केजरीवाल की जिन नीतियों ने उन्हें आसमान पर चढ़ाया वही नीतियां अब उन्हें पिटवा रही हैं

Sanjaya Kumar Singh : केजरीवाल की जिन नीतियों ने उन्हें आसमान पर चढ़ाया वही नीतियां अब उन्हें पिटवा रही हैं। गुजरात में हमले के बाद उनके समर्थकों ने भाजपा कार्यालय पर हमला करके गलती की और फिर बाद के हमलावर की अच्छी पूजा नहीं होने से हमला करने वालों के हौसले बुलंद हो गए हैं। यह उनके साथ रहने वाले कार्यकर्ताओं के लिए शर्म की बात है। कोई नेता महात्मा गांधी बनना चाहे इसमें बुराई नहीं है पर उसके सभी कार्यकर्ता महात्मा गांधी बनने की कोशिश करेंगे तो यही होगा।

दूसरा गाल उसके सामने आगे नहीं किया जाता है जो दूसरा तमाचा जड़ दे। हिंसा बुरी है पर हिंसा रोकने के लिए सख्ती की जाए इसमें कैसी बुराई। मुझे याद आ रहा है जब चंद्रशेखर के समर्थकों ने राम जेठमलानी की पिटाई कर दी थी। जाहिर है, चंद्रशेखर ने समर्थकों से ऐसा करने के लिए नहीं कहा होगा। पर उनका अपना रौब था जो राजनीति में मजबूती से टिके रहने के लिए अरविन्द केजरीवाल में भी होना ही चाहिए। मेरी कोई औकात नहीं है – से काम नहीं चलने वाला।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


Badal Saroj : कल का तमाचा तो खैर जुगुप्सा पूर्ण था ही – यह अरविन्द केजरीवाल पर नहीं लोकतत्र के गाल पर तमाचा था। भर्त्सना के काबिल हैं ये कुंठा के मारे लोग जो आम आदमियों को इस्तेमाल करते हैं, खुद सामने नहीं आते। मगर मगर इस काण्ड के दो पहलू खासतौर से घिन पैदा करते हैं – एक ; भाजपा की उठी हाट के परचूनिए विजय कुमार मल्होत्रा और कांग्रेस के चारण-भाट कपिल सिब्बल की प्रतिक्रया का अंदाज। खिलखिलाये चहरे से वे बोल रहे थे और अपना आल्हाद छुपा नहीं पारहे थे। वे बबूल बो कर आम की फसल का इन्तजार कर रहे हैं तो उनकी कोई मदद नहीं कर सकता। उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि यह संस्कृति अगर राजनीतिक विमर्श का अंदाज बन गयी तो न Z Y X का सिक्युरिटी घेरा बचा पायेगा न लाल बत्ती की गाड़ियां। दो-यह सभ्यता और संस्कृति पर भी तमाचा था – माला पहनाना -हाथ जोड़ना फिर तमाचा मारना। गोडसे अंदाज है – उस "शूरवीर" ने भी पहले पाँव छुए , हाथ जोड़े फिर गोलियां उतार दीं। अपने लम्बे वामपंथी जीवन में छात्र आंदोलन से युवा-किसान-मजदूर और अब राजनीतिक मंच तक एक सौ से ज्यादा बार इस तरह के गुंडों, जमीदारों, पुलिस,मालिकों के (इससे भी ज्यादा बड़े-बल्लम, फरसे, भाले, बन्दूक, लाठी और पेट्रोल वाले ) हमले खुद भुगते हैं। पिटे हैं, टूटे हैं और उसी हालत में जेल की बैरक में धरे गए हैं। अक्सर बार उनका सफल मुकाबला भी किया है। मगर हर हमले के बाद दृढ़ता और बढ़ी है। इस तरह की दृढ़ता और निरंतरता से कम से कम पचास कार्यकर्ताओं को नाम से जानते है जो बाद में मोहरा बनना छोड़ दिए और हमारे साथ आ गए।

कामरेड बादल सरोज के फेसबुक वॉल से.


Ramesh Kumar : अरविन्द के पिता जी से अरविन्द के चेहरे पर सूझन देखकर रहा नही गया। कमरे में आये, सर पर हाथ फेरा और बोले अपना ध्यान रखो। कहकर चले गए। मैं सोच रहा था कि उस पत्नी, उन बच्चो पर, उस माँ और उस पिता पर क्या बीती होगी, जब उसका असीम काबिल पढ़ा लिखा बेटा इस तरह के विरोधो को झेल रहा होगा। क्या उन बच्चो के आत्मसम्मान को ठेस नही पहुंची होगी, जिसके पिता को पुरे समाज के सामने थप्पड़ मारा गया हो। दिल दुख होगा, रोये होंगे, बहुत बुरा लगा होगा! दिल में आया होगा कि कह दे कि छोड़ दो ये सब! मगर कैसे कह दे? एक जिद्दी इंसान ये जिद्द पालकर बैठ गया है कि उसे ये देश सुधारना है। कैसे उससे जीत जाए जो खुद एक बावरा हो गया है कि कुछ भी करके लोगो को एक नई ज़िन्दगी देनी है। ज्यादा कुछ नही कहूँगा। मन उदास है, और इस पोस्ट को लिखते हुए जो कुछ आंसू मेरी आँखों से अनवरत अनायास ही लुढ़क आय, अगर इस पीड़ा को और भी कई मेरे जैसे लोगो ने महसूस किया हो, तो बस इतनी दुआ है उस ऊपर वाले से कि इस पीड़ा में एक आदमी की तड़प है, जिसे ये इश्वर भी समझता है की कोई समझेगा नही। तो वो जो अकेला ही सब झेल रहा हई, उसके साथ आप हमेशा रहना। दिखाना कि चमत्कार अब भी होते है। दिखाना कि दुनिया में अब भी शुचिता, इमानदारी, मेहनत, लगन इन शब्दों के अपने मायने है। इस इंसान के साथ कुछ गलत मत होने देना। दुआ ये भी नही कि ये चुनाव जीत जाए। दुआ बस इतनी सी है कि ये इंसान अपने सपनो का भारत देखकर ही इस संसार से विदा ले। क्योकि इतना तो मैं भी अरविन्द को जानता हूँ की इनके लिए चुनाव से ज्यादा जरुरी भारत देश है।

थोडा ही सही पर कुछ असर हो रहा है…..
अरविन्द तेरा ज़िक्र हर शहर हो रहा है….

रमेश कुमार के फेसबुक वॉल से.


Vineet Kumar : भाईजी, केजरीवाल ने शरद पवार को लेकर इसी तरह की घटना को जनता का आक्रोश बताया और इधर जरनैल सिंह की सबसे बड़ी योग्यता पी चिदंबरम पर जूते फेकने के रूप में देखा तो इसका ये बिल्कुल मतलब नहीं है कि इस मुद्दे पर बात करने का यही आधार बने, जरनैल सिंह की लिखी किताब पढ़ लीजिये जरा.. 'कब कटेगी चौरासी' …रोंगटे खड़े हो जायेंगे. बात बस इसकी हो रही है की अगर ये जनता का आक्रोश भी है तो उसे उसी लोकतंत्र से जोड़ो न यार जिसका चौथा खभ होने का दंभ करते फिरते हो,लूप न्यूज़ बनाकर उसे तमाशे की शक्ल देने का क्या सेंस है? जो साथी हमें ये ज्ञान देने की कोशिश कर रहे है कि केजरीवाल खुद खबर में बने रहने के लिये कभी स्याही तो कभी थप्पड़ स्टंट का सहारा ले रहे है,मैं केजरीवाल की नियत पर बात करने से ज्यादा इन साथियों की राजनीतिक और मीडिया की समझ पर दाद देना चाहूँगा,इतनी बारीक और गहरी समझ तो मुझे पिछले दस साल से टीवी और किताबों के आगे आँखें फोड़ते रहने से भी हासिल नहीं हुई. मुबारक स्वीकार करें बन्धु. बस ज़रूरी लगे तो थोड़ी सी संवेदना की ज़मीन बचकर रखियेगा…

विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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