कहां गायब हो गई संसद?

छब्बीस  जनवरी का सूरज जब रायसीना हिल्स के पीछे डूब रहा था, तभी एक न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलनी शुरू हुई…..संसद गायब…..सरकार खामोश….दिल्ली पुलिस को कुछ पता नहीं…..सरकार एवं मुख्य विपक्षी दल बीजेपी का प्रतिक्रिया देने से इंकार। एक के बाद एक सारे चैनलों पर इसी तरह की सुर्खियाँ छा गईँ। पूरे देश में हंगामा मच गया।

ख़बर सनसनीखेज़ थी। कुछ ही दिन पहले यमुना पर बने एक पुल के चोरी होने के बाद से राजधानी वैसे ही सन्न थी। ये दूसरी बड़ी घटना थी जिसमें कोई विशाल सरकारी संपत्ति इस तरह से गायब हुई थी। पहले तो उन्हें लगा कि न्यूज़ चैनल आदतन दर्शकों को मूर्ख बनाकर टीआरपी हासिल करने के लिए चमत्कार वगैरा की कहानी दिखा रहे होंगे। लेकिन जब सारे चैनलों पर यही ख़बर छा गई तो लोग स्तब्ध रह गए।

सभी चैनलों के रिपोर्टर ओबी वैन के साथ वहाँ पहुँच गए जहाँ कभी संसद हुआ करती थी और दनादन लाइव देने लगे। कैमरा पैन करके दिखाने लगे कि जहां अब सफ़ाचट मैदान दिख रहा है, वहीं पहले संसद हुआ करती थी। संसद के इतिहास वर्तमान के बारे में ज्ञान दे रहे थे और कयास लगा रहे थे कि ये ज़रूर पाकिस्तान की हरकत होगी, क्योंकि वह पहले भी अपने आतंकवादियों से संसद उड़ाने की कोशिश करवा चुका है।

शोर मचने लगा तो लोग मंत्रियों  और नेताओं को घेरने लगे। आख़िरकार वित्त मंत्री ने देर रात ऐलान किया कि वे कल संसद में इस बाबत बयान देंगे। चैनल पर बैठे चर्चाकार अटकलें लगाने में जुट गए कि आख़िरकार वित्तमंत्री क्या जवाब दे सकते हैं और जब संसद ही नदारद है तो वे बयान देंगे कहाँ? कुछ वीरता पुरस्कार प्राप्त मेहमानों ने युद्धघोष के अंदाज़ में कहा कि ये समय बयान देने का नहीं कार्रवाई करने का है। पाकिस्तान को बता देने का है कि हम अपने लोकतंत्र पर किसी तरह का हमला बर्दाश्त नहीं करेंगे और हर हाल में अपनी संसद लेकर रहेंगे।

पूरा देश बेसब्री से अगले दिन का इंतज़ार करने लगा। चैनलों ने मल्टी कैम सेटअप लगा दिए और अपने सारे रिपोर्टर को इस घटना के कवरेज के लिए तैनात कर दिया।

सुबह सात बजे से ही आसपास संसदस्थल पर गतिविधियाँ शुरू हुईं। टैंट वालों ने वहाँ कुर्सियाँ बिछानी शुरू कर दीं। एक घंटे बाद वहाँ सांसदों जुटने लगे। दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की कार्रवाई ठीक ग्यारह बजे शुरू हुई। वित्तमंत्री ने लिखा हुआ भाषण पढ़ना शुरू किया- माननीय अध्यक्ष महोदया, आप तो जानती ही हैं कि देश गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। हमारा वित्तीय घाटा बहुत बढ़ गया है, विकास दर काफी नीचे आ गई है। मुद्रास्फीति की दर दो अंकों में पहुँच गई है। लिहाज़ा अर्थव्यवस्था को नियंत्रण में लाने के लिए बड़े आर्थिक सुधार की ज़रूरत थी। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने संसद का डिस्इनवेस्टमेंट यानी विनिवेश कर दिया है। हमने भारत की प्रभुसत्ता को ध्यान में रखते हुए विदेशी कंपनियों को केवल उन्चास फ़ीसदी शेयर बेचे हैं। बाक़ी के इक्यावन फ़ीसदी भारतीय कंपनियों ने खरीदे हैं।

वित्तमंत्री इतना ही बोल पाए थे कि कम्युनिस्ट पार्टी के एक नेता ने रौद्र रूप दिखाते हुए कहा कि सरकार का ये फैसला अलोकतांत्रिक है, उसने विपक्षी दलों से इस बारे में सलाह-मशवरा नहीं किया है। हमें विश्वास में नहीं लिया गया।

इसका जवाब वाणिज्य मंत्री ने दिया-सरकार  हमेशा लोकतंत्र का सम्मान करती आई है इसलिए आपका ये आरोप निराधार है। अव्वल  तो हमारी चुनी हुई सरकार  है और इस नाते देश हित में  फैसला लेने का हमें लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त है। दूसरे, हमने मुख्य विपक्षी दल से न केवल सलाह मशवरा किया बल्कि उसके सहयोगी दलों तक से सहमति प्राप्त करने के बाद विनिवेश किया है। रही बात आपको विश्वास में लेने की तो आप लोगों का तो स्वयं ही लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, आप तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को उलटकर साम्यवाद लाना चाहते हैं इसलिए आपसे चर्चा करने का भी कोई फ़ायदा नहीं था।

शोर-शराबे  के बीच प्रधानमंत्री ने कहा-अध्यक्ष  महोदया, इस विनिवेश से हमें अच्छी-खासी धनराशि प्राप्त  हुई है और हमें लगता है कि हमारा देश आर्थिक संकट से उबर जाएगा। मैं आपके माध्यम से सदन को बताना  चाहता हूँ कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने मुझे इस क्रांतिकारी कदम के लिए बधाई दी है। यही नहीं, विश्व बैंक और मुद्रा कोष ने यहाँ तक कहा है कि सरकार द्वारा किए जा रहे आर्थिक सुधारों से वे खुश हैं और भारत को अतिरिक्त कर्ज़ देने की व्यवस्था करेंगे। उनके इस बयान पर तालियाँ बजने लगीं।

एक कम्युनिस्ट सांसद ने गुस्से में आकर वित्तमंत्री के हाथों से परचा छीन लिया। कैमरा उसकी तरफ घूमा तो परचे में यूनाईटेड स्टेट ऑफ अमेरिका की मुहर की झलक दिखलाई पड़ी।  इस बीच मार्शल आ गए और उसे पकड़ कर ले गए। दूसरे नाराज़ कम्युनिस्ट नेता भी उठकर वहाँ  से चले गए। वातावरण फिर से शांतिपूर्ण और उल्लासमय हो गया।

थोड़ी ही देर में ख़बर आई कि मुंबई  का संवेदी शेयर सूचकांक तीस  हज़ार की मनोवैज्ञानिक सीमा लाँघ गया है। मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस के शेयरों के दाम सबसे ज़्यादा चढ़े, क्योंकि सबसे ज़्यादा शेयर उसी ने खरीदे थे। कार्पोरेट जगत और मध्यवर्ग टैक्सों में रियायत और ब्याज़ दरों में कमी की उम्मीद से हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा।

पाकिस्तान से ख़बर आई कि उसने वाशिंगटन से भेदभाव की शिकायत की है और माँग की है कि उसे भी भारत की ही तरह संसद के विनिवेश का पैकेज मिलना चाहिए। ओबामा ने फोन करके उसे आश्वस्त किया है कि वह आतंकवाद ख़त्म करने में यदि अमेरिका के निर्देशों को आँख मूँदकर मानता रहे तो उसे सेना आदि के विनिवेश का अतिरिक्त फ़ायदा भी दिय़ा जाएगा।

लाल-पीले न्यूज़ चैनलों में सरकार  के इस क्रांतिकारी क़दम की आशा एवं उत्साह से भरी  व्याख्याएं शुरू हो गई। वीर  पुरूष अब संसद वापस लेने के बजाय दलील दे रहे थे कि पाकिस्तान  को भारत की तरह लाभ हरगिज  नहीं मिलना चाहिए।

अगले दिन गुलाबी और रंग-बिरंगे अख़बारों में सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा पसरी हुई थी।

उपरोक्त व्यंग्य के सृजक मुकेश कुमार  हैं जो वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रहे हैं.

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