कमा कर तनख्वाह लेने वाले सीईओ की हैसियत से ज्वाइन किया है : विनोद मेहता

हरियाणा के एक छोटे से कस्बे से अपना अखबार चलाने वाले विनोद मेहता बाद में टोटल टीवी के मैनेजिंग एडिटर बने. फिर सीन से गायब होने के बाद इन दिनों समाचार चैनल 'खबरें अभी तक' के सीईओ बनकर प्रकट हुए हैं. वे हरियाणा के जींद में 1997 से समरघोष नाम का अखबार निकालते थे. बाद में विनोद मेहता ने 2001 में चौटाला सरकार के पीआरओ के तौर पर ज्वाइन किया. 

2004 में उन्होंने बतौर मैनेजिंग पार्टनर टोटल टीवी की शुरुआत की. करीब 8 साल टोटल टीवी को चलाने के बाद उन्होंने अपने शेयर बेचकर खुद की फिल्म कंपनी ‘विन मेहता फिल्म्स’ लॉन्च की जिसके बैनर तले इन्होंने अपनी पहली मूवी 'सैकेंड मैरिज डॉट कॉम' भी बनाई.

पाल टेक ग्रुप के चैनल ‘खबरें अभी तक’ की शुरुआत जनवरी में हुई थी और अभी हाल तक यह चैनल हिमाचल, दिल्ली और हरियाणा से संबंधित खबरें दिखा रहा था. लेकिन भारी नुकसान के बाद इसके पुराने संचालकों की छुट्टी कर दी गई थी. इसके नये सीईओ और एडीटर इन चीफ विनोद मेहता बने हैं. इनसे भड़ास4मीडिया की तरफ से धीरज ने जो बातचीत की, पेश है उसके प्रमुख अंश।

धीरज : कुछ दिनों पहले तक 'खबरें अभी तक' भारी घाटे में था, अब अचानक आपकी तनख्वाह का भार कैसे सह पाएगा?

विनोद मेहता : मेरा यह मानना है कि अगर बड़े अधिकारियों की तनख्वाह ज्यादा हो तो कई चैनल उसके बोझ से ही दब जाते हैं। अगर प्रॉफिट आ रहा हो तो उसे शेयर करने में कुछ भार नहीं पड़ता। मैंने यहां प्रयोग के तौर पर कमा कर तनख्वाह लेने वाले सीईओ की हैसियत से ज्वाइन किया है। देखें आगे क्या होता है।

धीरज : 'खबरें अभी तक' का मुख्य फोकस क्या रखने के विचार हैं?

विनोद मेहता: हमने अभी इसे क्षेत्रीय चैनल के तौर पर चलाने का फैसला किया है। पहले हरियाणा को अपने फोकस में रखा है। फिर आगे सोची जाएगी।

धीरज : क्या आपको लगता है कि एक क्षेत्रीय चैनल आपके सपने पूरे कर पाएगा?

विनोद मेहता: कुछ साल पहले तक हरियाणा बाजार नहीं था, लेकिन हाल के वर्षों में ये कॉन्सेप्ट पूरी तरह बदल गया है। आज का हरियाणा एक डेवलपिंग मार्केट है। और जो नए व्यापारी आ रहे हैं उनमें बड़े चैनलों का भार उठाने की क्षमता कम होती है। हमने उन्हीं पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

धीरज : लेकिन क्या ये विज्ञापन चैनल चलाने के खर्चे निकाल पाएंगे?

विनोद मेहता: देखिये, किसी भी रीजनल चैनल की पहली इनकम उसकी कॉस्ट कंट्रोल होती है। हमने सबसे पहले कॉस्ट कंट्रोल पर ध्यान दिया। आज की तारीख में खबरें अभी तक में एक पैसे की भी बर्बादी नहीं हो रही है। हमने सारी फिज़ूल खर्ची रोक दी है।

धीरज : लेकिन इससे कर्मचारियों में असंतोष नहीं फैलेगा? कई लोगों को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा होगा?

विनोद मेहता: नहीं, कॉस्ट कंट्रोल सिर्फ लोगों को नौकरी से निकालना ही नहीं होता। मैंने एक आदमी को भी नौकरी से नहीं निकाला। सबको उनकी क्षमता और योग्यता के मुताबिक री-एडजस्ट किया है। अब किस सॉफ्टवेयर से और किस तकनीक से हमारे खर्चे कम होंगे, हमने इसी पर ध्यान दिया है। उन प्रोग्रामों को भी बंद कर दिया जिनमें किसी की दिलचस्पी नहीं थी।

धीरज : आपने क्राइम का प्रोग्राम भी बंद कर दिया?

विनोद मेहता: मेरा ये मानना है कि क्राइम एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिसके साथ हमेशा नाइंसाफी हुई है। अब अगर आप किसी अपराधी का आतंक फैलाते हैं तो ये उसकी मार्केटिंग ही हो गयी। क्राइम को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने से समाज में गलत संदेश जाता है और अपराधियों की फिरौती के रेट ही बढ़ते हैं।

धीरज : फिर किस तरह के समाचार दिखाएंगे 'खबरें अभी तक' में?

विनोद मेहता: हमने प्राइम फोकस पॉलिटिक्स पर रखने का फैसला किया है। हरियाणा के लोगों के खून में रची-बसी है राजनीति।

धीरज : लेकिन राजनीति तो सिर्फ चुनावों के दौरान ही होती है। और फिर प्रोग्रामिंग कैसे करेंगे?

विनोद मेहता: अभी हम दो नए प्रोग्रामों में जुटे हैं। राज्य में हुडा सरकार को आए तीन साल हो गये हैं। हर विधानसभा क्षेत्र में वहां की जनता से उनके विधायक के काम-काज का हिसाब मांगा जा रहा है। 'ये टिकट ना मिलेगी दोबारा' नाम के इस प्रोग्राम में ये भी पूछा जा रहा है कि अगले चुनाव में उसी विधायक को वोट देंगे या नहीं। एक और प्रोग्राम राजनीति में नये चेहरों को खड़ा करने पर आधारित है। 'जनता मेरी हाई कमान' नाम के इस प्रोग्राम में हम प्रदेश की जनता को वैसे लोगों से परिचित करवाएंगे जो स्वच्छ छवि के हैं, लेकिन उन्हें राजनीति में आगे आने का मौका नहीं मिल पाया है।

धीरज : एडीटोरियल और बिजनेस दोनों के घालमेल पर हाल में खासी कंट्रोवर्सी रही है। आपका क्या मानना है?

विनोद मेहता: देखिये ये कंट्रोवर्सी तो अभी हाल में आयी है और इसमें गलती किसकी है ये भी सोचने का मुद्दा है, लेकिन मेरी राय से एडीटोरियल और मार्केटिंग को एक में मिलाना बिल्कुल गलत है। ऐसा हजारों में एक मामला आता है कि विज्ञापन ने कभी एडीटोरियल पर दबाव डाला हो, और वो भी "अगर हो सके" के लहज़े में, लेकिन अगर संपादक पर ही मार्केटिंग का भार दे दिया जाए और उसे संपादकीय स्वतंत्रता नहीं दी गयी तो उस मीडिया हाउस का भविष्य चौपट होना तय है।

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