कानून मंत्री के मामले में सरकार को सबक सिखाएगी भाजपा!

बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत भारी राजनीतिक टकराव से हुई है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के तेवर कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो चले हैं। पार्टी नेतृत्व ने सत्र के दौरान बात-बात पर सरकार की फजीहत करने का एजेंडा सा बना लिया है। कोयला घोटाले में स्टेटस रिपोर्ट का मामला तूल पकड़ता दिखाई पड़ने लगा है।

कानून मंत्री अश्विनी कुमार उसके खास निशाने पर आ गए हैं। पार्टी ने संसद में कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग जोर-शोर से शुरू कर दी है। यहां तक कि वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के तेवर भी काफी तीखे दिखाई पड़े। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी कोशिश शुरू की है कि भाजपा नेतृत्व संसद में कामकाज ठीक से शुरू होने दे। लेकिन, बात नहीं बनी है। कई और मुद्दों पर उसके तेवर आक्रामक बने रहे। वाममोर्चा ने भी कोशिश शुरू की है कि यूपीए सरकार को इस बार जमकर घेरा जाए।

शनिवार को यहां सर्वदलीय बैठक हुई थी। संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने विपक्षी दलों से अनुरोध किया था कि सोमवार से शुरू होने जा रहे सत्र में सभी लोग सकारात्मक रुख अपनाएं। क्योंकि, सरकार को वित्त विधेयक के साथ भूमि-अधिग्रहण संशोधन विधेयक, खाद्य सुरक्षा विधेयक, बीमा व पेंशन आदि के जरूरी विधेयक पास कराने है। इनमें कई के प्रारूपों पर सभी दलों की सहमति भी बन चुकी है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली से खास तौर पर सहयोग की अपील कर चुके हैं। उन्होंने विपक्ष से यह आश्वासन भी लेना चाहा कि कोई दल सदन के कामकाज को पूरी तौर पर ठप करने की कोशिश नहीं करेगा।

लेकिन, पहले ही दिन प्रधानमंत्री की अपील एकदम अनसुनी कर दी गई। राज्यसभा में कानून मंत्री के मामले को लेकर भाजपा ने एकदम जिद्दी रवैया अपना लिया। चर्चा के दौरान अश्विनी कुमार सदन में दिखाई नहीं पड़े। जबकि वे इसी सदन के सदस्य हैं। इस बात से भाजपा के सांसद और बिफर गए। उल्लेखनीय है कि पिछले महीने कोयला घोटाले की जांच के मामले में सीबीआई ने एक स्टेटस रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को सौंपी थी। बाद में, मीडिया के एक हिस्से में यह खुलासा हुआ था कि यह रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की जाने के पहले सरकार ने देखी थी। इतना ही नहीं, इस रिपोर्ट में दबाव के जरिए अपने अनुकूल कुछ संशोधन भी करा लिए गए थे। एक अंग्रेजी अखबार ने यह दावा कर दिया कि कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने सीबीआई निदेशक को अपने मंत्रालय में तलब किया था। इसी के बाद सीबीआई को निर्देश दिए गए कि स्टेटस रिपोर्ट में सरकार के खिलाफ की गई कुछ सख्त टिप्पणियों को बदल दिया जाए। बाद में, यह रिपोर्ट बदली भी गई।

इस खुलासे से राजनीतिक हल्कों में काफी विवाद खड़ा हुआ है। उच्चतम न्यायालय ने भी इस खुलासे के बाद सीबीआई से एक हलफनामा मांगा है। इसमें पूछा गया है कि सीबीआई ने रिपोर्ट दाखिल करने के पहले सरकार को दिखाई तो नहीं है? अभी यह शपथ पत्र दिया जाना है। हालांकि, सीबीआई की तरफ से सफाई आ गई है कि किसी मंत्री ने रिपोर्ट बदलने के लिए दबाव नहीं डाला था। लेकिन, भाजपा प्रवक्ता एवं राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता रविशंकर प्रसाद, सीबीआई की इस सफाई को विश्वसनीय नहीं मानते। उनका कहना है कि खुद कानून मंत्री ने इस बात का खंडन नहीं किया है कि उन्होंने उस दौर में सीबीआई निदेशक से अपने कार्यालय में मुलाकात नहीं की थी। इसी से साबित होता है कि दाल में कुछ तो काला जरूर है।
    
रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय को इस मामले में पहले ही सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं रहा। इसीलिए उसने सीबीआई को साफ-साफ निर्देश दे दिए थे कि कोयला घोटले मामले की जांच की रिपोर्ट सीधे न्यायालय में दी जाए। इसकी कोई जानकारी सरकार को न दी जाए। उल्लेखनीय है कि विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि कोयला घोटाले में पीएमओ कुछ बड़े लोगों को बचाने के लिए सीबीआई पर दबाव बना रहा है। मामले का संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने इस प्रकरण की जांच सीबीआई से अपनी निगरानी में शुरू करा दी है। अब इस मामले में कानून मंत्री खास निशाने पर आ गए हैं।

सीपीआई के वरिष्ठ सांसद गुरुदास दासगुप्ता भी मानते हैं कि यह मामला काफी गंभीर है। क्योंकि, ऐसी हरकत तो सरासर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना भी है। उन्हें भी संदेह है कि कोयला घोटाले में बड़ी मछलियों को बचाने की कोशिश हो रही है। इस मामले में सरकार और सीबीआई की सफाई उन्हें लचर लगती है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भी विवाद का एक नया राजनीतिक आयाम जुड़ गया है। पिछले दिनों इस मामले में नियुक्त संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की ड्राफ्ट रिपोर्ट को लेकर सियासी जंग तेज हो गई है। उल्लेखनीय है कि जेपीसी के प्रमुख एवं कांग्रेसी नेता पी सी चाको ने एक गोपनीय ड्राफ्ट रिपोर्ट समिति के सभी सदस्यों को भेजी थी। यह रिपोर्ट मीडिया में लीक हो चुकी है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, जेपीसी प्रमुख ने इस मामले में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री पी. चिदंबरम को क्लीनचिट दी है। जबकि, एनडीए सरकार के दौर में स्पेट्रम घोटाले का जिक्र काफी विस्तार से है। इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का उल्लेख भी है। ड्राफ्ट रिपोर्ट में शक की सुई वाजपेयी पर भी घूमी है। इससे भाजपा का नेतृत्व काफी नाराज है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि वे लोग कांग्रेस के इस तरह की ओछी हरकत को बर्दाश्त नहीं करेंगे। संसद से सड़क तक 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले बाजों की पोल खोलते रहेंगे। यदि सरकार का रवैया इसी तरह का रहा, तो संसद में होने वाले हंगामे की जिम्मेदारी सरकार की ही होगी।

राष्ट्रीय राजधानी में एक बार फिर दुष्कर्म का मामला खास चर्चा में आ गया है। पूर्वी दिल्ली में एक पांच साल की ‘गुुड़िया’ के साथ दिल दहलाने वाली गैंगरेप की वारदात हुई है। इसको लेकर पिछले कई दिनों से जनता सड़कों पर है। पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में ही एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ बलात्कार की भीषण दरिंदगी हुई थी। इस बार भी मासूम के साथ अमानवीय कृत हुआ है। इसको लेकर केंद्र सरकार भी निशाने पर है। क्योंकि, दिल्ली की कानून व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन है। आंदोलनकारी इस मामले में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर का इस्तीफा मांग रहे हैं।

इस मामले में कल संसद में केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपना बयान दिया है। उन्होंने यह कह दिया कि बलात्कार सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी होते हैं। यदि इस मामले में पुलिस ने कोई लापरवाही की है, तो उसकी जांच हो रही है। इस मामले में ज्यादा सियासत नहीं होनी चाहिए। गृहमंत्री के अंदाज-ए-बयां से विपक्ष की नाराजगी और बढ़ गई है। भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि गृहमंत्री ने जिस अंदाज में ‘गुड़िया’ बलात्कार मामले में जवाब दिया है, वह घोर आपत्तिजनक है। क्योंकि, ऐसा लगता है कि सरकार इस मामले में भी ज्यादा संवेदनशील नहीं है।

2जी स्पेक्ट्रम मामले में जेपीसी की रिपोर्ट लीक का मामला, द्रमुक नेतृत्व ने बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। द्रमुक ने इस मामले में पी सी चाको के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस स्पीकर को दिया है। इस मामले में द्रमुक के साथ एनडीए और वाममोर्चा के नेता भी साथ खड़े हो गए हैं। एनडीए के संयोजक शरद यादव कहते हैं कि मनमोहन सरकार सभी संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा भंग करने पर उतारू है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने संकेत दिए हैं कि कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग पर एनडीए जोर देता रहेगा। वैसे भी आडवाणी पहले ही संकेत दे चुके हैं कि इस मामले के हल का रास्ता निकालने के लिए सरकार ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऐसे में, वह विपक्ष से संसद के अंदर बहुत सकारात्मक सहयोग की उम्मीद भी कैसे कर सकती है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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