कहीं मेमोरी लॉस के शिकार तो नहीं हो गए हैं मुंबई वाले आरएन सिंह!

मुंबई और पुणे (कथित तौर पर) से प्रकाशित ‘हमारा महानगर’ ने एक बार फिर अपने पंख फडफ़ड़ाए हैं। ज्योतिषीय गणना में अथाह विश्वास रखने वाले अखबार के स्थानीय संपादक (ज्योतिष शास्त्र में विश्वास के सिवा उन्हें कुछ नहीं आता… न अखबारी भाषा, न लेआउट और न ही खबरों की समझ… हां चाटुकारिता में वह परम निपुण हैं) द्वारा ज्योतिषियों की राय के अनुसार 11 जुलाई को नाशिक से अखबार की (कथित तौर पर) शुरुआत महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री छगन भुजलब ने किया। अखबार के 11 जुलाई के अंक में पाठकों के नाम संरक्षक आरएन सिंह के संदेश को कायदे से संपादक की ओर से छपना चाहिए था। संपादक की अनुपस्थिति यह जिम्मेदारी स्थानीय संपादक को निभानी चाहिए थी लेकिन उन्हें लिखना आए तब न!

अपने संदेश में संरक्षक महोदय कहते हैं, ‘‘उत्तर भारत में महानगर की उपस्थिति के बाद हम गुजरात, दिल्ली और उत्तर प्रदेश का रुख करेंगे, परंतु शनै: शनै:।’’ इस पंक्ति को पढ़ते समय माननीय संरक्षक महोदय की यादाश्त पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगता है, क्योंकि दिल्ली से सितंबर 2009 में अखबार को लांच किया गया था। उस समय अखबार के नोएडा और करोलबाग स्थित दफ्तरों के उ्दघाटन के अवसर पर संरक्षक महोदय ने लंबी-चौड़ी हांकी थी और अपने स्टाफ को ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ दिखाए थे। लेकिन 31 जनवरी 2011 को संरक्षक महोदय ने अपनी ‘आर्थिक औकात’ बताते हुए बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक अखबार का प्रकाशन एक फरवरी से बंद कर दिया। दिल्ली में अखबार को जमाने वाले स्थानीय संपादक को तत्काल मुंबई रिपोर्ट करने को कहा गया और दिल्ली के दफ्तर के कर्मचारियों का वेतन हजम करके उन्होंने डकार भी नहीं ली।

इस रिपोर्ट की शुरुआत में ‘महानगर’ के पुणे और नाशिक संस्करणों के लिए ‘कथित’ और ‘तथाकथित’ शब्दों का प्रयोग किया गया है। तो स्पष्टीकरण… पुणे स्थित ‘हमारा महानगर’ का कार्यालय संरक्षक महोदय के मूल व्यवसाय सिक्यूरिटी के दफ्तर में विराजमान हैं, जहां एक पत्रकार अपनी मर्जी के मुताबिक अपनी सेवाएं देता है। पूरा अखबार मुंबई से छपकर जाता है, जिसमें स्थानीय पुणे पन्ने पर पुणे के अलावा पूरे महाराष्ट्र की खबरें आधुनिक संवाददाता ‘इंटरनेट’ के सौजन्य से छपती है।

यही हालत नाशिक संस्करण का है। अब सवाल यह उठता है कि ‘हमारा महानगर’ पाठकों के बीच अपनी उपस्थिति का ढिंढोरा क्यों पीट रहा है… तो हकीकत यह है कि वह ढिंढोरा नहीं, बल्कि पाठकों और विज्ञापनदाताओं की आंखों में धूल झोंक रहा है। यह सारा खेल डीजीपीआईआर और डीएवीपी के विज्ञापनों का है। वैसे भी प्रसार संख्या में आंकड़ों की बाजीगरी में ‘हमारा महानगर’ को महारथ हासिल है। मुंबई में भी उनकी जमीन बहुत तेजी से खिसक रही है। टोटल 12 पेज इंपोर्टेड कागज पर जबसे ‘दक्षिण मुंबई’ बाजार में आया है इसका प्रत्यक्ष असर ‘हमारा महानगर’ की प्रसार संख्या पर पड़ रहा है। यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस कार्यकारी संपादक ने ‘हमारा महानगर’ को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाया था, वहीं कार्यकारी संपादक महानगर प्रबंधन को कानूनी पटखनी देकर ‘दक्षिण मुंबई’ का कार्यकारी संपादक उन्हें चुनौती दे रहा है।

मुंबई से एक पत्रकार द्वारा भेजी गई सूचना पर आधारित

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