केजरीवाल को कांग्रेस नहीं देगी मान्यता

चुनाव के पहले ही नरेंद्र मोदी की आक्रामक सियासी रणनीति से कांग्रेस काफी खौफजदा हो गई है। इसके चलते ही पार्टी के कई दिग्गज नेता चुनावी मुकाबले से ही भागते नजर आ रहे हैं। तमाम बड़े नेताओं ने यह स्वीकार कर लिया है कि मोदी मुहिम का सामना करना मुश्किल होगा। ऐसे में, वे अपने सिपहसालारों से कहने लगे हैं कि पैसे संभालकर खर्च करो। ताकि, संसाधन आगे की राजनीति के लिए काम आ सकें। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के उम्मीदवारों ने शुरुआती दौर से ही केंद्रीय नेतृत्व से ज्यादा वित्तीय मदद के लिए गुहार शुरू कर दी है।

तर्क यही दिया जा रहा है कि मोदी का चुनावी प्रबंधन हर क्षेत्र में व्यापक चुनावी संसाधन भेज रहा है। ऐसे में, जरूरी हो गया है कि पार्टी का नेतृत्व चुनावी मदद की राशि बढ़ा दे, ताकि शुरुआती दौर से ही मुकाबले को दमदार बनाने की कोशिश की जाए। वरना, चुनावी टैंपो नहीं उठा, तो हालात बदतर हो सकते हैं।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, शुरुआती दौर से ही केंद्रीय मदद के लिए मुंह फैलाने वालों को फिल्हाल, झिड़की मिल रही है। उनसे कहा जा रहा है कि अभी तो पार्टी ने पूरी चुनावी टिकटें भी नहीं बांटी हैं। ऐसे में, शुरुआती दौर में उम्मीदवार अपने संसाधनों से ही चुनावी मुहिम तेज करें। जमीनी सच्चाई देखकर ही केंद्रीय नेतृत्व अपना खजाना खोलेगा। भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी चुनावी पकड़ तेज करने के लिए गुजरात के साथ वाराणसी सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद यह फैसला पिछले दिनों हुआ है। इसके पीछे रणनीति यही है कि पूर्वांचल की सीटों के साथ पड़ोसी राज्य बिहार में भी मोदी की राजनीतिक धमक और बढ़ाई जा सके। रणनीतिकारों का आकलन यही है कि वाराणसी से चुनाव मैदान में आने से भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल और बढ़ जाएगा।

इसी के साथ विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ परिवारी घटक अंदर-अंदर यह प्रचारित करने लगे हैं कि भाजपा अपने हिंदुत्व के एजेंडे से दूर नहीं गई है। वे लोग अयोध्या, काशी व मथुरा की बात करते रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर का आंदोलन चल ही रहा है। अब धुर हिंदुत्व छवि वाले नेता मोदी को काशी (वाराणसी) से उतार दिया गया है। संघ परिवार के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि वाराणसी के चुनाव से चुपके-चुपके हिंदुत्व कार्ड का संदेश फैलने लगेगा। काशी में ही इस कार्ड का असर चुनाव में दिखाई पड़ेगा। प्रयोग के तौर पर संघ परिवारियों ने एक नारा उछाला है, ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’। उल्लेखनीय है कि बाबा विश्वनाथ की काशी नगरी में ‘हर-हर महादेव घर-घर महादेव’ का नारा धर्म परायण लोग लगाते रहते हैं। लेकिन, अब संघ परिवारी घटक ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ का नारा उछालते नजर आ रहे हैं। आकलन है कि इस नारे की धमक से पूर्वांचल और बिहार की दो दर्जन सीटों पर मोदी प्रभाव और गहरा हो जाएगा।

भाजपा के रणनीतिकार यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि मोदी मुहिम के आक्रामक प्रचार से चुनाव में तेजी से सामाजिक ध्रुवीकरण हो जाएगा। कोशिश की जा रही है कि ‘हर-हर मोदी…’ नारे के जरिए कुछ वैसा ही माहौल पैदा कर दिया जाए, जैसा कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1990 के दशक में ‘जय श्री राम’ नारे से हुआ था। इसी दौर में पार्टी ने उत्तर प्रदेश और बिहार में रिकॉर्ड जीत हासिल की थी। इसी जीत के चलते पहली बार भाजपा ने केंद्र में सत्ता का स्वाद चखा था। यह अलग बात है कि इस बार हिंदुत्व कार्ड की रणनीति अंदरखाने चलाई जा रही है। क्योंकि, प्रत्यक्ष तौर पर मोदी विकास के एजेंडे की ही मार्केटिंग करने में लगे हैं। वे जगह-जगह यही अलाप लगा रहे हैं कि उनके शासनकाल में गुजरात   ने रिकॉर्ड विकास किया है। वे गुजरात विकास मॉडल का ही सपना पूरे देश में बेच रहे हैं। मोदी भले ‘विकास पुरुष’ की अपनी छवि गढ़ने में जुटे हों, लेकिन संघ नेतृत्व इस जमीनी हकीकत को जानता है कि चुनाव में हिंदुत्व कार्ड के जरिए सामाजिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ, तो ‘मिशन- 272 प्लस’ का लक्ष्य पूरा नहीं सकता।

भाजपा के लिए वाराणसी की सीट आम तौर पर काफी सुरक्षित मानी जाती है। क्योंकि, पिछले कई चुनावों से यहां भाजपा की जीत होती आई है। लेकिन, पिछली बार डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता बहुत कम अंतर से जीत पाए थे। इस संसदीय क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय की काफी बड़ी आबादी है। 2002 के गुजरात दंगों के बाद इस समुदाय में मोदी की छवि ‘खलनायक’ की रही है। यह अलग बात है कि किसी अदालत ने मोदी को आज तक गुनहगार नहीं ठहराया है। इसी आधार पर भाजपा खेमा अपने नेता को एकदम निर्दोष करार करता है। अदालत से भले मोदी को दंगों के संदर्भ में ‘क्लीनचिट’ मिली हो, लेकिन उनकी छवि कट्टर सोच वाले नेता की ही बनी हुई है। केवल मुस्लिम समाज में ही नहीं, देश के बुद्धिजीवी वर्ग में भी मोदी को सेक्यूलर मिजाज का नेता तो नहीं ही माना जाता।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव सांप्रदायिकता के मुद्दे पर दशकों से योद्धा की भूमिका में रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन के दौरान मुलायम ने संघ परिवारियों को निर्णायक चुनौती दी थी। इसी वजह से अल्पसंख्यक समाज में मुलायम की पैठ काफी मजबूत रही है। इस दौर में तो उत्तर प्रदेश में सपा की बहुमत वाली सरकार है। मुलायम के बेटे अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार चल रही है। मुलायम ने सपना पाला है कि प्रदेश में ज्यादा बड़ी जीत हासिल हो, तो वे तीसरे मोर्चे के जरिए प्रधानमंत्री पद के लिए भी दावेदार हो सकते हैं। यह अलग बात है कि तीसरे मोर्चे के दल एकजुट नहीं हो पाए। इनमें से कई दल अलग-अलग राग अलापते नजर आ रहे हैं। कई कारणों से प्रदेश सरकार की छवि भी बेहतर नहीं हो पाई। ऐसे में, सपा की संभावनाओं को लेकर तमाम सवाल हैं। फिर, भी मुलायम उम्मीद कर रहे हैं कि उन्ही की पार्टी मोदी का विजय रथ उत्तर प्रदेश में रोक देगी।

मुलायम सिंह, मैनपुरी संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतते आए हैं। यह इलाका उनके खास प्रभाव वाले हिस्से में है। मैनपुरी से मुलायम को कोई बड़ी चुनौती भी नहीं मिल पाती। लेकिन, इस बार वे मैनपुरी के साथ ही वाराणसी की करीबी सीट आजमगढ़ से भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इसका ऐलान पार्टी ने औपचारिक तौर पर मंगलवार को कर दिया है। पिछला चुनाव यहां से भाजपा के टिकट पर बाहुबल छवि वाले रमाकांत यादव ने जीता था। इस बार भी पार्टी ने आजमगढ़ से रमाकांत को ही उम्मीदवार बनाया है। लेकिन, मुलायम के ऐलान के बाद अब आजमगढ़ के चुनावी समीकरण बदल जाना तय माना जा रहा है। इस संसदीय क्षेत्र में यादवों और मुसलमानों का वोट बैंक काफी मजबूत माना जाता है। मुलायम के चुनाव मैदान में आने से रमाकांत का चुनावी खेल बिगड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुलायम की ताजा रणनीति के चलते इसका दबाव पड़ोस की मोदी की सीट में भी पड़ना तय है।

मुलायम की इस रणनीति से बसपा के भी राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं। क्योंकि, पूर्वांचल की सीटों में मुस्लिम वोट बैंक का ध्रुवीकरण सपा उम्मीदवारों के पक्ष में ज्यादा हो सकता है। पिछली बार आजमगढ़ में सपा का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहा था। जबकि, रमाकांत का ठेठ मुकाबला बसपा के अकबर अहमद ‘डम्पी’ ने किया था। वे रमाकांत से करीब 50 हजार वोटों से हारे थे। आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल वाराणसी में मोदी का मुकाबला करने जा रहे हैं। हालांकि, इसकी औपचारिक घोषणा 25 मार्च को वहां रैली के बाद की जाएगी। केजरीवाल ने अपनी नई तरह की राजनीति का रुतबा दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिखाया था। वे कांग्रेस के समर्थन से 49 दिनों तक दिल्ली में सरकार भी चला चुके हैं। लेकिन, अपनी अलग तरह की राजनीति के चलते केजरीवाल विवादों में रहे, तो जबरदस्त राष्टÑीय चर्चा में भी बने हुए हैं। पिछले दिनों वे गुजरात दौरे पर गए थे। इस दौरे के दौरान केजरीवाल ने गुजरात विकास मॉडल की धुर आलोचना की है। कहा है कि मोदी, विकास का झूठा प्रचार कर रहे हैं। जबकि, जमीनी सच्चाई है कि उनके राज में अमीर घरानों का ही विकास हुआ है। इसीलिए, कॉरपोरेट के बड़े घराने मोदी के पक्ष में मुहिम चला रहे हैं।

केजरीवाल, खांटी तेवरों वाले नेता हैं। पहले उनके राजनीतिक निशाने पर कांग्रेस थी। लेकिन, अब मोदी हैं। शायद, इसीलिए कांग्रेस सहित कई दलों के नेताओं ने मुहिम शुरू की है कि मोदी के मुकाबले बाकी सभी दल केजरीवाल को समर्थन दें। ताकि, मोदी को जोरदार चुनौती दी जा सके। सपा और जदयू नेतृत्व केजरीवाल को समर्थन देने की बात कर रहा है। लेकिन, कांग्रेस का नेतृत्व अपना उम्मीदवार उतारने के लिए अड़ा रहा। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व नहीं चाहता कि वाराणसी में मोदी के मुकाबले अपना उम्मीदवार न उतारकर केजरीवाल को राजनीतिक ‘मान्यता’ देने की भूल की जाए। कांग्रेस के प्रवक्ता मीम अफजल अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि केजरीवाल की राजनीति कतई भरोसे लायक नहीं है। उनकी राजनीति अराजकतावाद की ही   रही है। वे मुद्दों पर टिकते नहीं हैं। राहुल गांधी के खिलाफ तो ‘आप’ ने अपना उम्मीदवार सीधे उतार दिया। जबकि, मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने के मामले में वे रायशुमारी का नाटक कर रहे हैं। आखिर, मोदी से मुकाबला वे जनता से पूछ कर करने वाले हैं, तो राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में कुमार विश्वास को उतारने के पहले ऐसी रायशुमारी क्यों नहीं कराई गई? ऐसे में, इनकी नाटकबाजी की राजनीति उजागर हो चुकी है। मोदी और भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का जवाब कांग्रेस ही देने में सक्षम है। उसे केजरीवाल जैसी ‘बैसाखियों’ की जरूरत नहीं है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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