कांग्रेस को ‘अपने’ ही ठेंगा दिखाने पर उतारू

कांग्रेस के रणनीतिकार गठबंधन राजनीति को लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा पर तीखे कटाक्ष करते रहते हैं। अक्सर, सवाल किया जाता है कि आखिर भाजपा नेतृत्व अपने गठबंधन के लिए ‘नए किरदार’ लाएगा कहां से? क्योंकि, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एनडीए के पास दो दर्जन घटकों का जमावड़ा था। लेकिन, अब सहयोगी दलों का टोटा हो गया है। जदयू के अलग हो जाने के बाद कोई और बड़ा दल एनडीए में जुड़ने का इच्छुक नहीं है। खास तौर पर नरेंद्र मोदी की विवादित छवि के कारण एनडीए के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हैं। जबकि, कांग्रेस अपने नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन पर इतराती रहा है। लेकिन, इधर उसके कई सहयोगी दलों ने भी ‘झटका’ देना शुरू कर दिया है। इससे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में खासी बेचैनी बढ़ी है।

ताजा मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का है। पिछले महीनों में कई बार इस पार्टी के दिग्गज नेता अपनी नाराजगी के तेवर दिखा चुके हैं। इन तेवरों से कई बार कांग्रेस को खासी किरकिरी का सामना करना पड़Þा है। इस पार्टी के प्रमुख शरद पवार एक जमाने में कांग्रेस के ही उस्ताद खिलाड़ी होते थे। अब उन्होंने अपनी पार्टी एनसीपी के जरिए दबाव की राजनीति का खेल तेज कर दिया है। पवार के खास सिपहसालार एवं केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी है, जिससे कि राजनीतिक हल्कों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पिछले दिनों एक टीवी चैनल को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक चर्चित इंटरव्यू दिया। इसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों के मामले में नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

जबकि, एक सच्चाई यह भी है कि किसी अदालत ने दंगों के मामले में मोदी को कसूरवार नहीं ठहराया। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायलय की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) सालों तक पड़ताल करता रहा है। लेकिन, इसने भी मोदी को क्लीनचिट दी है। कई और मामलों में भी वे कानूनी लपेट में नहीं आए। फिर भी, राहुल गांधी उन्हें दोषी करार करते हैं। इसको लेकर मीडिया और राजनीतिक हल्कों में खासी बहस भी शुरू हुई है। जब इस प्रकरण में एनसीपी नेता पटेल से सवाल किया गया, तो उन्होंने कह दिया कि जब किसी अदालत ने मोदी को दोषी नहीं माना, तो मोदी को लेकर स्यापा करने की ज्यादा जरूरत नहीं है। उनकी यह टिप्पणी मोदी के प्रति खासी नरमी वाली मानी जा रही है। कांग्रेस के नेता भी अंदर खाने इस टिप्पणी के अलग-अलग निहितार्थ निकाल रहे हैं। कुछ को लगता है कि इस तरह के पैंतरों से एनसीपी लोकसभा में कांग्रेस से ज्यादा सीटें लेने की जुगत भिड़ा रही है। लेकिन, कुछ को लगता है कि मौका देखकर शरद पवार दूसरे पाले से भी हाथ मिला सकते हैं।

हालांकि, गुरुवार को शरद पवार ने मीडिया से कहा है कि उनकी पार्टी के बारे में कुछ बेबुनियाद बातें की जा रही हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी ने दंगों के मामले में मोदी को कभी क्लीनचिट नहीं दी। उनकी पार्टी धर्म-निरपेक्षता में पक्का विश्वास करती है। ऐसे में, उन्हें इस तरह की अफवाहों से दुख पहुंचता है कि एनसीपी, एनडीए गठबंधन से भी हाथ मिला सकती है। जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। वे इतना जरूर मानते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही फैसला करती है। यदि मोदी के पक्ष में जनादेश आता है, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? उन्होंने यही सफाई दी है कि उनकी पार्टी यूपीए का हिस्सा है। वे उम्मीद करते हैं कि इसी गठबंधन में बात बन जाएगी। उल्लेखनीय है कि लोकसभा में एनसीपी के पास 9 सदस्य हैं। जबकि, राज्यसभा में उसके 6 सांसद हैं। कांग्रेस के हल्कों में चर्चा यही है कि मोदी के प्रति नरम रुख का संकेत देकर यह पार्टी सीटों के लिए अभी से सौदेबाजी के दांव चला रही है।

उल्लेखनीय है कि यूपीए गठबंधन से पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस अलग हुई थी। इसके बाद एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक ने यूपीए से नाता तोड़ा था। सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद भी कांग्रेस और द्रमुक के बीच राजनीतिक रिश्तों की डोर जुड़ी रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकार द्रमुक से गठबंधन बनाने के इच्छुक हैं। लेकिन, इस मुद्दे पर करुणानिधि खासी दुविधा में माने जा रहे हैं।   इसकी एक खास वजह 2जी स्पेक्ट्रम मामले का झमेला है। इस घोटाले में द्रमुक नेताओं की काफी किरकिरी हुई थी। यहां तक कि करुणानिधि की सांसद बेटी कानिमोझी को महीनों तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा। अभी भी यह मामला अदालत में लंबित है। घोटाले की किरकिरी के चलते द्रमुक, जयललिता के मुकाबले में लगातार कमजोर होती दिख रही है। इन दिनों वैसे भी करुणानिधि अपने कुनबे में चल रही रार के पचड़े में फंसे हैं। इन कारणों से भी लोकसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक की स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही है।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के निजी रिश्ते नरेंद्र मोदी से काफी अच्छे माने जाते हैं। अन्नाद्रमुक की राजनीतिक लाइन भी भाजपा की हिंदुत्ववादी लाइन के काफी करीब समझी जाती है। आकलन है कि तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, तो जयललिता की राजनीति सब पर भारी पड़ेगी। अन्नाद्रमुक के बारे में कयास यही है कि वह सत्ता मिलने की स्थिति में टीम मोदी से आराम से हाथ मिला सकती है। तृणमूल नेता ममता बनर्जी ने कह दिया है कि वे पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लडेÞंगी। भाजपा, सीपीएम व कांग्रेस के खिलाफ उनकी पार्टी मजबूती से मोर्चा साधेगी। ममता ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे के विकल्प के लिए वे निर्णायक योगदान करेंगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से चुनावी समझदारी बनाने की कई बार कोशिश की है। लेकिन, पटनायक ने कांग्रेस के नेताओं को ठेंगा ही दिखाया है। यही कहा कि महंगाई और घोटालों के चलते यूपीए गठबंधन बदनाम है। ऐसे में, वे कांग्रेस से कोई तालमेल की राजनीति नहीं कर सकते।
कांग्रेस ने इस बार राहुल को चुनावी अभियान की कमान दी है। राहुल आमूलचूल परिवर्तन के लिए भाषणबाजी तो खूब करते हैं, लेकिन किसी को नहीं पता कि वे पार्टी में क्या-क्या बदलाव करने जा रहे हैं? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहुल की राजनीति पर कटाक्ष किया है। सवाल किया कि एक तरफ तो वे ईमानदार राजनीति का ढोल पीट रहे हैं। दूसरी तरफ, भ्रष्ट छवि वाले राजद से चुनावी गठबंधन कर रहे हैं। जबकि, इस पार्टी के मुखिया लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में अदालत से सजा भी हो चुकी है। वे जमानत पर बाहर हैं। राजद और कांग्रेस का संभावित गठबंधन इस बात का संकेत है कि राहुल केवल भाषणों में ही राजनीतिक बदलाव करने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों कोशिश हुई थी कि इस बार राजद के बजाए ईमानदार छवि वाली जदयू से कांग्रेस चुनावी हाथ मिला ले। लेकिन, इसके आसार नहीं बचे।

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच मजबूत गठबंधन चलता आ रहा है। राज्य में दोनों दलों की मिली-जुली सरकार है। केंद्र में एनसी के नेता फारुख अब्दुल्ला मंत्री हैं। राज्य में नई प्रशासनिक इकाइयों के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच मतभेद गहरे हो गए हैं। इसके चलते मुख्यमंत्री उमर ने इस्तीफा देकर कांग्रेस को ‘पाठ’ पढ़ाने की धमकी भी दे डाली थी। इससे राजनीतिक हल्कों में चर्चा शुरू हुई कि भाजपा की चुनावी बढ़त के आसार देखकर उमर पाला बदल सकते हैं। हालांकि, इस तरह के कयासों पर उन्होंने सफाई दी है कि टीम मोदी के खेमे का साथ नहीं देने जा रहे। लेकिन, अब्दुल्ला परिवार के तेवरों से कांग्रेस में इनके प्रति अविश्वास की लकीर कुछ और गहरी हो गई है। वैसे भी, वाजपेयी सरकार के दौर में फारुख अब्दुल्ला ने एनडीए से हाथ मिलाया था। उन्होंने वाजपेयी की सरकार में भागीदारी भी की थी। कांग्रेस के रणनीतिकार पिछले दिनों सवाल करते रहे हैं कि मोदी फैक्टर की वजह से एनडीए में कौन से नए घटक भला जुट सकते हैं? लेकिन, भाजपा का चुनावी अभियान तेज होते ही इस तरह का राजनीतिक संकट कांग्रेस के सामने भी खड़ा होने लगा है। मौका देखकर अब एनसीपी जैसे दल भी कांग्रेस को ‘पाठ’ पढ़ाने की हिम्मत करने लगे हैं, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दल भी कांग्रेस को आंखें दिखाने की हिम्मत कर रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज इन राजनीतिक हलचलों को शुभ संकेत नहीं मान रहे। यह जरूर है कि कांग्रेस आलाकमान का रुख सहयोगी दलों के प्रति काफी नरमी वाला है। कोशिश की जा रही है कि बात ज्यादा न बिगड़ने पाए। लेकिन, कब तक…

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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