कारपोरेट मीडिया, आम पत्रकार, यशवंत और भड़ास

आज के दौर में कारपोरेट मीडिया घरानों का आम जनता की आवाज कहे जाने वाली मीडिया पर पूरी तरह कब्ज़ा हो चुका है. सरकार भी इन्हीं के साथ खड़ी है. ऐसे में यशवंत जैसे वीर पुरुष यदि किसी तरह से पोर्टल बनाकर मीडियाकर्मियों के दुखों को उजाकर कर रहे हैं, तो निश्चित ही बवंडर का सामना करना होगा, जैसा हम लोगों ने देखा कि कुछ लोग कूट रचना करके यशवंत जी को जेल भेज दिए.

जहाँ तक मैं जानता हूँ, भाई यशवंत एक संघर्षशील पुरुष हैं, इनके ऊपर इन साजिशों का कोई असर नहीं होगा, मगर हम मीडिया के लोगों को सोचना होगा कि ऐसी स्थिती में हम लोगों को क्या करना चाहिए, कम से कम एक आन्दोलन तो खड़ा कर सकते हैं. कुछ लोगों ने किया भी जो बधाई के पात्र हैं लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. अब इस तरह के आन्दोलन की नहीं बल्कि क्रांति यानी मीडिया क्रांति की जरूरत है. भविष्य में ऐसा संभव भी है.

अब मीडिया मंडी सरकारों की चाटुकारिता कर रही है और विज्ञापन के लिए या यूँ कहे हड्डी पाने की चाहत में कितने निचले स्तर पर गिर जाएगी, इसका कोई अंत नहीं है. पत्रकार भाई कुछ अच्छा लिखने और पर्दाफाश करने के लिए मचल रहे हैं, मगर मीडिया का प्रबंधतंत्र कुंडली मारकर बैठा हुआ है. वह कुछ करने नहीं देना चाहता है. बड़े-बड़े मीडिया घराने के लोग तो मौज काट रहे हैं. लेकिन आम पत्रकार शोषण का शिकार है. इनका कोई पुरसाहाल नहीं है. सरकार भी इनकी माली हालत पर नज़र नहीं दौड़ा रही है कि इनको भी कुछ सरकारी सुविधाएँ चाहिए या ये भी इंसान हैं, इनका भी घर परिवार है. आखिर इनको कोई सुविधा क्यों नहीं दी जा रही है? जब भी जहाँ भी कोई चाहता है, इन्हें शोषित कर लेता है. इनकी कोई सुनवाई भी नहीं होती है. इनके लिए कोई भत्ता नहीं, पेंशन नहीं. घर मकान लेने में कोई फेसिलिटी नहीं. यहाँ तक लोन लेने के लिए भी कोई अनुदान नहीं है. आखिर क्यों नहीं? जुनून में समाज सेवा के लिए अखबार कोई आम आदमी निकाल रहा है तो उसके अखबार के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है, उल्टे उसके अखबार का डीएवीपी नहीं होने दिया जाता है ताकि यह आगे न बढ़ सके. उसके पग-पग पैर यही लोग कांटे ही कांटे बिछाते हैं. इतना ही नहीं, विज्ञापन में घोटाला है, यहाँ भी दलाली है, चाटुकारिता है.

आप सोच सकते हैं कि भाई यशवंत किस हालात में अपनी वेबसाइट चला रहे हैं. तिस पर इन्हें मगरमच्छों से लड़ना भी पड़ रहा है. और तो और, बड़े बड़े महाजन जो देश के उद्योगपति हैं, वह भी केवल नेताओं को ही चंदा देते हैं, राजनीतिक दलों को करोड़ों का चंदा दिया जा रहा है. आखिर ये लोग मीडिया के छोटे कर्मचारियों के कल्याण के लिए कोई फंड क्यों नहीं बनाते हैं. सरकारें क्यों नहीं सोचती हैं. एक सरकारी आदमी की दुर्घटना में मौत हो जाए तो उसके परिवार के लिए नौकरी से लेकर सभी कुछ दी जाती है मगर एक मीडियाकर्मी की मौत समाचार कवरेज के दौरान हो जाये तो उसकी मौत पर आंसु बहाने संस्थान का मालिक तक नहीं आता है, कुछ देने की बात ही कुछ और है.

सरकार तो कभी कुछ सोचती ही नहीं है. आखिर क्यों? क्या आपने कभी सोचा? अगर नहीं तो अब सोचना होगा, सरकारों को मजबूर करना होगा. इसके लिए एक आन्दोलन की नहीं, क्रांति और कुर्बानी की जरूरत है. मित्रों आज भाई यशवंत के साथ यह अन्याय हुआ, कल आपके साथ होगा, इसे रोकने के लिए आपको आगे आना होगा. इसी क्रम में आप सबको अवगत कराना है कि एक संस्थान का गठन होने जा रहा है. आप सभी मित्रों से अपील है इस क्रांति के रथ को आगे बढ़ाने में आपना योगदान सुनिश्चित करें.

जय हिंद जय भारत

अजीत कुमार पांडेय

AJIT KUMAR PAMDEY

ajitmediaajit@gmail.com


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