कमाल खान पर हमले के मामले में यूपी पुलिस का रवैया बेहद नाकारा

अगर कोई सिरफिरा कमाल खान जैसे पत्रकार पर आतंकवादियों का साथ देने की बात कहे तो क्या उसे केवल मूर्ख कह कर ख़ारिज किया जा सकता है? और अगर ऐसा शख्स एनडीटीवी के दफ्तर में घुस कर अभद्रता करने की हिम्मत जुटा ले तो उसका क्या किया जाना चहिये? उत्तर प्रदेश में कमाल खान जैसे पत्रकार पर अपने को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष कहने बाले एक सिरफिरे कमलेश ने जो आरोप लगाये है उसे सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट कह कर ख़ारिज नहीं किया जाना चहिये.

पुलिस का रवैया भी बेहद नाकारा रहा. इसमें पत्रकारों की तरफ से इतना जबरदस्त विरोध किया जाना चहिये जिससे भविष्य में कोई भी सिरफिरा इस तरह की हिम्मत न जुटा सके. हिन्दू महासभा के इस कथित अध्यक्ष को रवीश कुमार के उस कार्यक्रम से आपत्ति थी जो अफजल गुरु की फांसी से सम्बंधित था. इस कार्यक्रम में अफजल के परिजनों ने फ़ासी का विरोध किया था. कमलेश ने इसके विरोध में कमाल खान को धमकाने वाले फ़ोन किये और एसएमएस भेजे. इसकी सूचना पुलिस को दे दी गई बावजूद इसके पुलिस ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जिससे उसका हौसला बढ़ गया और उसने कमाल खान के दफ्तर पर एक दर्जन लोगों के साथ हमला बोल दिया. जब गार्ड ने रोकने की कोशिश की तो उसके साथ भी मारपीट की गई.

इसके बाद पुलिस ने इतनी मामूली धाराओं में गिरफ्तारी की जिससे कल उसको जमानत मिल ही जाएगी. कमाल खान की गिनती लखनऊ के सबसे संजीदा पत्रकारों में होती है. सांप्रदायिक सदभाव को लेकर उनके द्वारा की गई कई रिपोर्ट आज भी लोग याद करते हैं. अगर हिन्दू महासभा या उस जैसे कोई भी सांप्रदायिक संघठन के लोग सोचते है कि वो किसी भी पत्रकार की जुबान पर लगाम लगा सकते हैं तो यह उनकी गलतफहमी है. हम सबको इस घटना का तीखा विरोध करना चहिये.

वरिष्‍ठ पत्रकार संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार.

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