कहां से मिलता है कश्मीरी अखबारों को धन?

जम्मू-कश्मीर पर केन्द्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों ने राज्य में चल रहे अखबारों के वित्तपोषण का स्रोत पता लगाने के लिए उचित नियामक संस्था से जांच कराने का सुझाव दिया है। वार्ताकारों की रपट सार्वजनिक की गई, उन्होंने कहा कि अखबारों के वित्तपोषण का स्रोत पता करने के लिए भारतीय प्रेस परिषद अकेले यदि कार्रवाई करे तो मुद्दे का समाधान निकल सकता है। रपट में प्रकाशकों और सरकार के आरोपों पर विचार करने के लिए प्रेस परिषद या एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं को शामिल करने की सिफारिश की गई है। प्रकाशकों का आरोप होता है कि जो लोग सरकार के मन माफिक काम नहीं करते, उन्हें विज्ञापन नहीं दिए जाते। दूसरी ओर सरकार आरोप लगाती है कि कुछ अखबार आधी अधूरी खबरें देते हैं।

इसमें कहा गया कि प्रकाशन अपने प्रसार के आंकडे़ बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। वार्ताकारों ने इस संबंध में ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन से पाठकों का सर्वे कराने की सिफारिश की है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र ने पत्रकार दिलीप पडगांवकर, शिक्षाविद राधा कुमार और पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी को वार्ताकार नियुक्त किया था, जिन्होंने अपनी 176 पृष्ठ की रपट पिछले साल केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को सौंपी थी। वार्ताकारों ने राज्य में कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों द्वारा राजनीतिक खेल के लिए घटनाएं गढ़ने के रवैये की आलोचना करते हुए सुझाव दिया है कि ऐसे पत्रकारों की रिपोर्टिंग एवं लेखन कौशल को पैना करने का अल्पकालिक प्रशिक्षण चलाना चाहिए।

रपट में कहा गया है कि मीडिया की भूमिका भी काफी पेचीदा रही है। कुछ एंकरों और रिपोर्टरों को छोड़कर राष्ट्रीय मीडिया ने संघर्ष वाले इलाकों को ज्यादा तरजीह नहीं दी और उसका ध्यान हिंसा या प्रत्यारोपों पर केन्द्रित होता दिखा। स्थानीय मीडिया ने शांति प्रक्रिया से जुडे़ घटनाक्रम पर ज्यादा ध्यान दिया, लेकिन संघर्ष के हालात में जैसा अकसर होता है, उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो रिपोर्टिंग में चुनिंदा रुख अपनाते हैं और किसी न किसी राजनीतिक स्थिति के पक्ष में भेदभाव करते हैं।

इसमें कुछ पत्रकारों की भूमिका में खामियां गिनाई गई हैं, जिन्होंने अपनी खबर के लिए बयान गढे़ और जिसका नतीजा शांतिकारों की राह में बाधा के रूप में देखने को मिला। राज्य में पत्रकारों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए रपट में कहा गया कि इन कुछ पत्रकारों के लिए पत्रकारिता सच्चाई को सामने लाने की बजाय राजनीतिक खेल लगती है। रपट में सुझाव दिया गया है कि राज्य के अखबारों के संपादकों को भारतीय एडिटर्स गिल्ड और अन्य राष्ट्रीय एवं दक्षिण एशियाई पेशेवर संस्थाओं की गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। (एजेंसी)

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