केजरीवाल और रामदेव में फर्क : एक चेली के कपड़े पहनकर भागा, दूसरा सर्दी में खुले आसमान के नीचे डटा है

शंभूनाथ शुक्ल : अरविन्द और रामदेव में यही फर्क है. पुलिस ने लाठियाया तो रामदेव अपनी चेली के कपड़े पहन कर रामलीला मैदान से आधी रात को फुर्र हो लिए और अरविन्द ऐसी सर्दी में भी रात भर खुले आसमान के नीचे डटे हैं. असली योगी तो अरविन्द केजरीवाल हैं बाबा रामदेव नहीं. और असली हरयाणवी छोरा भी अपने अरविन्दजी ही हैं, रामदेव ने तो अहीरवाल की नाक कटा दी.

एक रजाई में खुले आसमान के नीचे रात कैसे कटती है, यह तो वही जान पाएगा जिसने मुफलिसी में दिल्ली की सर्दी देखी हो. तीस साल पहले एक बार मैंने भी काटी थी बस बदन पर था लालकिले के सामने से खरीदा गया पचास रुपये का ओवरकोट. एक कनपुरिया पत्रकार और भी थे जो जरा नाटे थे लेकिन थे उस्ताद इसलिए उन्होंने एक कम्बल भी जुगाड़ लिया था. (वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.)

Payal Chakravarty : जब गृहमंत्री के घर का कांच एक पत्थर से टूट जाता है तो 12 पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया जाता है और जब एक निर्दोष महिला को जिंदा जला दिया जाता है तो आरोपी पुलिसवालों को सस्पेंड भी नही किया जाता है…जब पुलिस मंत्रियों की नही सुनती तो आम लोगों की क्या खाक सुनेगी… केजरीवाल जो भी कर रहे हैं बिल्कुल ठीक कर रहै हैं….सोमनाथ भारती ने जब सेक्स रैकेट चलाने वाले घर में रेड डालने को बोला तो एसीपी ने मना क्यों कर दिया ? पुलिस पैसे खाकर बैठी थी इसलिए ? बोला वारंट लेना पड़ेगा, नोटिस भेजना पड़ेगा फिर रेड मारेंगे…अगर नोटिस भेजकर ही रेड मारनी है तो रेड का क्या मतलब ? सीएम को मजबूरन धरना देना पड़ रहा है…. (पत्रकार पायल चक्रवर्ती के फेसबुक वॉल से.)

Arun Maheshwari : क्या ‘आप’ परंपरागत राजनीति के मठों में फैली हुई बारूद में किसी चिंगारी की भूमिका अदा कर पायेगी? राजनीति के तमाम मठाधीशों की तनी हुई भौहें, ‘आप’ को लेकर उनकी गुर्राहटें किस बात की सूचक है? कल एक चैनल पर एक पार्टी के प्रमुख नेता ‘आप’ को भारत के लिये श्राप बता रहे थे। यह नजारा पता नहीं क्यों, प्रिय कवि मुक्तिबोध की याद दिलाता है :  ‘‘शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार / मस्तक की लकीरें / बुन रही / आलोचनाओं के चमकते तार !!…प्राण में संवेदना है स्याह !!’’

क्या ‘आप’ ने छोटे-बड़े सभी राजनीतिक दलों की स्थिति ‘पुराने घिरे पानी’ में पैठे उस ‘ब्रह्मराक्षस’ जैसी कर दी है जो – ‘‘घिस रहा है देह/ हाथ के पंजे, बराबर/बांह-छाती-मूंह छपाछप/खूब करते साफ,/फिर भी मैल/फिर भी मैल !!’’

हाय! क्या सचमुच ये ‘ब्रह्मराक्षस’ ‘सघन झाड़ी के कंटीले तम-विवर में मरे पक्षी’ की नियति के लिये अभिशप्त है? नहीं जानता। लेकिन, कुछ तो होना जरूरी है, इनकी ‘वेदना के स्रोत को संगत, पूर्ण निष्कर्षों तक पहुंचाने’ के लिये भी। (अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.)

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