कर्मचारियों को निकालने के कई तरीके आजमा रहे अखबार प्रबंधन, पत्रिका ने पासपोर्ट मांगा

एक नई खबर आई है. जैसे-जैसे वेजबोर्ड की देनदारी का समय नजदीक आ रहा है, कुछ अखबारी संस्थान इसका तोड़ ढूंढ़ रहे हैं. उसका सबसे बेहतर तरीका है, कर्मचारियों को किसी भी बहाने से परेशान कर चलता कर देना. कर्मचारी अगर काम में खरा है तो उसे किसी और तकनीकी तरीके से चलता करने का तरीका अखबार के आफिसों में बैठे खटमल किस्म के गैर पत्रकार लोग मालिकों को सुझा रहे हैं. नई दुनिया जैसे सम्मानित संस्थानों ने अपने बाप दादाओं का नाम तो बेच दिया, अब जिसे बेचा है वे लोग कर्मचारियों से वेजबोर्ड की कोई सुविधा नहीं मांगने का एग्रीमेंट साइन करा रहे हैं.

राजस्थान पत्रिका ने भी एक नया फंडा तय किया है. उसने अपने कर्मचारियों के पासपोर्ट की मांग रख दी है. इसकी आखिरी तारीख 31 अगस्त रखी गई है. सभी ग्रेड वाले कर्मचारियों को अपने पासपोर्ट की छायाप्रति एचआर हेड को भेजनी है. अब आखिर सवाल यह है कि पत्रिका अपने कर्मचारियों का पासपोर्ट बनवाकर क्या करेगा. उसे हाल में दूरदराज तबादला किए गए कर्मचारियों को लगेज भाड़ा देने में पसीना आ गया था. कर्मचारियों को साइबर कैफे से खबर भेजने और इंटरनेट का बिल देने में पसीना आ रहा है और तो और उसने दूरदराज बड़े शहरों में तबादला किए कर्मचारियों को इनक्रीमेंट से लेकर सिटी भत्ता तक रोक दिया. पत्रिका में 2009 से कर्मचारियों को डीए तक नहीं दिया गया है.

यह सवाल उन कर्मचारियों के लिए बेहद पेचीदा है, जिस ग्रेड वाले कर्मचारियों का कुछ माह पहले गुवाहाटी, भुवनेश्‍वर, देहरादून, पुणे, मेरठ, शिमला तबादला कर दिया गया. अब वे कर्मचारी होटल और गेस्ट हाउस में रहकर साइबर कैफे से खबर भेज रहे हैं. ऐसे कर्मचारी कैसे अपना पासपोर्ट किसी ढाबे, होटल या गेस्ट हाउस के पते से आवेदन कर सकते हैं. पासपोर्ट प्राधिकरण की पहली शर्त आवेदक का आवासीय पता होना आवश्‍यक है, उसे उस जगह दो लोग अच्छी तरह से जानते हों, जो पुलिस सत्यापन के दौरान उसकी गारंटी ले सकें. अब देखना है इस फंडे में पत्रिका कौन सा खेल खेलना चाहती है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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