केंद्रीय गृह मंत्रालय की बढ़ी दुविधा, सपा और संघ की तकरार में कांग्रेस हुई हल्कान

अयोध्या क्षेत्र में प्रस्तावित 84 कोसी परिक्रमा यात्रा को लेकर सपा और संघ परिवार के बीच तकरार काफी गंभीर होने लगी है। क्योंकि, सपा नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने ऐलान कर दिया है कि किसी भी कीमत पर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और संघ परिवार के दूसरे घटकों को परिक्रमा शुरू करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। जबकि, विहिप नेतृत्व इस मुद्दे पर सरकार से दो-दो हाथ करने की रणनीति पर उतारू हो गया है। 25 अगस्त से यह यात्रा शुरू करने का कार्यक्रम है।

प्रदेश प्रशासन ने विहिप की चुनौती को देखते हुए अयोध्या और उसके आस-पास सुरक्षा बलों का भारी जमावड़ा कर दिया है। अशोक सिंहल और प्रवीण तोगड़िया जैसे विहिप के बड़े नेताओं के साथ कई अन्य को गिरफ्तार करने की तैयारी कर ली गई है। पुलिस के आलाधिकारियों ने शुक्रवार को ही विहिप के 70 नेताओं के खिलाफ वारंट जारी करा लिए थे। तैयारी हो गई है कि इन नेताओं की धर-पकड़ किसी भी समय शुरू कर दी जाए। दूसरी तरफ, पुलिस से बचने के लिए संघ परिवार के रणनीतिकारों ने ‘गुरिल्ला’ रणनीति के तमाम दांव-पेंच अजमाने का मन बनाया है। विहिप के कई नेता गिरफ्तारी से बचने के लिए ‘अंडर ग्राउंड’ हो गए हैं। खुफिया एजेंसियां इनका अता-पता जुटाने में लगी हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं कि चुनावी मौकों पर संघ परिवार के लोग सांप्रदायिकता का जहर फैलाने की कोई न कोई हरकत करते हैं। यह इनका बड़ा पुराना फॉर्मूला है। इसी कड़ी में विहिप ने विवादित राम मंदिर के मुद्दे को भुनाने के लिए 84 कोसी यात्रा का स्वांग रचा है। इसके पीछे इनका उद्देश्य भाजपा की चुनावी मदद करना भर है। इस कार्यक्रम के पीछे धार्मिक भावनाओं को कवच की तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बात अयोध्या और उसके आसपास के लोग भी समझने लगे हैं। ऐसे में, उन्हें यह नहीं लगता है कि विहिप के इस करतब से भाजपा का कोई बड़ा चुनावी कल्याण हो पाएगा। लोग तो पहले ही जान चुके हैं कि संघ परिवार के लोग सालों से राम मंदिर मुद्दे का इस्तेमाल अपने चुनावी हितों के लिए करते आए हैं। यह बात लोगों को कतई रास नहीं आती। फिर भी, संघ परिवार के लोग अपने घिसे-पिटे फॉर्मूले को फिर से अजमाने के लिए उतावले नजर आते हैं।

कांग्रेस के दिग्गी जैसे नेता इस मुद्दे पर कुछ टीका-टिप्पणी जरूर कर रहे हैं। लेकिन, आम तौर पर पार्टी के दूसरे नेता इस मुद्दे पर किसी तरह की बयानबाजी से परहेज कर रहे हैं। शायद, वे यही देखना चाहते हैं कि 25 अगस्त तक प्रदेश सरकार और संघ परिवार के बीच शुरुआती शक्ति परीक्षण का नतीजा क्या रहता है? उल्लेखनीय है कि 17 अगस्त को लखनऊ में अशोक सिंहल के नेतृत्व में विहिप के साधु-संतों के एक प्रतिनिधि मंडल ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। इन लोगों ने 25 अगस्त से 13 सितंबर तक होने वाली 84 कोसी परिक्रमा की इजाजत मांगी थी। इस परिक्रमा का उद्देश्य यही बताया गया था कि संत-समाज इस यात्रा के दौरान राम मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं के बीच जागरूकता पैदा करेगा। प्रदेश सरकार ने अगले दिन ही विहिप की इस कार्य योजना पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया था। आयोजकों को चेतावनी दी गई थी कि वे प्रतिबंध को तोड़ने की हिमाकत न करें। वरना, उनके साथ कड़ा बर्ताव किया जा सकता है।

दरअसल, विहिप नेताओं से सपा सुप्रीमो मुलायम की मुलाकात को लेकर सपा के चर्चित नेता आजम खान काफी भड़क गए थे। उन्होंने यह सवाल किया था कि आखिर उनकी पार्टी ने बाबरी ढांचे को विध्वंस करने वालों को इतनी अहमियत क्यों दी है? इससे तो मुस्लिम समाज के बीच गलत संदेश जाएगा। माना जा रहा है कि आजम खान की नाराजगी   के बाद ही मुलायम ने 84 कोसी परिक्रमा को लेकर दो टूक फैसला किया था। अशोक सिंहल सहित विहिप के कई नेताओं ने कहा भी है कि मुलायम ने आजम के दबाव में अपना फैसला बदला है। जबकि, लखनऊ में मुलाकात के दौरान 84 कोसी परिक्रमा को लेकर मुलायम का रुख सकारात्मक था।

अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे पर पहले भी सपा नेतृत्व और संघ परिवार के बीच जोरदार टकराव हो चुका है। 1990 में मुलायम सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इसी दौर में विहिप ने अयोध्या में 14 कोसी परिक्रमा का कार्यक्रम बनाया था। इसी को लेकर सितंबर महीने में सरकार और विहिप के बीच टकराव शुरू हुआ था। 30 अक्टूबर (1990) को विहिप के नेतृत्व में संघ परिवार के घटकों ने विवादित ढांचे तक पहुंचने की कोशिश की थी। जबकि, पुलिस ने विवादित स्थल के आस-पास जाने पर प्रतिबंध लगा रखा था। तकरार बढ़ी, तो पुलिस प्रशासन ने गोलियां चला दी थीं। इसमें 15 कारसेवक मारे गए थे। यह अलग बात है कि उस दौर में विहिप ने यह प्रचारित किया था कि इस गोलीबारी में उनके 59 कारसेवक शहीद हुए हैं। इस हादसे के बाद संघ परिवार के घटकों के लिए मुलायम सिंह सबसे बड़े ‘खलनायक’ बन गए थे। लेकिन, मुस्लिम समाज में यही संदेश गया था कि मुलायम ने संघ परिवार के लोगों को मनमानी नहीं करने दी। इसमें उन्होंने अपनी सरकार को भी दांव पर लगा दिया। इस प्रकरण के बाद संघ के घटकों ने नेताजी को ‘मौलाना मुलायम’ तक कहना शुरू कर दिया था।

1990 के गोलीकांड को संघ परिवार ने राजनीतिक रूप से जमकर भुनाया था। अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में यहां पर पहली बार भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में अपनी बहुमत वाली सरकार बना ली थी। 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार के घटकों की अगुवाई में लाखों कारसेवकों ने चढ़ाई करके विवादित ढांचा तोड़ दिया था। इसके बाद से विहिप जैसे संगठन वहीं पर भव्य राम मंदिर बनाने का आंदोलन चलाते आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में इन दिनों सपा की बहुमत वाली सरकार है। अंतर इतना ही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर खुद मुलायम नहीं हैं, लेकिन उनके सुपुत्र अखिलेश यादव इस कुर्सी पर विराजमान हैं। सपा सूत्रों के अनुसार, अयोध्या प्रकरण में सभी बड़े राजनीतिक फैसले सपा सुप्रीमो ही कर रहे हैं। उनके सुझाव पर ही गुरुवार से अयोध्या में सुरक्षा बलों का भारी जमावड़ा करा दिया गया है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (लॉ एंड आर्डर) अरुण कुमार ने फैजाबाद में कैंप कर दिया है। उनके नेतृत्व में ही सुरक्षा निगरानी बढ़ाई गई है।

विहिप की प्रस्तावित यात्रा 25 अगस्त से अयोध्या से शुरू होनी है और 13 सितंबर को इसका समापन भी यहीं होना है। यह यात्रा बस्ती, संत कबीर नगर, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा व फैजाबाद जिलों से होकर गुजरनी है। एहतियात के तौर पर इन सभी जिलों में धारा-144 लगा दी गई है। ताकि, एक जगह लोगों का जमावड़ा न हो पाए। सपा के महासचिव नरेश अग्रवाल का दावा है कि प्रदेश सरकार संघ परिवार की धमकियों से डरने-दबने वाली नहीं है। इन लोगों को याद रखना चाहिए कि सपा सरकार धर्म-निरपेक्षता की नीति की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। ऐसे में, किसी को कानून हाथ में लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। विहिप के समर्थन में भाजपा और संघ का नेतृत्व खुलकर सामने आने लगा है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कह दिया है कि यदि 150-200 साधु-संत छह जिलों की परिक्रमा यात्रा पर निकल रहे हैं, तो इसमें आफत की क्या बात है? इस यात्रा पर प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए वे चाहते हैं कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार कर ले। संघ के नेता राम माधव ने भी इसी तरह की अपील सपा सरकार से की है।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने दिल्ली में मीडिया से कह दिया है कि विहिप के लोग अयोध्या में बार-बार तमाशा न करें। वे नहीं चाहते हैं कि बल प्रयोग करने की नौबत आए। लेकिन, कुछ ताकतें प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करना चाहती हैं। इनकी मंशा पूरी नहीं होने दी जाएगी। लोकसभा के चुनाव में कुछ महीने ही बाकी हैं। सभी प्रमुख दलों ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे में, विहिप के इस बखेड़े से राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया खेल शुरू हो सकता है। चूंकि, मुलायम सिंह की पार्टी अयोध्या के मुद्दे पर कड़क फैसले ले रही है। ऐसे में, मुस्लिम समाज के भीतर एक खास संदेश जा रहा है। बसपा और कांग्रेस के नेताओं को इससे बेचैनी होने लगी है। दरअसल, इन दोनों दलों को आशंका हो गई है कि कहीं 84 कोसी यात्रा का टंटा सपा और भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से वोट बटोरू मुद्दा न बन जाए? क्योंकि, इस प्रकरण से सपा की तरफ अल्पसंख्यकों का तेज ध्रुवीकरण हो सकता है। जबकि, इस वोट बैंक पर बसपा और कांग्रेस की भी ललचाई नजर है।

लोकसभा के पिछले चुनाव में कांग्रेस को मुस्लिम समाज का काफी समर्थन मिला था। इसी के चलते पार्टी ने यहां पर 22 सीटें अपनी झोली में डाल ली थीं। अब 84 कोसी परिक्रमा के प्रकरण ने ऐसी स्थिति बना दी है कि सपा और संघ परिवार आमने-सामने खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किल यह है कि इस प्रकरण में फिलहाल उसकी कोई अहम राजनीतिक भूमिका नहीं रह गई है। केंद्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे ने अनौपचारिक बातचीत में मीडिया से यही कहा है कि उनका मंत्रालय अयोध्या प्रकरण पर नजर रखे हुए है। केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मंत्रालय को पल-पल की खबरें मिल रही हैं। जब केंद्रीय हस्तक्षेप की जरूरत होगी, तो जरूर कदम उठाए जाएंगे। इस समय वे इससे ज्यादा और कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं। यह जरूर है कि मुलायम के खास राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कह दिया है कि 84 कोसी प्रकरण में लगता यही है कि सपा और संघ परिवार के लोग मिला-जुला ‘दंगल’ कर रहे हैं। ताकि, इसके बहाने वोट बैंक की खेती की जा सके।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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