केजरीवाल, उत्तराखंड और लोकपाल

उत्तराखंड में केजरीवाल की अचानक जरूरत आन पड़ी है। दिल्ली की व्यस्तता के बीच लोकपाल कानून के प्रणेता अरविंद केजरीवाल सौ मील दूर उत्तराखंड निकल पाएंगे, ऐसा मान लेना बेमानी है। राज्य में उत्तराखंड लोकपाल कानून 2013 के असामयिक मौत के हालात पैदा हो गए हैं। सरकार के इरादे की भनक राज्य में सक्रिय एक गैर सरकारी संगठन के बयान से मिल रहा है।

देहरादून के रुरल लिटिगेशन एंड एंटाइटेलमेंट केंद्र के प्रमुख अवधेश कौशल के मुताबिक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनकर क्रियान्वयन में आया 'उत्तराखंड लोकपाल कानून' राज्यवासियों की जरूरतों को पूरा करने में अक्षम है। देश का यह पहला कानून है जिसका जनक दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आमरण से निकले आवाज को माना जाता है।

उत्तराखंड की जरूरत से अरविंद केजरीवाल का फिलहाल बेखबर रखना लाजिमी है क्योंकि दिल्ली में सजा उनका सब्जबाग शानदार है। गाए जा रहे हैं, समझाए जा रहे हैं कि लोकपाल आएगा। जाल बिछाएगा। भ्रष्टाचारियों को पकड़कर जेल ले जाएगा। भ्रष्टाचार से बचोगे, तो जाल में फंसोगे नहीं। नेता केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने की राह पर हैं। राजनीतिक मर्यादा से बंधे हैं इसलिए देश के बाकी हिस्सों में लोकपाल के मांग अभियान को मुल्तवी कर दिया है। तात्कालिक भाव से लुभावने लोकपाल की मांग की हद तय हो गई है। सिर्फ दिल्ली में लागू करना है। ऐलान है कि जीते तो रामलीला मैदान में विधानसभा की बैठक होगी। पहला काम लोकपाल विथेयक को पारित कराना होगा।

देश के बाकी हिस्सों के लोकपाल की मांग रामभरोसे है। अन्ना आंदोलन के दबाव में जिन राज्यों में लोकपाल लाया गया उनमें लोकपाल पर क्या गुजर रही है? उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। आंदोलन के सेनापति और सिपाही राजनीति में आएं या गैर राजनीतिक बने रहें की दुविधा में फंसकर यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखर गए हैं। राम जाने गोलबंद होकर अब कभी फिर इसकी चिंता कर पाएंगे या नहीं। इसलिए वक्त को लोकपाल जनांदोलन की मौत के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। उत्तराखंड का ही हाल लीजिए। यह केजरीवाल का प्रस्तावित लोकपाल लागू करने वाला पहला राज्य है।

तब अन्ना का व्रत टूटने से पहले मेजर जनरल (रिटा.) भुवनचंद्र खंडूरी की सरकार ने इसे लागू कर बाजी मार ली थी। अब राष्ट्रपति का हस्ताक्षर होने से कानून बनने की वैधानिक प्रक्रिया पूरी हो गई और उत्तराखंड लोकायुक्त कानून 2013 अमल में आ गया है। लेकिन पूर्व न्यायाधीश विजय बहुगुणा की सरकार इस कानून के साथ हिसाब से न्याय करना चाहती है। मुख्यमंत्री बहुगुणा की न्याय प्रक्रिया की रफ्तार जस की तस बनी रही, तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे से पहले उत्तराखंड लोकायुक्त कानून 2013 के नुकीले दांतों को निकालने का काम पूरा हो जाएगा। बहुगुणा कैबिनेट से तकलीफदेह कानून को खारिज करने का अंदेशा है। इसका आधार कुछ संगठनों की ओर से उठ रही मांगो को जायज बताकर बनाया जा रहा है। अगर ऐसा होता है,तो रामलीला मैदान के हंगामेदार संघर्ष से उपजा पहला लोकपाल कानून असर दिखाने से पहले ही अफसोसनाक मौत मर जाएगा।

उत्तराखंड लोकायुक्त कानून 2013 खारिज करने के पीछे कानून के अव्यवहारिक होने की दलील है। लोकपाल अध्यादेश लाने में (जो अब उत्तराखंड लोकायुक्त कानून 2013 का आकार ले चुका है) मेजर जनरल (रिटा.) की सरकार पर जल्दीबाजी में होने की तस्वीर तैयार की जा रही है। इल्जाम मढ़ा जा रहा है कि आसन्न चुनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री खंडूरी ने बिना वक्त गंवाए इसे लागू करने में तत्परता दिखाई। जरूरी वैधानिक प्रक्रिया पूरी नहीं की।

इमानदारी का प्रतीक बनने की चाहत रखने वाले खंडूरी का इरादा अन्ना आंदोलन से उपजी संवेदना को भुनाना था। कितना भुना पाए,यह सामने है। खंडूरी उखाड फेंकने के साथ उत्तराखंड के लोग लोकपाल का आकंठ विरोध कर रहे कांग्रेस को अपनी पसंद मान बैठे। कांग्रेस ने खुश होकर उत्तराखंड की कुर्सी हरीश रावत जैसे किसी सैनिक को थमाने के बजाए पसंदीदा पूर्व न्यायाधीश को सुपुर्द कर दी। न्यायधीश मुसीबत बनने से पहले उत्तराकंड लोकपाल कानून 2013 के साथ न्याय कर लेना चाहते हैं।

उत्तराखंड लोकपाल कानून 2013 के विरोध के तहत कहा जा रहा है कि इसे बनाने में न्यायिक एवं विधिक विभाग से जरूरी कसरत नहीं कराया गया। केजरीवाल के प्रस्तावित लोकपाल के कई अनुच्छेद उठाकर जस के तस पेस्ट कर दिए गए। यह कानून का सबसे बड़ा दोष बनकर सामने आया है। इससे बचा जाना चाहिए। साथ ही कानून में उत्तराखंड की जमीनी जरूरतों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया जा रहा है। इन मुश्किलों के आधार पर इसे लागू करने में दिक्कत का बहाना बनाया जा रहा है। दिक्कतों के आगे कानून का धूंधला भविष्य साफ है।

बहानेबाजी इसलिए कि मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए हजारों करोड़ रुपए का पुर्नवास पैकेज खर्चा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में इसके सही इस्तेमाल को लेकर उत्तराखंड लोकायुक्त कानून 2013 खर्च में इमानदारी की निगहबां बनकर खड़ी है। इसके रहते दिक्कत आना स्वाभाविक है। यह मुसीबत उसी तरह की है जैसा कि पूर्व कोयला सचिव के खिलाफ आवंटन मामले में हेराफेरी का एफआईआर दर्ज करने से आ रही है। सरकार के मंत्री तक सीबीआई के विरोध में खड़े हो गए हैं। दलील है कि इसी तरह होता रहा, तो फैसला लेने वाले खौफ में आ जाएंगे। राजकाज चलाना मुश्किल हो जाएगा। लोग मान लेंगे कि फैसला न लेने से मिला अपयश या दंड, फैसला लेने की वजह से रिटायरमेंट के बाद कोर्ट कचहरी के चक्कर में फंसने से बेहतर है।

मौजूदा व्यवस्था के किसी काम में घोर इमानदारी की उम्मीद करना उतना ही मुश्किल है जितना केजरीवाल के दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के दावे पर यकीन करना। ऐसे में उत्तराखंड में केजरीवाल आक्समिक जरूरत का क्या होगा? केजरीवाल के लोकपाल से उम्मीद पालने वाले क्या इस इंतजाम में फंसे रहेंगे कि पहले राधा के लिए नौ मन तेल का जुटाया जाए, तब राधा नाचेंगी। फिर तो अरविंद के लोग कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं कि ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी। रही बात उत्तराखंड में लोकपाल कानून लाने का श्रेय लेने वाली बीजेपी की। तो बहुगुणा सरकार के फैसले के खिलाफ खड़े होने का हौसला खो चुकी है। खासकर लोकपाल कानून पर चुनाव में जनता से मिले सिला ने लोकपाल के लिए फिर बड़ी लड़ाई की उम्मीद बीजेपी से करना बेकार ही लगता है। वैसे भी यह सब करना भी होगा तो लोकसभा चुनाव के वक्त किया जाएगा। राजनीतिक लाभ के लिए जरूरी है कि सत्ता से गलती करवाई जाए, तब प्रतिक्रिया के रूप में भुनाया जाए। गलती से पहले शोर शराबे का वो फायदा नहीं होता जो गलती के बाद के हंगामे से मिला करता है।

लेखक आलोक कुमार कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह-चौदह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क aloksamay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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