कूटनीतिक कमीनेपन का इससे उम्दा उदाहरण कोई और हो नहीं सकता

: मुलायम का चरखा, ममता की हेकड़ी और समय की दीवार पर प्रणब मुखर्जी का नाम : एक समय में महात्मा गांधी चरखा कात कर राजनीति भी करते थे। पर अब मुलायम सिंह यादव जैसों ने राजनीति में गांधी के चरखे की भूमिका बदल दी है। गांधी चरखा पर सूत कातते थे, यह कह कर कि चरखा धैर्य और संयम सिखाता है। जैसे सूत नहीं टूटने पर सारा ध्यान केंद्रित रहता है चरखा कातने पर, वैसे ही इससे संयम नहीं टूटने का अभ्यास होता है जीवन में। राजनीति में। पर गांधी के धैर्य और संयम, समन्वय को धता बता कर कुश्ती वाला चरखा दांव मारते हैं मुलायम अपनी सफलता के लिए। राजनीति में सत्ता का शहद चाटने के लिए। तो राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव का मेल और कांग्रेस को दी गई चुनौती अड़तालिस घंटे भी बरकरार नहीं रह पाई। कूटनीतिक कमीनेपन का इससे उम्दा उदाहरण कोई और हो नहीं सकता।

ममता ने बिसात बिछाई ज़रूर पर उस पर खेल गए मुलायम। और मार दिया चरखा दांव। ममता की हैसियत उस जैसी हो गई कि जिस डाल पर बैठी हों वह डाल ही नहीं, पेड़ ही काट डाली। ममता बनर्जी की गुंडई पहली बार पानी पा गई। वैसे भी इन दिनों ममता की प्राथमिकताएं भी अब बदलने लगी हैं। जिस तरह आईपीएल में शाहरुख की टीम के विजयी होने पर उन्होंने सरकारी खजाना लुटा कर उनका भाव-विभोर हो कर स्वागत किया वह बहुतों को नहीं भाया। कंगाल हो चले बंगाल के सरकारी खजाने का अपव्यय सब को ही खला। स्वागत तक तो ठीक था, पर पूरी टीम को सोने का हार देना? यही ठीक नहीं था। मां, माटी, मानुष के नारे और इस के भाव से उलट उन की तानाशाही और बदमिजाजी उन पर और उन की राजनीति पर अब बहुत भारी पड़ रही है।

तो क्या उन के इस व्यवहार और मनोविज्ञान की पड़ताल उनके अविवाहित जीवन में ढूंढा जाना चाहिए? जाने ऐसा क्या है कि भारतीय राजनीति में अभी सक्रिय कोई चार महिलाएं जो राजनीति के पहले पायदान पर दीखती तो हैं पर अपनी तानाशाही और बदमिजाजी के चलते उन्हें वह स्वीकार्यता और सम्मान नहीं मिल पाता समाज और राजनीति दोनों में, जिस की कि वह हकदार भी हैं। जयललिता, मायावती, ममता और उमा भारती।

चारो ही महिलाएं तानाशाह, बदमिजाज, अराजक और मनबढ हैं। बेलगाम या बेअंदाज़ भी कह सकते हैं। एहसानफ़रामोशी भी इन में कूट-कूट कर भरी पड़ी है। अपनी इस प्रवृत्ति को यह चारो जब-तब प्रदर्शन करती ही रहती हैं। जयललिता और मायावती ने तो भ्रष्टाचार के भी झंडे बढ़-चढ़ कर गाड़े हैं। लेकिन अविवाहित तो गिरिजा व्यास और रेणुका भी हैं पर उन में यह कर्कशापन इस स्तर पर सार्वजनिक तौर पर तो नहीं ही दिखता। तो क्या अविवाहित होना और मुख्यमंत्री की कुर्सी पा जाने का केमिकल लोचा है यह? जो भी हो अति कभी भी कोई भी समाज या राजनीति बहुत दिनों तक नहीं बर्दाश्त कर पाती। और ममता, मायावती, जयललिता और उमा भारती यह चारो महिलाएं अति की भी पराकाष्ठा अकसर पार करती दीखती हैं। सत्ता तो हर किसी को तानाशाह बनाती है, मनबढ़ भी और बदमिजाज भी। इसको स्त्री या पुरुष खाने में बांट कर देखने की बहुत ज़रुरत होती भी नहीं। बावजूद इस के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में शिष्टाचार और मर्यादा की एक रेखा जो होती है, परंपरा और विश्वास का जो एक तंतु होता है, यह चारो महिलाएं निरंतर उसे तोड़ती क्या तबाह करती दीखती हैं। नहीं सोचिए होने को तो मदर टेरेसा भी अविवाहित ही थीं। लेकिन वह तो तानाशाह नहीं थीं। अराजक या मनबढ नहीं थीं। ममता की मूर्ति थीं। उन के पास जो सत्ता थी, वह अनिर्वचनीय थी। और फिर ममता से बड़ी कोई सत्ता होती नहीं। यह मैं मानता हूं।

तो क्या इन महिलाओं से ममत्व की भावना और ममता का मनोविज्ञान क्या उन की राजनीति सोख लेती है भला? उन को तानाशाह बना देती है? या कि पुरुषों की बेड़ी से आज़ाद होते ही यह असुरक्षा की बेड़ी में इस कदर लिपट जाती हैं कि उन में अराजकता, तानाशाही, मनबढई आदि घर कर जाती है? और कि जब यह प्रवृत्ति और और मज़बूत हो जाती है तब उन में आर्थिक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरा जाती हैं। ममता और उमा भारती पर तो भ्रष्टाचार के दाग अभी तक नहीं लगे हैं। पर मायावती और जयललिता में तय करना कठिन है कि कौन ज़्यादा भ्रष्ट है। कामकाजी महिलाओं में भी जो अविवाहित हैं, परित्यक्ता हैं या विधवा हैं, और कि बास की कुर्सी पर हैं तो उन में भी यह तुनकमिजाजी, बदमिजाजी, असुरक्षा, अविश्वास और तानाशाही यदा-कदा दिख ही जाती है। खैर, इन के ज़रुर कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी होते ही होंगे।

बहरहाल, बात हम यहां ममता बनर्जी की कर रहे थे। जब वह एन डी ए में थीं तब भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति को भी जब-तब धौंसियाती रहती थीं। वाजपेयी जी ममता के इगो मसाज में कोलकाता जा कर उनकी माता जी के पांव भी छू आए। पर ममता तो ममता ठहरीं। ममत्व के विरुद्ध ठहरीं। अपनी आदत से लाचार ठहरीं। और फिर वाजपेयी जी को तो इन चारो कुमारियों ने समय-समय पर धोखा दिया। जब कि वह भी कुंवारे ही थे। जयललिता और मायावती ने तो बारी-बारी समर्थन की सहमति दे कर भी ऐन वक्त पर धोखा दे कर उन की सरकार ही गिराने की गुनाहगार बनीं। खैर जब यू पी ए की सरकार बनी तो ममता उस की घटक दल बन कर सरकार में शामिल हो कर फिर रेल मंत्री बनीं और रेल को अपनी ही तरह से चलाती रहीं। दिल्ली के बजाय कोलकाता में रह कर। खैर कांग्रेस के साथ मिल कर लाल किला ढाह कर अब मुख्यमंत्री हैं। लेकिन सब को साथ ले कर नहीं, एकला चलो गाती हुई, मनमोहन सरकार को बात-बेबात झुकाती हुई। हद तो तब हो गई जब ठीक रेल बजट के बाद जिस तरह उन्हों ने रेल बजट के खिलाफ़ न सिर्फ़ हुंकार भरी, बल्कि अपने ही धड़े के मंत्री दिनेश त्रिवेदी के खिलाफ़ बिगुल बजा दिया। और उन की बलि ले कर ही छोड़ी। सारा शिष्टाचार और संसदीय परंपरा जैसे वह गंगा-सागर में बहा बैठीं। किराए में रोल बैक वह दिनेश त्रिवेदी से भी करवा सकती थीं। पर नहीं। वह तो दिनेश त्रिवेदी पर पहले फ़िदा थीं पर बाद में जाने क्या हुआ कि उन को डस बैठीं।

खैर फिर एफ़.डी.आई. आदि जैसे मुद्दों पर वह सरकार को झुकाती रहीं, पेट्रोल पर बमबमाती रहीं। बिलकुल प्रतिपक्ष की तरह। लेकिन सचमुच जब पेट्रोल के दाम बढ़े तो बस लफ़्फ़ाज़ी तक रह गईं। सिंगूर, नंदीग्राम में बहे खून पर चढ कर मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली ममता अभी तक वहां के किसानों को ज़मीन वापस नहीं कर पाईं हैं। तो भी इधर ममता ने तानाशाही और मनबढई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। अपने प्रदेश में भी और देश में भी। बताइए कि अपने खिलाफ़ कार्टून बनाने वाले तक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खून करते हुए वह जेल में ठूंस देती हैं। अखबारों को जो उन की हां में हां नहीं मिलाते उन की ऐसी-तैसी कर देती हैं। विज्ञापन से वंचित कर देती हैं। महाश्वेता देवी जिन के वह पांव छू कर आशीर्वाद लेती रही हैं तक को नाराज कर लेती हैं। उन पर तानाशाही और मनबढई का बुखार ऐसा चढ जाता है कि अपने आगे सब को वह मूर्ख और कमजोर समझ बैठती हैं। संसदीय गरिमा, शिष्टाचार. मर्यादा आदि को वह बंगाल की खाड़ी में बहा कर राष्ट्रपति चुनाव में भी अपनी गुंडई जारी रखती हैं। समूचा देश और पार्टियां प्रणब मुखर्जी के वृंदगान में लगा होता है और वह कलाम, मनमोहन और सोमनाथ की बांसुरी बजा कर मुलायम को नचाने लगती हैं। वह भूल जाती हैं कि मुलायम सिंह यादव का पुराना रिकार्ड। और बताइए राजनीति भी करना चाहती है? वह भी केंद्र की?

मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति में बिजली का वह नंगा तार हैं जिनको आप दुश्मनी से छुएं तब तो मरना ही है, लेकिन अगर दोस्ती में छुएं तब भी मरना है। यह बात कांग्रेस जानती थी, भाजपा और मायावती जानती थीं, ममता क्यों नहीं जान पाईं? अपनी हेकड़ी में मुलायम का स्वभाव, उनका चरित्र भी भूल गईं? ए भाई ऐसे ही राजनीति करेंगी आप?

वैसे हमेशा ही से रहा है कि ममता जब-जब मनमोहन सरकार को आंख तरेरती रही हैं, मीडिया से लगायत राजनीतिक हलकों तक में भी मनमोहन सरकार के तारनहार और ममता के विकल्प के रूप में मुलायम ही को देखा जाता रहा है। ममता यह भी भूल गईं? परमाणु करार के चलते जब वामपंथियों ने मनमोहन सरकार को बीच मझधार में छोड़ा तब भी वामपंथियों से बेशर्मी दिखा कर मनमोहन सरकार को मुलायम ही ने सहारा दिया था। और अभी बिलकुल अभी यूपीए सरकार के तीन साल की उपलब्धि रिपोर्ट जारी करने के मौके पर गदगद भाव में मुलायम को कांग्रेस के मंच पर खडे पूरे देश ने देखा था तो क्या ममता की आंख पर मोतियाबिंद छाया था कि इस के निहितार्थ वह नहीं पढ सकीं? अच्छा मायावती, मुलायम और लालू के खिलाफ़ आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक सी बी आई का सोटा भी है कांग्रेस के पास यह भी भूल गईं ममता? कि कांग्रेस जब चाहे तब जगन रेड्डी की तर्ज़ पर मायावती, मुलायम और लालू को जब चाहे तब गिरफ़्तार करवा सकती है या मदारी की तरह एक इशारे पर मुलायम, मायावती और लालू को नचा सकती है? यह भी भूल गईं?

और फिर मुलायम अखाड़े के पहलवान हैं। और कि राजनीति में भी कुश्ती का एक दांव होता है चरखा दांव, इस चरखा दांव को जब-तब आज़माते ही नहीं रहते, सब को चित्त भी करते रहते हैं। यह भी ममता जी भूल गईं?

मुलायम सिंह यादव का समूचा राजनीतिक जीवन चरखा दांव से भरा पड़ा है। वह लोहिया की माला जपते ज़रुर हैं पर सारे काम लोहिया के सिद्धांतों के विपरीत करते हैं। संचय के खिलाफ़ थे लोहिया। पर मुलायम? बिना संचय के एक सांस नहीं ले सकते। यह संचय का ही प्रताप है कि वह आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी.बी.आई. के फंदे में फंसे पड़े हैं। और कि अदालती धूर्तई के बूते मामले को बरसों से लटकाए पड़े हैं।

गैर कांग्रेसवाद के जनक थे लोहिया। पर मुलायम हरदम न सिर्फ़ कांग्रेस से सटे रहते हैं बल्कि कांग्रेस से खुद भी समर्थन ले कर सरकार चलाते रहे हैं, कांग्रेस की सरकार चलाने के लिए अपमानित होने की हद तक समर्थन भी देते रहते हैं, दे भी रहे हैं। लोहिया दाम बांधो के हामीदार थे। आंदोलन करते रहते थे। पर मुलायम? अंबानी आदि तमाम उद्योगपतियों के लगभग एजेंट की तरह काम करते हैं। उन की ज़ेब में रहते हैं। वह उद्योगपति जो दाम बढाने और मुनाफ़ाखोरी की तरकीब में दिन रात एक किए रहते हैं। तो मुलायम ने जब लोहिया तक को अपने चरखा दांव में चित्त कर रखा है, उन मुलायम से सटने और उन के संग-साथ से आप कांग्रेस को निपटाने चली थीं? इतनी नादान कैसे हो गईं आप भला?

मुलायम एक समय चरण सिंह के चरणों में बैठते थे। कम से कम मैं ने ऐसे ही बैठे देखा है मुलायम को चरण सिंह के साथ। चरण सिंह कुर्सी पर और मुलायम उन के चरणों में फ़र्श पर। लेकिन उन्हीं चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को उत्तर प्रदेश में बरबाद करने में उन्हों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। अब वह जाटलैंड में ही आधे-अधूरे सिमट कर रह गए हैं। और बेहद मौकापरस्त बन कर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। उन को भी येन-केन-प्रकारेण सत्ता का शहद और मुद्रा ही चाहिए। सोचिए कि अजीत सिंह उन चौधरी चरण सिंह के बेटे हैं और मुलायम सिंह उन के शिष्य हैं जिन चौधरी चरण सिंह के पास मुख्य मंत्री आदि रहने के बाद भी कई बार लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए ट्रेन के किराए का पैसा नहीं रहता था। दोस्त-अहबाब मिल कर किसी तरह व्यवस्था करते थे। तो चरण सिंह को भी चरखा।

मुलायम सांप्रदायिकता के विरोध की बात बहुत करते हैं। इसी बिना पर वह भाजपा का विरोध करते हुए कांग्रेस का समर्थन करने का तर्क भी देते हैं। पर उन से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि उत्तर प्रदेश में जब १९७७ में पहली बार सहकारिता मंत्री बने थे राम नरेश यादव के मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार में तब क्या यही जिस को आप बार-बार सांप्रदायिक कह कर मुस्लिम मतदाताओं को अपना बंधुआ मतदाता बना लेते हैं, वह सरकार क्या बिना जनसंघ धड़े के सहयोग से बनी थी? और कि क्या उस सरकार में भी जनसंघ धड़े के लोग शामिल नहीं थे? यही कल्याण सिंह तब क्या आप के साथ स्वास्थ्य मंत्री नहीं थे? अच्छा चलिए वह सब आपातकाल के प्रतिकार में था। और कि आप की राजनीतिक चेतना तब इतनी प्रखर नहीं थी। पर जब श्रीमान मुलायम सिंह यादव जब आप १९८९ में पहली बार मुख्य मंत्री बने तो क्या इसी सांप्रदायिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से ही नहीं बने? तो क्या भाजपा ने आप को बिना मांगे समर्थन दे दिया था? मतलब मुस्लिम मतदाताओं को भी चरखा। गरज यह कि सत्ता का शहद चाट्ने के लिए मुलायम सिंह यादव कभी भी किसी भी को चरखा दांव से चित्त कर सकते हैं। और फिर अपने को पाक साफ बता कर अगली तैयारी में लग सकते हैं। फिर भाजपा ने जब आडवाणी की रथयात्रा और उन की गिरफ़्तारी के मद्देनज़र मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तो बाद में कांग्रेस के समर्थन से न सिर्फ़ सरकार बचाई बल्कि कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर विधायको को सपा में मिला लिया। और तब से उत्तर प्रदेश में जो कांग्रेस साफ हुई तो फिर खड़ी नहीं हो पाई। राजीव गांधी ने मजबूरन तभी परेशान हो कर दल-बदल विधेयक बनवाया।

खैर, याद कीजिए कि जब मुलायम सिंह यादव दुबारा मुख्य मंत्री बने तो फिर भाजपा या कांग्रेस की जगह उन्हों ने बहुजन समाज पार्टी का समर्थन लिया। बसपा सरकार में भी शामिल हुई। पर कांशीराम और मायावती ने अंतत: जब उन को कान पकड़ने और माफ़ी मांगने तक की नौबत ला दी। इतना ही नहीं जब कांशीराम और मायावती के सामने उन की कान पकड़े खडे एक फ़ोटो एक अखबार मे छप गई तो मुलायम अपना आपा खो बैठे। फिर २ जून, १९९५ का गेस्ट हाऊस कांड हो गया। जिस तरह मायावती को मारने की कोशिश सपाइयों ने की वह संसदीय इतिहास के लिए एक शर्मनाक घटना है। जो भी हो बसपा को भी चरखा दांव में चपेट लिया मुलायम ने। सत्य प्रकाश मालवीय हों या कल्याण सिंह, अमर सिंह हों मधुकर दीघे हों या मोहन सिंह या और भी तमाम लोग या घटनाएं उन का विस्तार बहुत है। पूरी किताब भर का मामला है। पर अभी और बिलकुल अभी ममता बनर्जी मुलायम के चरखा दांव की ताज़ा शिकार हुई हैं।

ममता ने तो यह सोच कर शतरंज की चाल बिछाई थी मुलायम के साथ की कि हर बार कांग्रेस उन का विकल्प मुलायम में ढूंढती है तो पहले अपने विकल्प को ही अपने साथ कर लो। पर वह मुलायम का राजनीतिक इतिहास और उन के चरखा दांव को बहुत उत्साह में ध्यान नहीं रख पाईं। वह अपनी तानाशाही और हेकड़ी में भूल गईं कि इतिहास भी एक विषय होता है। और बच्चों को पाठयक्रम में यों ही नहीं पढ़ाया जाता।

हालांकि कवियत्री, पेंटर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अभी भी अपने एकला चलो रे गान पर कायम हैं और कह रही हैं कि खेल अभी बाकी है और कि कलाम ही उन के प्रत्याशी हैं। पर वह शायद कलाम से यह पूछना भूल ही गई हैं कि क्या वह ऐसे में प्रत्याशी बनना पसंद भी करेंगे? वह यह भी भूल गई हैं कि संसदीय राजनीति और वह भी लगभग विफल होती जा रही संसदीय राजनीति तानाशाही, हेकड़ी, बदमिजाजी, अराजकता और कि एकला चलो गान से कतई नहीं चलती। यह संसदीय राजनीति कविता लिखने या पेंटिंग बनाने का काम नहीं है। अब तो मुलायम सिंह यादव लगभग क्रेडिट लेते हुए पूरे गुरुर और मुसकुराहट के साथ कह रहे हैं कि कोई एक महीना पहले ही सोनिया गांधी से उन्हों ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव किया था। ठीक वैसे ही जैसे एक समय उन्हों ने ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम की सिफ़ारिश अटल बिहारी वाजपेयी से राष्ट्रपति बनाने के लिए की थी।

अब उन्होंने सोनिया से क्या कहा, क्या सुना इस का खंडन करने तो अभी सोनिया गांधी नहीं आने वालीं। पर मां, माटी, मानुष का पहाड़ा पढ़ने वाली ममता बनर्जी क्या आप सुन पा रही हैं जो मुलायम सिंह यादव फ़रमा रहे हैं! हो सके तो उन्हें सुनिए। और पढ़िए ममता जी समय की दीवार पर लिखी इबारत को कि अब प्रणव मुखर्जी ही देश के अगले राष्ट्रपति हैं। वामपंथी दल और एनडीए भी अपने समर्थन का औपचारिक ऐलान बस करने ही वाले हैं। प्रणब बाबू ने भी बड़ी विनम्रता से आप को अपनी बहन कह कर आपसे समर्थन मांग ही लिया है। मान जाइए आप भी बहन बन जाइए। संसदीय राजनीति का तकाज़ा यही है। एकला चलो गान कभी फिर किसी मौके पर गा लीजिएगा। मौके बहुत मिलेंगे अभी। अभी तो महाश्वेता देवी ने जो कहा है कि अगर प्रणब बाबू राष्ट्रपति हो जाएंगे तो उन को बहुत आनंद होगा। आप भी आनंद में आइए। और गाइए आमार बांगला, सोनार बांगला, आमी तोमाय भालो बासी ! भूल जाइए मुलायम का चरखा, प्रणब बाबू से मतभेद और छोड दीजिए एकला चलो की ज़िद!

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा

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