कांग्रेस के तीर-तुक्के : सरकार बनाने के लिए केजरीवाल पर बढ़ा दिया चौतरफा दबाव

चुनावी राजनीति के इतिहास में यहां इन दिनों एक नए किस्म का राजनीतिक प्रयोग शुरू किया गया है। कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी धुर विरोधी आम आदमी पार्टी (आप) पर चौतरफा दबाव बढ़ाया है कि वह किसी तरह से दिल्ली में अपनी सरकार गठित करने के लिए तैयार हो जाए।

विधानसभा के चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस की सबसे ज्यादा पिटाई की है। इस पार्टी को महज 8 सीटों में जीत मिली है। जबकि, नवोदित ‘आप’ को 28 सीटों में ऐतिहासिक जीत हासिल हुई है। यद्यपि यहां पर 31 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। लेकिन, किसी पार्टी को अकेले बहुमत लायक सीटें नहीं मिलीं। कांग्रेस ने अपने खास रणनीतिक दांव के चलते ‘आप’ को बगैर मांगे बिना शर्त के समर्थन दे दिया है। इसके बावजूद यह पार्टी सरकार बनाने में हिचक रही है। इस स्थिति को लेकर कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल पर तरह-तरह से दबाव बढ़ाया है। यह प्रचारित किया जा रहा है कि वे डर की वजह से सरकार बनाने से भाग रहे हैं।

दिलचस्प मामला यह है कि भाजपा का नेतृत्व भी इस इंतजार में है कि केजरीवाल, कांग्रेस के साथ मिलकर किसी तरह सरकार बना लें। शुरुआती दौर में भाजपा के नेता केजरीवाल से अनुरोध कर रहे थे कि उन्हें सरकार जरूर बना लेनी चाहिए। क्योंकि, उन्हें कांग्रेस का समर्थन बगैर शर्तों के मिल रहा है। जबकि, उनकी पार्टी को कहीं से कोई समर्थन नहीं दे सकता, इसीलिए उन्होंने पहले ही उपराज्यपाल से कह दिया है कि वे सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं। 18 दिसंबर तक दिल्ली में नई सरकार का गठन हो जाना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। उपराज्यपाल नजीब जंग ने भाजपा के बाद ‘आप’ नेतृत्व को सरकार बनाने का न्यौता दिया था। राजभवन में केजरीवाल के नेतृत्व में ‘आप’ के नेता पहुंचे थे। इन लोगों ने सरकार बनाने के लिए 10 दिन का समय मांगा था। यह अवधि सोमवार को पूरी हो रही है।

‘आप’ के नेता कुमार विश्वास कह रहे हैं कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि कांग्रेस के नेता अपनी राजनीति का कंटीला जाल फैलाने में लगे हैं। ताकि, वे किसी न किसी तरीके से ‘आप’ नेतृत्व को बदनाम कर सकें। इसी मकसद से ये लोग ज्यादा उत्साहित हैं कि दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बन जाए। लेकिन, हम लोगों ने भी जमीनी राजनीति से चंद दिन में ही बहुत कुछ सीख लिया है। ऐसे में, कांग्रेस के नेता ज्यादा चालाक बनने की कोशिश न करें। यह बात अच्छी तरह समझ लें कि वे लोग सीधे-सच्चे जरूर हैं, लेकिन मूर्ख नहीं हैं। कांग्रेस की नीयत अच्छी तरह से आम जनता भी समझ रही है। ऐसे में, सरकार बनाने का फैसला सोच-समझकर ही किया जाएगा। फैसला इस तरह लेंगे कि कांग्रेस वाले कोई चालबाजी करें, तो उनका असली चेहरा जनता के बीच खुद सामने आ जाए।

टीम केजरीवाल ने भी इस पूरे मामले पर चालाक राजनीतिक दांव चलने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने मंगलवार को ही दिल्ली की जनता से राय-शुमारी करानी शुरू कर दी कि कांग्रेस के समर्थन से ‘आप’ को सरकार बनानी चाहिए या नहीं? जनता की राय जानने के लिए 25 लाख चिट्ठियां छपवाई गई हैं, इनका वितरण गुरुवार से पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पूरी दिल्ली में करना शुरू कर दिया है। इसके पहले ही आनलाइन, आफलाइन वेबसाइट, एसएमएस व फोन के जरिए लोगों की राय मांगी जा रही है। दावा किया जा रहा है कि करीब 5 लाख लोगों ने अपनी राय भेज भी दी है। विधानसभा की सभी 70 सीटों में कार्यकर्ता घर-घर संपर्क करके राय-शुमारी कर रहे हैं। यह अभियान रविवार तक पूरा किया जाना है। इसी के बाद   नेतृत्व फैसला करेगा और अगले दिन उपराज्यपाल को बताएगा। यह तो पार्टी का घोषित एजेंडा है।

लेकिन, अंदर-अंदर कई राजनीतिक दांव-पेच चले और परखे जा रहे हैं। ‘आप’ के एक चर्चित नेता ने अनौपचारिक बातचीत में ‘डीएलए’ से कहा कि कांग्रेस वाले हमारी सरकार बनवाकर हमें उलझाना चाहते हैं। ताकि, लोकसभा के चुनाव में हम लोग कांग्रेस के सामने कोई बड़ी चुनौती न बन सकें। ये लोग यह बात नहीं समझ पा रहे हैं कि छल-फरेब के राजनीतिक हथकंडों से अब आम आदमी को बहकाया नहीं जा सकता। इसीलिए उन लोगों ने इस फैसले में पूरी दिल्ली को एक बार फिर सहभागी बना लिया है। जो फैसला जनता करेगी, उसी हिसाब से नेतृत्व निर्णय लेगा। दबाव की रणनीति के तहत यह प्रचारित किया गया था कि गुरुवार को राष्ट्रपति शासन लगाने के बारे में कैबिनेट अपनी मंजूरी दे सकता है। लेकिन, ऐन वक्त पर केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने यही कह दिया कि सरकार इस इंतजार में है कि ‘आप’ यहां सरकार कब तक बनाने की स्थिति में है? शिंदे ने उपराज्यपाल से इस आशय की जानकारी भी मांगी है। जाहिर है कि इस प्रक्रिया के बहाने केंद्र सरकार थोड़ी रस्सी ढीली कर रही है। ताकि केजरीवाल, सरकार बनाने का मन बना लें।

इस बीच मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इस मामले में बहस तेज करा दी है। यह सवाल किया जा रहा है कि केजरीवाल कहीं सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भाग तो नहीं रहे हैं? ‘आप’ नेतृत्व के सामने भी सरकार के सवाल पर दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है। क्योंकि, जो लोग विधायक चुने गए हैं, उन्होंने भी नेतृत्व पर दबाव बढ़ाया है कि मौका मिल रहा है, तो सरकार गठित कर ली जाए। लेकिन, केजरीवाल के सामने चुनौती है कि वे जिस तरह से लोक लुभावन वायदों को लेकर जीते हैं, उन्हें अल्पमत वाली सरकार कैसे पूरा कर सकती है? खतरा यह भी है कि बाहर से समर्थन देने वाली कांग्रेस ऐसा कोई मौका नहीं चूकेगी कि वह सरकार की फजीहत न कराए। भाजपा नेतृत्व के निशाने पर भी टीम केजरीवाल है।

सरकार गठन के पहले ही भाजपा नेता डॉ. हर्षवर्धन ने ‘आप’ के खिलाफ राजनीतिक प्रहार तेज कर दिए हैं। उन्होंने 14 सवाल ‘आप’ से पूछ लिए हैं। एक बार फिर इस पार्टी ने ‘आप’ को कांग्रेस की ‘बी’ टीम करार किया है। इस पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो नाराजगी में तमाम तीखी टिप्णियां ही कर दी हैं। उन्होंने कह दिया है कि ‘आप’ वालों की विचारधारा हिंसक नक्सलियों वाली है। जम्मू-कश्मीर के मामले में भी इनके लोग अलगाववादी ताकतों के साथ खड़े नजर आते हैं। इस तरह से इनकी देशभक्ति भी संदेह के घेरे में मानी जा सकती है। भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने तो ‘आप’ के नेतृत्व की ईमानदारी पर भी सवाल खड़ा किया है। यही कहा है कि यदि ये लोग खांटी ईमानदार और राष्ट्रभक्त होते, तो भला गांधीवादी अन्ना हजारे इनसे दूर क्यों हो जाते?

‘आप’ को दिल्ली की जनता से अब तक जो राय मिली है, उसके बारे में आधिकारिक रूप से यह जानकारी नहीं मिल पाई कि लोगों ने क्या-क्या सुझाव दिए हैं? सूत्रों के अनुसार, राय देने वाले करीब तीन-चौथाई लोगों ने ‘आप’ नेतृत्व को सरकार बनाने की चुनौती स्वीकार करने की सलाह दी है। कुछ ने तो यहां तक कहा है कि वे डंके की चोट पर सरकार बनाएं। सबसे पहले शीला दीक्षित सरकार के कार्यकाल में हुए घोटालों की जांच कराएं। इसी के साथ दिल्ली नगर निगम के तमाम घपलों की जांच करा दें। ताकि, भाजपा का भी असली चेहरा सामने आए। उल्लेखनीय है कि नगर निगम में सालों से यहां भाजपा सत्तारूढ़ रही है। केजरीवाल ने मीडिया से कल खुलकर कह भी दिया है कि उनकी सरकार बनती है, तो वे नगर निगम और शीला सरकार के पूरे कार्यकाल में हुए घपलों की जांच कराएंगे। वे इस मामले में हर जोखिम लेने को तैयार रहेंगे।

दरअसल, यहां कांग्रेस की सरकार लगातार 15 साल तक रही है। लेकिन, इस बार चुनाव में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी अपनी सीट नहीं बचा पाईं। उन्हें केजरीवाल ने भारी मतों से हराया है। हार की हताशा से उबारने के लिए अब कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने कमर कसी है। इसी के तहत कल जेपी अग्रवाल की जगह अरविंदर सिंह लवली को नया अध्यक्ष बना दिया गया है। जबकि, चर्चा शीला दीक्षित को यह जिम्मेदारी देने की चल रही थी। ‘आप’ ने चुनावी राजनीति का प्रयोग दिल्ली से ही शुरू किया है। पहले सफल प्रयोग के बाद ‘आप’ ने ऐलान कर दिया है कि लोकसभा में वे लोग दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस और भाजपा को बड़ी चुनौती देंगे। दिल्ली में 7 संसदीय सीटें हैं। कांग्रेस का नेतृत्व इन सीटों के लिए खास तौर पर चिंतित माना जा रहा है। क्योंकि, मौजूदा हालात में कांग्रेस के लिए एक भी सीट एकदम सुरक्षित नहीं लगती। जबकि, पिछले चुनावों ने कांग्रेस ने यहां सभी सीटों पर कब्जा कर लिया था।

कांग्रेस के साथ भाजपा नेतृत्व को भी ‘आप’ अपने लिए एक बड़ा राजनीतिक रोड़ा लगने लगा है। ऐसे में, यह पार्टी भी हर तरह से ‘आप’ नेतृत्व को उलझाने के दांव चलने लगी है। भाजपा के रणनीतिकारों को यह भी आशंका होने लगी है कि कहीं ‘आप’ का अभियान लोकसभा के चुनावों में उसके तमाम मंसूबों पर पानी न फेर दे। क्योंकि, दिल्ली के अलावा उत्तर भारत के कई शहरों में ‘आप’ के कार्यकर्ता तेजी   से सक्रिय हो रहे हैं। इन लोगों ने कांग्रेस के साथ भाजपा की भी जमकर खिलाफत शुरू की है। इनकी राजनीतिक लाइन यही है कि कांग्रेस और भाजपा सांपनाथ और नागनाथ जैसे हैं। ऐसे में, दोनों से खतरा बराबर का है। इस मामले में कांग्रेस के रणनीतिकार थोड़ा होशियारी दिखाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। राहुल गांधी अपने सहयोगियों से कह रहे हैं कि जिस तरह से ‘आप’ ने जमीनी स्तर पर लोगों से सीधा संवाद कायम किया है, उसी तर्ज पर कांग्रेस भी राजनीति करे, तो ही चुनावी वैतरणी को पार किया जा सकता है।

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस कोशिश में है कि केजरीवाल, सरकार बनाने का मन बना लें। खबरें तो इस आशय की भी आ रही हैं कि नेतृत्व ने दिल्ली के अपने कार्यकर्ताओं को इशारा कर दिया है कि वे राय-शुमारी के दौरान ‘आप’ नेतृत्व से एक नागरिक की हैसियत से यह कहें कि वे लोग सरकार जरूर बनाएं, जिम्मेदारी से भागे नहीं। कनॉट प्लेस स्थित ‘आप’ के केंद्रीय कार्यालय में भी लगातार इस आशय की जानकारियां आ रही हैं कि संघ परिवार के घटकों ने भी अपने लोगों से कह दिया है कि इस आशय के एसएमएस भेजे कि केजरीवाल को सरकार बनानी चाहिए। इस संदर्भ में केजरीवाल ने यही कहा है कि उन्हें अच्छी तरह से पता है कि भाजपा और कांग्रेस के नेता उनकी सरकार बनवाने में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं? लेकिन, जनता के बहुमत ने सरकार बनाने की राय दी, तो वे पीछे नहीं हटने वाले। इसके बाद जो कुछ होगा, वह भी भारतीय राजनीति में एकदम नया प्रयोग होगा। बस, इंतजार कर लीजिए। केजरीवाल, मंद मुस्कान के साथ बड़े आत्मविश्वास से यह टिप्पणी करते हुए अपने कार्यकर्ता के कंधे पर हाथ रखकर कुछ बात करने में रम जाते हैं। भले, यह प्रचारित किया जा रहा हो कि केजरीवाल सरकार बनाने के मुद्दे को लेकर बहुत तनाव में हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत तो यह है कि कल भी वे अपने साथियों के साथ मुस्कराते चने-मुरमुरे खाते दिखाई पड़े। एकदम, रोजमर्रा की तरह।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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