कार्टून्‍स चोरी करके छाप रहा है नवभारत

प्रिय यशवंतजी, मैं एक व्यंग्यचित्रकार हूँ और लगभग १२ वर्षों से प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ा हूँ. मैं इसी के साथ अपना एक ब्लॉग भी चलता हूँ जिसका लिंक है http://www.satishupadhyay.blogspot.com/.  पिछले कई महीनों से नवभारत समाचार पत्र जो नागपुर से प्रकाशित होता है और भी कुछ अखबार मेरे कार्टून्स और विरुपचित्र मेरे ब्लॉग से बिना इजाजत छाप रहा है. मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित सामग्री मैंने इंडिया न्यूज़ के लिए तैयार की थी. एक स्थापित समाचार पत्र द्वारा इस प्रकार का कृत्य निंदनीय  और दंडनीय भी है. ये वही अखबार है जिसने ८ वर्षों पहले कार्टून जैसी चीजों की नवभारत में जगह के लिए इनकार किया था.

खैर, मामला ये है कि मैंने यह ब्लॉग अपने पाठकों के लिए बनाया है. इस ब्लॉग पर मैंने पहले ही व्यावासिक उपयोग के प्रतिबन्ध कि चेतावनी लिख रखी है फिर भी इसका निरंतर दुरुपयोग हो रहा है. मेरी सूचना के अनुसार देश के कई अख़बार मेरे चित्रों का व्यावासिक उपयोग कर रहे हैं. जिनके पुष्ट प्रमाण हैं उन्हें मैं इस पत्र के साथ सलाग्नित कर रहा हूँ. आपको यह पत्र भेजने का एक और भी कारण है कि आने वाले समय में इस प्रकार की चोरियां न हों. यह केवल मेरे ही साथ नहीं हो रहा बल्कि उन सभी ब्लागरों के साथ हो रहा है जो बड़ी मेहनत से अपने पाठकों के लिए सामग्री तैयार करते हैं और कुछ समाचार पत्र उनका दुरुपयोग करते हैं.

यदि हमारे जैसा कलाकार जब इनसे काम चाहता है तो ये इस काम को अनुपयोगी बता कर टाल देते हैं और जब वही काम कहीं और दिखता है तो चुरा लिया जाता है. ये सभी चाहते हैं कि इस प्रकार का काम उनके प्रकाशन में छपे लेकिन मुफ्त में. हद तो तब हो जाती है जब ये लोग साभार तक नहीं लिखते और हस्‍ताक्षर भी एडिट कर उसे छापते हैं. इस बात से परेशान होकर मैंने २ मार्च २०१२ को अपने ब्लॉग पर चित्रों का प्रकाशन बंद कर दिया, परन्तु आज ( २२/४/२०१२) को जब नवभारत, नागपुर प्रकाशन देखा तो दिमाग ख़राब हो गया. मेरे द्वारा बनाया गया पृथ्वीराज चौहान का चित्र फ्रंट पेज पर छपा है, जिसे मैं अपने ब्लॉग पर १९ नवम्बर २०१० को प्रकाशित कर चुका हूँ. मजबूरन अब मुझे इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करनी पड़ रही है. 

कोई भी चित्रकार या कलाकार इसलिए नहीं बनता कि वो इंजीनियर, डॉक्टर या आईएएस-आईपीएस नहीं बन सका या उसे कुछ नहीं आता. कलाकार बनने के लिए भी मेहनत और लगन की जरूरत होती है. परन्तु हमारे देश में कला अभिशाप है और इस प्रकार का व्यवहार कला के मुंह पर तमाचा.

सतीश उपाध्‍याय

महाराष्‍ट्र

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