कारवां, असीमानंद, मीडिया और माता

Abhishek Srivastava : कारवां पत्रिका में असीमानन्‍द पर कवरस्‍टोरी को छपे छह दिन हो गए, लेकिन मीडिया में इसे उठाने की सुध आज जगी। टीवी वाले या तो वाकई पढ़ते-वढ़ते नहीं हैं, या फिर माता के निर्देश का इंतज़ार करते हैं।

दिल्ली के पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Pawan K Shrivastava : मैं भी यही सोच रहा था
 
Ashok Dusadh : हमको तो पहला वाला सही लग रहा है . बाद में उठाने का मसला यह है के पहले उठाने के खतरे के दायें -बाएं देख लिया जाता है फिर निश्चिंत होने पर उसे पटल पर लाया जाता है.
 
Sandeep Verma : फेसबुक पर घूमना शुरू कर दी थी. हिम्मत ही नहीं थी चुप बनाये रखते.
 
अवनीश राय : दोनो ही बात सही है।
 
Ashish Maharishi : maharaz agency se kal aai thi
 


आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से…

Anand Pradhan : मालेगांव, अजमेरशरीफ, मक्का मस्जिद से लेकर समझौता ब्लास्ट तक मामलों में गिरफ़्तार असीमानंद के पीछे कौन है? यह बहुत बड़ी गुत्थी है? वास्तविक खोजी पत्रकारिता में दिलचस्पी रखनेवाले किसी भी पत्रकार या अख़बार/न्यूज़ चैनल के लिए यह बहुत आकर्षक स्टोरी आइडिया है लेकिन अफ़सोस है कि अब तक किसी ने गंभीरता और सक्रियता से इसकी पड़ताल नहीं की। क्यों? बताने की ज़रूरत नहीं है। 'कारवैन' पत्रिका को बधाई कि उसने इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की है। अब यह बाक़ी अख़बारों/न्यूज़ चैनलों की ज़िम्मेदारी है कि इसकी आगे पड़ताल करें और सच्चाई को सामने ले आएँ। वैसे असीमानंद और उनके साथियों में इन बम ब्लास्ट और लोगों को मारने के विचार कहाँ से आए हैं, यह किसी से छुपा नहीं हैं। सच यह है कि किसी को असीमानंद के पीछे खड़े सांप्रदायिक घृणा के विचार और साथियों की पहचान करनी है तो वह भगवा सांप्रदायिक फासीवाद की राजनीति ही है।

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