधारा के अनुयायी को भी इतना कट्टर नहीं होना चाहिए कि सामने वाला आपसे बात तक करने से हिचके|यदि,दक्षिणपंथी मंच से भी कवि महोदय कुछ ऐसी बात कह जाए जो उस विचारधारा को कुछ समझा पाए तो इससे बेहतर क्या होगा|

Basant Jaitly मै स्वयं इस मामले में किसी किस्म के विभाजन का समर्थन नहीं करता.

Ankit Muttrija और कोई भी इंसान बुरा नहीं होता | विचारधारा तो सामाजिक परिवेश से बनती हैं|विचारधारा नहीं पसंद तो उसका विरोध कीजिए लोकतांत्रिक तरीके से पर इंसान से घृणा न कीजिए चाहे वो जो कोई भी क्यों ना हो |बल्कि,उनके प्रति सहानुभूति रखिए.. उनके लिए कुछ कर सकेंगे ऐसा कुछ कीजिए.. ना कि उनका बहिष्कार ही कर दीजिए|

N V Upadhyay Upadhyay shradhe ,thanwi ji,"aek kahaawat hai, 'janhaa naa pahunche 'ravi' wahaan pahunche kawi ! To fir aapatti ki koi baat nahi ! Samaa lochnaa , me bhi aapatti ki koi baat nahi ! Aapatti wahnaa pe waajib hogi janhaa hinsak maawo waadi ke pachh me koi 'Thakur suhaati' kaa 'wesh' dhaaran kar le ! Maawo waadiyon ki mahimaa mandan ki paraakaasthtaa koi saahityakaar naa karen !" Jai hind ! Jai bhaarat !!!

Vivek Shrivastava Ye tao balki aur jyAada achchi baat hai ki Aap un vyaltiyon ke samkash apne vichaar rakhe jo aap se sahmat nahi ya ve dusri vichaar dhaata ke hoon

Amitabha Pande Why are ideological debates in the Hindi world so far behind the rest of the world ?

हितेन्द्र अनंत लाल तालिबान

Smita Vajpayee Lal taliban… Sahi hai !

Harish Sharma abhivaykti ke khatre uthane hee parege ,torne hee hoge math aur gharr sab ……

Rajeev Ranjan Upadhyay jay ho

Girijesh Vashistha हिंदी कविता से कुछ ज्यादा ही विवाद नहीं जुड़ते रहते । काम जितना हो कहा है उससे ज्यादा झगड़े है. क्यों ?

Sudha Singh ji ye log bahut kunthit vyakti hain ………….yah anargal pralaap hi unki ideantity hai ………..varna unka naam bhi log na jaanein …………..

Vimal Chandra Pandey श्रीमान ओम थानवी साहब, आप समझदार व्यक्ति हैं, इस मुआमले को वस्तुनिष्ठ न बनाते हुए थोड़ा खोल कर इस तरह कहा जाए कि एक कविता पाठ होता है जिसे एक ऐसा व्यक्ति आयोजित करा रहा है जो हिंदी भाषियों का घोर और हिंसक विरोध करने वाली पार्टी 'महाराष्ट्र नव निर्माण सेना' यानि मनसे का उपाध्यक्ष है तो एक हिंदी कवि को इस आयोजन में जाना चाहिए या इसका बहिष्कार करना चाहिए ? क्या यह इतना छोटा सा मामला है कि सिर्फ 'एक दक्षिणपंथी मंच' कह कर छुट्टी पायी जा सकती है ? ऊपर कमेन्ट करने वाले बहुत से दोस्तों को शायद पता नहीं कि वह दक्षिणपंथी मंच मनसे का प्रदान किया हुआ था, वही मनसे जिसने रेहड़ी लगाने वालों और टैक्सी चलने वालों हिंदी भाषियों को खदेड़ खदेड़ कर महाराष्ट्र से बहार किया था, क्या एक हिंदी कवि को इस पर कोई स्टैंड नहीं लेना चाहिए ? क्या कविता पढ़ना इतनी महत्त्वपूर्ण बात है कि मंच का ध्यान ही न दिया जाए ?

Anju Mishra rachna to vo ha jo man ko chhu le. jaise tulasidas ki manas. kavita samaj ko disha deti ha .jan jan me jivan milyon ka sanchar karti hai . isliye kavi aur kavita ko sankuchit karna uchit nahi.

Satyam Shree fir itni preshani ki kya bat hai thanvi sahab sabse badi bat to ye hai ki aap so called elite logo ki gud khaye gulgullo se parhej wali bimari se pidit hain wrna dakshinpanth koi deshdroh ya samaj virodhi karm nahi hai wrna dakshin panthi kahne walo ko jwab dene ya spastikaran dene ki jururat to ni thi yahi sb apke ideolical opponent ko hausla badhane ko kafi hota hai.

Mahendra Prasad Kushwaha बिलकुल सही कह रहे हैं सर…

महाभूत 'चन्दन राय' कवि अशोक वाजपेयी। .. !

आम आदमी बिना टोपी Vimal Chandra Pandey जी से सहमत , सिर्फ दक्षिण पन्थी कहने से बात साफ़ नहीं हो रही थी

Madhu Arora थान्‍वीजी, नमस्‍ते। यह हिन्‍दी साहित्‍य का संक्रमण काल चल रहा है। हर कोई वार कर रहा है। कविता दिल से निकले भाव होते हैं अब उन्‍हें भी विभाजित करके पढ़ा जाये। अजीब मसला है।

Anurag Chaturvedi विमल चंद पांडे@ की बात में दम है.अशोक जी तो शिव सेना के विरोधी थे.

Purnima Awasthi pande ka funda…………sunday ho ya monday ..roz maaro ande…. kya wo kisi bhi kism ki ,ratti bhar bhi tavajjo ke laayak hain?…..

Shanti Prasad Bissa SUCH,LIKE

Prakash Khatri kuchh log fitratana selected audience hi pasand karte hein…kewal wohi log hon jinke saamne kavita parosi ja sake.

शरद श्रीवास्तव आपके पांडे जी ने कभी भी ये नहीं कहा की दक्षिण पंथियो को कविता न सुनाओ। उन्होने वाम या दक्षिण पंथ केलोगों को कविता सुनाने या न सुनाने को लेकर कोई बात नहीं कही बल्कि जैसा विमल जी ने कहा की उन्होने मंच का प्रश्न उठाया था। उन्होने मनसे का मंच इस्तेमाल किए जाने पर वाजपेई जी की आलोचना और भर्त्स्ना की। आपने तोड़ मरोड़ कर बात को पेश करने में वाकई अपना जलवा दिखा दिया।

Ramji Tiwari Vimal ठीक कह रहे हैं | आप हमसे और विमल से अधिक 'मनसे' को जानते हैं | उनके कुकृत्यों से परिचित हैं | मसला यह नहीं था , कि वहां श्रोता कौन था और कौन नहीं | निश्चित रूप से यह तय भी नहीं किया जा सकता | लेकिन उस कार्यक्रम का आयोजक कौन था , यह तो मसला है ही |

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey अशोक वाजपेयीजी का कहना है कि उन्हें वरिष्ठ कवि जगदम्बाप्रसाद दिक्षित ने आमंत्रित किया था।

Om Thanvi Ramji Tiwari आयोजक क्या मनसे था? अशोकजी के अनुसार सौ से ज्यादा लोग कविता सुनने को आए थे, क्या वे मनसे कार्यकर्ता थे?

Vimal Chandra Pandey माफ कीजियेगा ओम जी लेकिन अशोक जी कविता के कोई नए रंगरूट नहीं हैं कि उन्हें कोई आयोजित करेगा तो वह बिना आयोजक के बारे में प्रॉपर जानकारी लिए वहाँ कविता पाठ के लिए चले जायेंगे. स्पष्ट कर दूं कि मुझे अलग विचारधारा वाले कवियों या रचनाकारों के साथ संवाद करने से कोई ऐतराज़ नहीं है लेकिन आयोजक जब कोई हिंदी विरोधी (और विरोध भी हिंसक) मंच हो तो कम से कम एक हिंदी कवि के वहाँ जाकर कविता पढ़ने को मैं तो बहुत अशुभ संकेत मानता हूँ

Vimal Chandra Pandey नहीं, वे मनसे कार्यकर्ता क्योंकर होंगे लेकिन ज़ाहिर है मनसे की गतिविधियों से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा. समर्पित कार्यकर्ता और विरोधी के बीच एक और कड़ी भी तो होती है जो भले कार्यकर्ता न हो, समर्थक होती है.

Ankit Muttrija क्या वहां पर कवि महोदय उस बीमार इंसान की शर्तों पर गए थे ? क्या वहां वह इन शर्तों पर गए थे कि कविता पाठ मराठी में होगा ?गड़बड़ तब थी जब वह वहां उन्हीं की शर्तों पर जाते|वहां जा कर हिंदी में कविता पाठ किया क्षेत्रवाद के ज़हर को इससें करारा तमाचा क्या होगा ?आप देखते है कि कवि ने वहां कविता पाठ क्यों किया मैं देखता हूं जो इंसान भाषा,क्षेत्र के नाम पर ज़हर फैलाता रहा उसी को हिंदी कविता पाठ करवाना पड़ा तो ये उसकी हार हैं|भाषा बनाम भाषा नहीं उस बीमार व्यक्ति की जो चाहता ही क्षेत्रवादी अस्मिता के नाम पर लोगों को बाँटना हैं |

Anurag Chaturvedi थानवी जी@जगदम्बाप्रसाद जी वर्षों तक सामना में कॉलम लिखते थे.मुर्दाघर उपन्यास के बाद उन्होंने सामना से जुड़ना किस लिए पसंद किया यह रहस्य है.

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey छोटे-छोटे तीर हैं, और कुछ नहीं। असल निशाना बोधिसत्त्व हैं, जिन्होंने पहले ऐसी ही टिप्पणी दूसरों पर कर दी थी। अब उन्हें हड़काने के चक्कर में वाजपेयी, विष्णु खरे, व्योमेश शुक्ल, प्रतापराव कदम आदि कई निशाने … उस बहस में एक आलोचक तो सीआइए को भी ले आए!!

Rakesh Achal एक निरर्थक बहस को ज़िंदा रखने से क्या हासिल है महामहिमो

Vimal Chandra Pandey क्षमा करें Om जी लेकिन आप ऐसी निर्णयात्मक टिप्पणियाँ देंगे तो बहस का कोई औचित्य नहीं. मुझे बोधिसत्त्व जी से कोई समस्या नहीं है कि मैं उन्हें निशाना बनाऊँ. मुंबई में जितने भी साहित्यिक कार्यक्रम हम लोगों ने किये, बोधि जी को आमंत्रित किया और वह सहृदयता से अक्सर आये भी. एक लाइन की बात यह है कि एक हिंदी विरोधी मंच पर एक हिंदी के कवि का कविता पढ़ना दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी निंदा की जानी चाहिए कम से कम उन व्यक्तियों द्वारा जो मनसे की उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ की गयी हिंसात्मक कार्यवाहियों को गलत मानते हैं. अब इसके बाद इसे सही ठहराने के लिए कुतर्क तो सैकड़ों दिए जा सकते हैं

Vimal Chandra Pandey Ankit Muttrija: आपकी बात से मैं ज़रूर सहमत होता अगर अशोक जी किसी मराठी के कविता पाठ में जाकर हिंदी की कविता पढ़ आते लेकिन मित्र वह हिंदी का कार्यक्रम था और मनसे के उपाध्यक्ष बाकायदा हिंदी में कवितायेँ लिखते हैं और स्वयं को प्रगतिशील भी कहते हैं जिस तरह राज ठाकरे की लाइब्रेरी में हिंदी की ढेर सारी किताबें दिखाई देती हैं

Vimal Chandra Pandey Madhu Arora जी, कविता को बिना किसी विचार के सिर्फ दिल से निकला भाव बताने वाली परिभाषा के हिसाब से तो नरेन्द्र मोदी की कवितायेँ भी उल्लेखनीय होनी चाहियें, आपको पता ही होगा उन्होंने इधर कुछ कवितायेँ लिखी हैं

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey नरेन्द्र मोदी की कविताएँ कविताएँ ही नहीं हैं, मैंने पढ़ी हैं; अटलबिहारी वाजपेयी की भी ख़राब होती थीं। अच्छी कविता होती तो मुझे उसे अच्छा मानने में कोई गुरेज नहीं होता (फासिस्ट एज़रा पाउंड को महँ कवि मानने से इनकार कौन करता है?)

Vivek Shrivastava Hindi ke lekhak Mohalla sanskarti ko ab tak jeevt rakhe hain…….duniyaa ko gyaan baat te hain par khud tu-tu, main-main se baaz nahi aate……bhai rachnaakaar hain tao rachiye….. par ninda se bacho…

Om Thanvi Anurag Chaturvedi आम आदमी बिना टोपी Vimal Chandra Pandey इस प्रकरण में कवि वागीश सारस्वत, जिनकी राजनीतिक आस्थाओं को घेर कर संस्था 'परचम' और अशोक वाजपेयी तक को लपेट लिया गया, उन Vageesh Saraswat का यह बयान सामने आया है: – "परचम" एक प्रगतिशील सोच की सामाजिक व साहित्यिक संस्था है। श्री जगदम्बा प्रसाद दीक्षित इस संस्था के अध्यक्ष है तथा गोपाल शर्मा इस संस्था के सचिव है। "परचम" से जितने भी लोग जुड़े हैं उन सबका मार्क्सवाद से गहरा संबंध रहा है। इस संस्था ने पूरे सोच-विचार के बाद ही श्री अशोक वाजपेयी के एकल काव्य पाठ का आयोजन किया। … जिनकी विचारधारा में दूसरों को सुनने का संयम भी न हो, वह फ़ासिस्ट होता है। … मेरे साहित्य पर, मेरे विचार पर, मेरे बयान पर, मेरी किसी किताब पर साहित्यिक मित्रों ने उंगली उठाकर यह कहा होता कि वागीश सारस्वत प्रगतिशील नहीं है, तब तो बात समझ में आती। अभी भी समय है। मैं चुनौती देता हूं, मेरे साहित्य को कठघरे में खड़ा करके दिखाएं। अगर मेरी रचना दक्षिणपंथी है, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा। साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होना बंद कर दूंगा। … मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता आप चाहे तो मुझे फासीवादी कहे या साहित्यिक सक्रियता के अपराध में मुझे फांसी पर लटका दें। मैं अपनी प्रगतिशीलता का परचम लहराता रहूंगा। अगर हो सके तो अशोक वाजपेयी के इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर उन्हें कठघरे में खड़ा न करें। अशोक वाजपेयी की कविता पर बात करनी हो तो जरूर की जाय। हम अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील मानते हैं। भले ही धुर वामपंथी उन्हें प्रतिगामी साहित्यकार कहते रहें।"

Rakesh Achal hahahahahaमोदी के बारे में मुझे नहीं पता,लेकिन अटल जी के साथ मैंने कविता सत्संग किया है,वे कम से कम छंद शास्त्र का अनुशरण करना तो जानते हैं ,उनकी कविताओं में एक अर्थ है ,तुकान्त है

Ashutosh Tiwari bilkul pando ka yh pakch fasist h..

Satyawan Daulatpur प्रगतिशीलता न हुई कोई वैदिक ऋचा हो गई जो विजातीयोँ के कान में पड़ जाने से अशुद्ध हो जायेगी !!

Bhuvan Sharma विमल जी यह तो उनका साहस कहिए या फिर हौसला कि वह हिंदी विरोधी मंच पर एक हिंदी की कविता पढ़ आए, इससे हमारी राष्ट्रभाषा का भला ही हुआ, कुछ बुरा हुआ तो बताईए? और रही बात विरोध की तो विरोध के पीछे सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है…. यह आप भी अच्छी तरह से जानते हैं.. और एक कवि जब कभी कविता पाठ करता है तो वह राजनीति नहीं करता बल्कि निष्पक्षतः अपने मन के भावों और विचारों को भाषा के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंचाता है..

Rakesh Achal प्रगतिशीलता न वेदिक ऋचा है न ही छुईमुई ,सो बेफिक्र रहिये ये इतनी जल्दी न अपावन होगी और न ही कुम्हालाएगी,जो इसे लेकर चिंतित हैं वे आराम करें

Bodhi Sattva इन्हीं वागीश सारस्वत के साथ कुछ समयपूर्व एक पूरा बहु दिवसीय सान्निध्य गुजार चुके हैं वे ही लोग। उस बात के खुलासे पर तब कैसे खूंखार हुए थे। यहाँ देखें। http://www.facebook.com/photo.php?fbid=4559871597999&set=a.1540536436507.2070517.1327802261&type=3&theater

Vimal Chandra Pandey Om Thanvi: अगर आप ये मानते हैं कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में हिंसा करता रहा हो और बयान जारी करके कह दे कि मैं गाँधीवादी हूँ तो सारी समस्या खत्म हो जाती है फिर अब क्या कहा जाए.

शरद श्रीवास्तव वागीश सरस्वत जी का साहित्य प्रगतिशील है, पर वह खुद एक दक्षिण पंथी दल के उपाध्यक्ष हैं। क्या ये मुमकिन है की आपकी कविता आपके विचार आपके कर्मों से मेल ना खाते हों

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey निर्णयात्मक टिप्पणी? कौन निर्णयात्मक टिप्पणियां देते हैं, यह आपको पता है; Pankaj Chaturvedi तो वहां यह साफ़ कह भी आए थे, उन्हें पूछिए।

Rakesh Achal लो ,मै तो चला इस मुबाहिसे के बाहर

Bodhi Sattva और यह दूसरा संदर्भ आजकल सात महीने वाले भाई साहब और भैया, यानी महान जनवादी राजेश जोशी जी का है।इसे भी देखें। http://www.facebook.com/photo.php?fbid=4560212686526&set=a.1540536436507.2070517.1327802261&type=1&theater

Vimal Chandra Pandey भुवन जी क्या वोट बैंक, एक गुस्सा है जो हिंदीभाषियों के भीतर है. अशोक बाजपेयी अपने कविता कर्म में शोषितों दलितों और वंचितों के साथ खड़े रहे हैं, उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी

Om Thanvi Bhuvan Sharma हिंदी विरोधी मंच कहना क्या ठीक होगा जब आयोजक भी हिंदी के कवि थे और श्रोता भी!

Rasbihari Pandey जगदम्बा
दीक्षित अशोक वाज्पेयी और उनकी कविताओ को सख्त नापसन्द करते है,वे उस दिन
शहर मे थे भी नही,उन्से आप बात कर सकते है-०९६१९७९८५३८

Bhuvan Sharma Om Thanvi जी बिलकुल नहीं, तब तो यह और भी सौभाग्य की बात है

Rasbihari Pandey Jagdamba Dixit ka mobile no.–09619798538

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey तो भाईजान, इसी तरह, पंडों के बयान पर हम कैसे एतबार कर लें? उनके कहने पर अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे को प्रगतिविरोधी, शमशेर सम्मान के संस्थापक प्रतापराव कदम और ओम थानवी को यह सम्मान दे देने वाले निर्णायकों ज्ञानरंजन, राजेंद्र शर्मा, विष्णु नागर और लीलाधर मंडलोई (उस बहस में उजागर हुए नाम) को विवेकहीन, कमलेश को सीआइए का एजेंट, कुलदीप कुमार को सौदेबाज समीक्षक, बोधिसत्त्व को षड़यंत्रकारी, व्योमेश शुक्ल को लालची मान लें?

Eskay Sharma यदि एक हिन्दी कवि, हिन्दी विरोध के गढ़ मे जाकर कविता पाठ कर आता है तो यह तो गौरव की बात होनी चाहिए….आपकी उपस्थिति वहीं अधिक प्रासंगिक है जहाँ आपका विरोध है….अपने घर मे तो सभी शेर हैं.

Bodhi Sattva फिर नरेश सक्सेना जी को अब तक क्यों छोड़ा हुआ है। प्रतापराव कदम की आलोचना जिन वजहों से हो रही है तो नरेश जी की भी होनी चाहिए। और अनेक शमशेर सम्मान से सम्मानित कवियों लेखकों की भी आलोचना होनी चाहिए। प्रतापराव कदम ने एक शानदार सम्मान की स्थापना की है। उसका एक गौरवशाली इतिहास बन चुका है। कहीं उस इतिहास को अपने गुट तक दबाए-बनाए रखने के लिए यह सब बेचैनी तो नहीं।

Onkareshwar Pandey Mindless allegation… Meaningless discussion…

Bhuvan Sharma विमल जी वोट बैंक कोई गुस्सा नहीं बल्कि यह तो तुच्छ राजनीति करने का साधन है, जिसे हिंदी भाषी कभी नहीं करता बल्कि सियासी गलियारों में बैठे वो नेता करते हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करनी होती है फिर इसके लिए उन्हें भाषा के नाम पर अराजकता ही क्यों न फैलानी पड़े.. यह तो एक सार्वभौमिक सच है.. और रही बात शोषितों, दलितों पर कविता करने की तो यह सामाजिक काम है.. जो काबिल-ए-तारीफ है..

Radheyshyam Singh Yaha to dakshinpanthi aur pagalpanthi me bhed karna hi muskil hai.

Vimal Chandra Pandey Om जी यह तो ज़बरदस्ती बहस को दूसरी दिशा में मोड़ने वाली बात है, आप हिंदीभाषियों का हिंसक विरोध करने वाली मनसे पर कोई बात नहीं कर रहे हैं और अन्य नामों को लाकर इस कविता पाठ को बहुत प्रगतिशील बताने की कवायद कर रहे हैं. आप किसी के किसी बयान पर ऐतबार मत करिये लेकिन जब वागीश जी का यह बयान आप पढ़ रहे थे तो आपके मन में यह नहीं उठा कि अगर उनकी कविता प्रगतिशील है और वह मार्क्सवाद से जुड़ाव महसूस करते हैं तो उस फासीवादी पार्टी से त्यागपत्र उनका कवि क्यों नहीं दे देता ? अगर नहीं उठा तो मैं अब कुछ नहीं कहना चाहता. इसे मेरा अंतिम कमेन्ट समझा जाए, मैंने अपनी बातें कह दी हैं.

Bhuvan Sharma विमल जी सारी बाते एक तरफ और यह बताईए कि क्या कविता विरोध की राजनीति का पर्याय है या फिर बन सकती है???

पंकज कुमार मिश्र ऐसी सोँच तो बिल्कुल अप्रासंगिक है। कवि अपने श्रोताओँ की विचारधारा से अनभिज्ञ होता है,और अपने कविता पाठ से दूसरोँ को प्रभावित करता है। सच तो यह है कि खुद को महिमामंडित करने के लिये लोग कुछ भी कर सकते हैँ।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

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