काश तुम भी स्ट्रिंगर होते तो ये छंटनी घर का चूल्हा ठंडा ना कर पाती.

Chandan Srivastava :  स्ट्रिंगर किसी छंटनी से नहीं डरता. स्ट्रिंगर किसी चैनल की गुलामी का मोहताज भी नहीं होता. सच मे तो वो किसी चैनल का गुलाम ही नहीं होता. एक फोन पर भर्ती और अगले फोन पर बर्खास्तगी का तमाशा जानने वाला क्युं डरेगा किसी छंटनी से. तीन-चार-पांच महीने या साल भर (कभी कभी जीवन भर) भी उसके घर का चुल्हा बिना किसी चैनल के स्ट्रिंगरशीप के (ध्यान दें, स्ट्रिंगरशीप कोई नौकरी नहीं होती) भरोसे जलता रहता है. हां स्ट्रिंगर को कोई इंक्रीमेंट नहीं मिलता उल्टा डिक्रीमेंट मे भी खुश रहता है, स्ट्रिंगर. क्योंकि स्ट्रिंगर सिर्फ स्ट्रिंगर नहीं होता और भी बहुत कुछ होता है स्ट्रिंगर. क्या कहा, दलाल भी होता है स्ट्रिंगर!!! जाओ यही सोच सोच कर खुश रहो या फिर सिर पीटो कि काश तुम भी स्ट्रिंगर होते तो ये छंटनी घर का चूल्हा ठंडा ना कर पाती.

Nikhil Anand : Indian Media iS Functioning Like An UnOrganised Sector With No Recruitment Policy & Service Rules. Considered To Be The SoCalled 4th Estate/Pillar Of Democracy But iNSide iTs Run Like a Feudal Caste-Class-Religion-Gender Biased Hub. Media iS Truly No Mission Now a Days, Lack Socio-Political Vision, Obliging Their Kin-Kith-Caste-Class-Religious Concerns & iNTo Running a Business On Merely Profit-Loss Basis . Not Only This Owner/Bosses Enjoing All Kinds Of Luxury iNSide, Exploiting-Blackmailing People iN The Name Of Job InSucurity. Most Of Media People Are Needy-JobSeeker Turning iNTo Hypocrate-Cowards, CutOff From Society-Family & Ready To Compromise At Any Level For JobSecurity. Many Examples, But iN Recent Past MauryaTv iN Patna Completely Proved The Above Concerns Where Hundreds Of People Were KickedOut Without Notice. Now NetWork-18 Repeated The Cheap Act By Kicking Out 325 People iN OneGo. I Demand A Legal Constitutional Regulation On These Self Regulatory Media Frauds. Social Diversity iN Media iS a Must To Stop Them From Being Vested InterestGroup Tools, Agents, Puppets & Stooge. Shame On Indian Media! Save Media!!

Shishir Sinha : पत्रकारों की छंटनी पर मेरे और मेरे कई साथियों के पोस्ट के बाद अलग-अलग प्रतिक्रिया मिली। कुछ मित्रों ने ये भी लिखा कि दूसरे क्षेत्रों की छंटनी को लेकर हल्ला नहीं मच रहा, आपको केवल अपनी बिरादरी की पड़ी है। ऐसी प्रतिक्रिया देने वालों में कुछ पत्रकार मित्र भी है। एक मित्र ने अपने पोस्ट पर लिखा कि तिकड़म और होशियारी से कहीं भी छंटनी हए लोग नौकरी पा लेंगे। भगवान ना करे, कल अगर उन्हे या उनके खास साथियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, तो क्या वो ये कहकर चुप बैठ जाएंगे कि उन्होंने एक भी छंटनी की खबर नहीं लिखी थी, इसीलिए उन्हे इस मामले में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है? क्या तिकड़म और होशियारी सिर्फ पत्रकारिता के पेशे में ही हैं? क्या जेट, मारुति, किंगफिशर या दूसरी कई कंपनियों में हुई छंटनी के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया या दिखाया गया था?

Harishankar Shahi : मीडिया में छंटनी कहीं पत्रकारों को संदेश देने की साजिश तो नही है कि अपनी सोच को ज्यादा मत फैलाओ वर्ना हम घर के चूल्हे की आंच को सीमित कर देंगे. शायद यह एक सबक है कि पत्रकारिता मत करना वर्ना नौकरी कभी भी जा सकती है. एक साथ काफी लोगों को कारपोरेट से संदेश दे दिया कि असली नियंता कौन है, जान लो.

फेसबुक से.

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