कारपोरेट होती मीडिया और मार्केटियर होते संपादकों के दौर में आलोक तोमर की याद

दिल्ली में कई बरस रहने के बाद भी और रफी मार्ग स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब कई बार जाने के बाद भी कल इस जगह पहुंचने के लिए मुझे इसके इर्द-गिर्द की सड़कों पर डेढ़ घंटे तक चक्कर लगाने पड़े. बार-बार जंतर-मंतर रोड पर पहुंचूं और कहीं और निकल जाऊं. कांस्टीट्यूशन क्लब की सड़क पकड़ने से जैसे कार ने इनकार कर दिया हो. किससे नहीं पूछा. आटो वाले, ट्रैफिक वाले, सिपाही, पैदल यात्री आदि इत्यादि से पूछता रहा, हे भइया, रफी मार्ग पर कांस्टीट्यूशन क्लब जाना है, कैसे जाएं? और वो अपने हिसाब से दाएं बाएं आगे पीछे रेड लाइट टी प्वाइंट आरबीआई आईएनएस आदि समझाते और मैं चल देता. लेकिन हर जगह पहुंच जाता, सिर्फ कांस्टीट्यूशन क्लब नहीं पहुंच पाया.

आखिर में एक सज्जन उधर जाने को थे और रास्ता बताने की बात कहकर कार की सवारी कर गए. मुझे भी चैन मिला क्योंकि रुलाई छूटने ही वाली थी. ठीक छह बजे क्लब पहुंचा. यादों में आलोक तोमर कार्यक्रम शुरू हो चुका था. एक युवा गायक सितार के साथ कबीर को सुना रहा था. उनके साथ पूरा बैंड था. अच्छी आवाज. याद है, पिछले साल जब आलोक जी के गुजरने पर श्रद्धांजलि सभा हुई थी तो इसी बंदे ने गाया था… मोको कहां ढूंढो रे बंदे, मैं तो तेरे पास… कांस्टीट्यूशन क्लब के जिस हाल में प्रोग्राम था, वो खचाखच भर चुका था, लोग पीछे लाइन लगाकर खड़े थे. डा. हरीश भल्ला संचालन कर रहे थे. दीपक चौरसिया पहले वक्ता. फिर श्रवण गर्ग. राहुल देव, संतोष भारतीय. पुण्य प्रसून बाजपेयी. प्रभात झा. कई लोग बोले.

सार संक्षेप यह था कि समझौता परस्ती, संस्थान परस्ती, चापलूसी, रीढ विहीनता के इस दौर में आलोक तोमर ज्यादा प्रासंगिक हैं, उन जैसे लोगों की जरूरत है, उन जैसे युवाओं को सपोर्ट करने की जरूरत है. ट्रस्ट बनाने की जरूरत है. बीमार और आपदाग्रस्त पत्रकारों की मदद की जरूरत है. सबने आलोक से जुड़े किस्से कहानी सुनाए. सबको सुनते हुए लगा कि आलोक तोमर की तारीफ सब करना चाहते हैं, लेकिन उन जैसा कोई बनना नहीं चाहता क्योंकि उन जैसा बनने के जो थोड़े बहुत खतरे हैं उसे कोई नहीं उठाना चाहता. आलोक तोमर ने आलोक तोमर बने रहने की बहुत कीमत चुकाई. मेन स्ट्रीम मीडिया की उपेक्षा झेली, अकेलापन झेला, विरोध झेला, मुकदमें झेले, जेल गए. सच कहने की कीमत बहुत चुकाई. एक एक कर ज्यादातर लोग उनसे कटने लगे. बचने लगे.

लेकिन इस आलोक तोमर ने मीडिया और लोकतंत्र को बहुत कुछ दिया. सबसे बड़ी चीज तो उन्होंने हम जैसे लोगों को दी, प्रेरणा के रूप में, कि सच कहकर भी जिंदा रहा जा सकता है. सबसे लड़ते हुए भी खुश रहा जा सकता है. जिन लोगों को संघर्ष के सुखों का अंदाजा नहीं है, वे लोग पैसे और पद के सुख से परे कुछ सोच बूझ नहीं सकते. कुछ तस्वीरें जो मैंने कार्यक्रम के दौरान लीं, इस प्रकार हैं. इसमें एक तस्वीर जस्टिस काटजू और दैनिक जागरण के निदेशक तरुण गुप्ता की है. संयोग था कि जब कांस्टीट्यूशन क्लब से बाहर निकल रहा था तो गेट पर काटजू साहब अकेले टहलते हुए मिल गए. उनसे गपिया रहा था कि अपनी गाड़ी से तरुण गुप्ता उतरे. तरुण जी को आवाज लगाई. तरुण जी मेरे बॉस रहे हैं. दैनिक जागरण, मेरठ में उनको मेरी रिपोर्टिंग रही है. तरुण जी और जस्टिस काटजू का एक दूसरे से परिचय कराया. दोनों की एक साथ फोटो भी ली.

हां, इससे पहले देवेश गुप्ता भी मिले. वे तरुण गुप्ता के बड़े भाई और दैनिक जागरण के निदेशक हैं. देवेश व तरुण, दोनों लोग धीरेंद्र मोहन गुप्ता जी के बेटे हैं. सबको पता है कि धीरेंद्र मोहन गुप्ता स्वर्गीय नरेंद्र मोहन के भाई हैं और इनके अधीन वेस्ट यूपी व उत्तराखंड की जागरण की यूनिटें हैं. आलोक तोमर के आयोजन की रिपोर्ट विस्तार से लिखना चाहता था लेकिन कई तरह की दिक्कतों में फंसे होने के कारण और इधर-उधर की भागदौड़ के कारण नेट पर देर तक बैठना हो नहीं पा रहा. फिर कभी किसी मौके पर लिखूंगा. फिलहाल कुछ तस्वीरें. चाहूंगा कि जो लोग कार्यक्रम में शरीक थे, उनमें से कुछ लोग रिपोर्ट लिखकर भेजें ताकि आयोजन का विस्तार से कवरेज भड़ास पर प्रकाशित कराया जा सके. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

कार्यक्रम के आयोजकों में से एक चर्चित पत्रकार दीपक चौरसिया का संबोधन और खचाखच भरा हाल.

राहुल देव ने दो शब्द कहे.

पीछे काफी संख्या में लोग खड़े थे.

पुण्य प्रसून बाजपेयी का संबोधन.

जस्टिस काटजू और तरुण गुप्ता.

 

 
 

 

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